
मासिक धर्म स्वच्छता: सदियों से जिस विषय पर समाज मौन धारण किए रहा, उसे अब देश की सर्वोच्च अदालत ने जीवन के अधिकार से जोड़कर एक नई दिशा दी है।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: अब हर स्कूल में मिलेगा मुफ़्त ‘मासिक धर्म स्वच्छता’ किट, बदलेंगे नियम!
मासिक धर्म स्वच्छता: सुप्रीम कोर्ट ने जीवन के अधिकार का हिस्सा माना
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को एक अहम निर्देश जारी किया है। न्यायालय ने आदेश दिया है कि स्कूलों में पढ़ने वाली छात्राओं को मुफ्त में जैव अपघटनीय सैनिटरी पैड उपलब्ध कराए जाएं। यह फैसला मासिक धर्म स्वच्छता और इन उत्पादों तक पहुंच के अधिकार को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का एक अभिन्न हिस्सा मानता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। इस निर्णय से देश की लाखों छात्राओं को एक गरिमापूर्ण और स्वस्थ जीवन जीने का अवसर मिलेगा।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और आर. महादेवन की पीठ ने अपने निर्देश में स्पष्ट किया कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करना होगा कि स्कूलों में छात्राओं और छात्रों के लिए अलग-अलग और पर्याप्त शौचालय हों। साथ ही, कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं के लिए सैनिटरी पैड की उपलब्धता भी सुनिश्चित की जाए। इस ऐतिहासिक फैसले में यह भी कहा गया है कि सभी स्कूलों को, चाहे वे सरकारी हों या निजी नियंत्रण में, दिव्यांगजनों के लिए अनुकूल शौचालय, सैनिटरी नैपकिन, पानी और साबुन जैसी बुनियादी सुविधाएं अनिवार्य रूप से प्रदान करनी होंगी। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। इसके अतिरिक्त, लड़कियों के लिए अतिरिक्त यूनिफॉर्म की व्यवस्था भी करनी होगी ताकि मासिक धर्म के दौरान किसी भी आपात स्थिति में उनकी शिक्षा बाधित न हो।
यह महत्वपूर्ण फैसला केंद्र सरकार की ‘स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए मासिक धर्म स्वच्छता नीति’ के बेहतर कार्यान्वयन से जुड़ा है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि यदि सरकारें लड़कियों को स्वच्छ शौचालय और मुफ्त सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने में विफल रहती हैं, तो उन्हें इसके लिए जवाबदेह ठहराया जाएगा। यह एक सशक्त संदेश है कि महिलाओं के स्वास्थ्य और गरिमा के प्रति कोई लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
अवसर की समानता और प्रजनन स्वास्थ्य का अधिकार
न्यायालय ने इस बात पर भी बल दिया कि स्वस्थ प्रजनन जीवन का अधिकार केवल भौतिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें यौन स्वास्थ्य संबंधी शिक्षा और सही जानकारी प्राप्त करने का अधिकार भी शामिल है। मासिक धर्म स्वास्थ्य को अवसर की समानता से जोड़ते हुए न्यायालय ने कहा कि अवसर की समानता यह अनिवार्य करती है कि प्रत्येक व्यक्ति को लाभ प्राप्त करने के लिए आवश्यक कौशल अर्जित करने का उचित अवसर मिले। यह फैसला विशेष रूप से ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की छात्राओं की शिक्षा में आने वाली बाधाओं को दूर करने में सहायक होगा। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
न्यायालय ने अपने फैसले में मासिक धर्म स्वच्छता के अधिकार को अनुच्छेद 21 में उल्लिखित जीवन के अधिकार के अंतर्गत एक मौलिक अधिकार के रूप में स्थापित किया है। किफायती मासिक धर्म स्वच्छता उपायों की आवश्यकता पर जोर देते हुए, न्यायालय ने कहा कि इससे बालिका को “यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के उच्चतम स्तर को प्राप्त करने” में मदद मिल सकती है। इस फैसले से न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य में सुधार होगा बल्कि समाज में मासिक धर्म से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने और एक स्वस्थ वातावरण बनाने में भी मदद मिलेगी। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।





