
Romeo and Juliet Clause: मोहब्बत की राह में कभी-कभी समाज की दीवारें इतनी ऊंची हो जाती हैं कि दो दिलों का मिलना मुहाल हो जाता है। सदियों पहले रोमियो और जूलियट की प्रेम कहानी ने दुनिया को प्रेम और विरोध की कड़वी सच्चाइयों से रूबरू कराया था। आज वही नाम भारत की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट के गलियारों में फिर गूंज रहा है, जब कानून और असलियत के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश में एक नया ‘क्लॉज’ सामने आया है।
क्या है ‘Romeo and Juliet Clause’ और क्यों पड़ी इसकी जरूरत?
यह पूरा मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले से शुरू हुआ, जिसमें यौन शोषण से जुड़े एक प्रकरण में अदालत ने एक लड़के को बरी कर दिया था। इस फैसले का आधार लड़की की कथित उम्र और उसके स्कूल सर्टिफिकेट में बड़ा अंतर था। उत्तर प्रदेश सरकार को यह निर्णय सही नहीं लगा, क्योंकि मामला पोक्सो अधिनियम के तहत आता था। ऐसे में यूपी सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने समाज की जटिल सच्चाइयों और कानूनी दस्तावेजों के बीच के अंतर को समझते हुए एक महत्वपूर्ण निर्देश दिया और यहीं से ‘Romeo and Juliet Clause’ की अवधारणा सामने आई। यह क्लॉज, विशेष रूप से किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों को अपराध मानने या न मानने की पेचीदगियों को सुलझाने के लिए है, ताकि प्रेम को कानून की कठोरता से बचाया जा सके, जहां शोषण का इरादा न हो। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
शामली का वो मामला जिसने न्याय की नई राह दिखाई
इस पूरे घटनाक्रम की जड़ें उत्तर प्रदेश के शामली जिले के एक मामले में हैं। आरोप था कि एक व्यक्ति ने एक नाबालिग लड़की से कई बार दुष्कर्म किया और कट्टे के बल पर उसके आपत्तिजनक वीडियो बना लिए, जिनका इस्तेमाल वह लड़की को ब्लैकमेल करने के लिए करता रहा। इसी ब्लैकमेलिंग के चलते आरोपी ने छह महीने तक नाबालिग से बलात्कार किया। 2 दिसंबर 2024 को इस मामले में एफआईआर दर्ज की गई, और यह मामला सत्र न्यायालय पहुंचा, जहां आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी गई। हालांकि, अप्रैल 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कुछ तर्कों के आधार पर आरोपी को जमानत दे दी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि लड़की की उम्र की पुष्टि नहीं हो पाई थी, यानी वह 18 साल से अधिक हो सकती थी, जिसके कारण पोक्सो एक्ट लागू नहीं होता। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि पोक्सो एक्ट के हर मामले में जांच की शुरुआत में ही पीड़िता का मेडिकल एज डिटरमिनेशन टेस्ट यानी उम्र तय करने वाली डॉक्टरी जांच अनिवार्य रूप से कराई जाए और उसकी रिपोर्ट जमानत की सुनवाई के दौरान कोर्ट में पेश की जाए। इस फैसले से असहमत होकर यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
सुप्रीम कोर्ट का संदेश: किशोरों के भविष्य के लिए संतुलित कदम
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की संवेदनशीलता को समझते हुए टिप्पणी की कि कानूनों का इस्तेमाल केवल बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए ही नहीं होना चाहिए, बल्कि किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों के मामलों में भी इनका प्रयोग सावधानी से किया जाना चाहिए। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि कई बार परिवार इन संबंधों का विरोध करते हैं और किशोरों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज करा देते हैं, जिससे उनके भविष्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पोक्सो न्याय का एक गंभीर निरूपण है, लेकिन इसके दुरुपयोग ने “समाज में एक गंभीर खाई पैदा कर दी है।” न्यायालय ने यह भी बताया कि इस अधिनियम का उपयोग अक्सर परिवारों द्वारा युवाओं के बीच संबंधों का विरोध करने के लिए किया जाता है, जिससे अनजाने में ऐसे रिश्ते भी अपराध की श्रेणी में आ जाते हैं जहां शोषण का कोई इरादा नहीं होता। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: https://deshajtimes.com/news/national/
सुरक्षा बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता: पोक्सो एक्ट की चुनौती
पोक्सो अधिनियम के तहत, 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति को बच्चा माना जाता है। यह अधिनियम यौन कृत्यों के लिए नाबालिग की सहमति को मान्यता नहीं देता है। इसलिए, 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति से संबंधित कोई भी यौन गतिविधि स्वतः ही अपराध मानी जाती है, चाहे वह सहमति से हो या शोषणकारी न हो। इस प्रावधान ने कई बार उन किशोरों को भी कानूनी पचड़े में फंसा दिया है, जिनके बीच वास्तविक प्रेम संबंध होते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस पहलू पर विचार किया और कहा कि ऐसे मामलों में जहां वास्तविक प्रेम और नाबालिग सहमति का मामला हो, वहां कानून की व्याख्या में अधिक लचीलेपन की आवश्यकता है ताकि किशोरों के मौलिक अधिकारों का हनन न हो। यहीं पर ‘नाबालिग सहमति’ के मुद्दे पर एक गहन बहस शुरू हुई।
कानून में बदलाव की मांग और इंदिरा जयसिंह का पक्ष
पोक्सो कानून में संशोधन की मांग नई नहीं है, लेकिन यौन अपराधों के अभियोजन में महिलाओं के लिए सुरक्षा और बचाव से संबंधित सुप्रीम कोर्ट में लंबित एक जनहित याचिका के कारण इसे और बल मिला है। इस मामले में, न्यायालय की सहायक अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने सहमति की आयु को कम करने या कुछ अपवादों को शामिल करने की वकालत की है। उन्होंने पिछले वर्ष दायर अपनी लिखित दलीलों में तर्क दिया कि वर्तमान व्यापक अपराधीकरण संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के तहत किशोरों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। जयसिंह ने कहा कि 16 से 18 वर्ष की आयु के किशोरों में अपनी यौन स्वायत्तता के संबंध में निर्णय लेने की “विकसित होती क्षमता” होती है। सामान्य कानून के ‘परिपक्व नाबालिग सिद्धांत’ का हवाला देते हुए, उन्होंने तर्क दिया कि 18 वर्ष से कम आयु के सभी लोगों को सहमति देने में असमर्थ मानना वैज्ञानिक वास्तविकता और यौवन की जैविक शुरुआत की अनदेखी है। जयसिंह ने आयु में निकट अपवाद (proximate exception) का प्रस्ताव रखा। इस कानूनी व्यवस्था के तहत, यदि दोनों पक्ष किशोर हैं (उदाहरण के लिए, एक 16 वर्षीय और एक 17 वर्षीय) और यह कृत्य आपसी सहमति से हुआ है, तो इसे अपराध नहीं माना जाएगा। इससे बिना किसी दबाव के बने संबंधों के लिए युवा लड़कों को पोक्सो अधिनियम के तहत कारावास से बचाया जा सकेगा। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
सरकार का रुख: सुरक्षा कवच बनाए रखने पर जोर
केंद्र सरकार ने हालांकि सहमति की आयु में किसी भी प्रकार की कमी या विधायी अपवादों के लागू होने का विरोध किया है। इस मामले में अदालत के समक्ष अपनी दलीलों में सरकार ने तर्क दिया कि 18 वर्ष की आयु एक “सोच-समझकर लिया गया” विधायी निर्णय है, जिसका उद्देश्य बच्चों के लिए एक अप्रतिबंधित सुरक्षा कवच बनाना है। सरकार का तर्क था कि नाबालिगों में सार्थक सहमति देने की कानूनी और विकासात्मक क्षमता नहीं होती है। उसने कहा कि एक सख्त जवाबदेही ढांचा—जहां सहमति का कोई महत्व नहीं है, आवश्यक है, क्योंकि बच्चे भरोसेमंद पदों पर बैठे वयस्कों द्वारा हेरफेर और दबाव के शिकार हो सकते हैं। सरकार ने आशंका व्यक्त की कि अपवाद लागू करने या सहमति की उम्र कम करने से सहमतिपूर्ण संबंधों की आड़ में बाल शोषण और तस्करी के लिए रास्ते खुल सकते हैं। चूंकि यह अधिनियम बाल शोषण की विशिष्ट समस्या के निवारण के लिए बनाया गया था, इसलिए आयु सीमा को कम करने से वही समस्या फिर से उत्पन्न हो जाएगी जिसे हल करने का प्रयास इस कानून ने किया था। यह बहस इस बात पर केंद्रित है कि कैसे कानून नाबालिग सहमति के दायरे को परिभाषित करे ताकि युवाओं को उनके अधिकारों से वंचित किए बिना सुरक्षित रखा जा सके।





