

Sachin Tendulkar: भारतीय क्रिकेट के इतिहास में कई ऐसे पल आए हैं, जो फैंस के जेहन में हमेशा ताजा रहते हैं। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि इन सुनहरे पलों के बीच कुछ कड़वी यादें भी होती हैं, जिन्हें वक्त के साथ भुलाया नहीं जा सकता? ऐसा ही एक वाकया अब 22 साल बाद फिर से सुर्खियों में है, जब क्रिकेट की दुनिया के एक दिग्गज अंपायर ने अपनी सबसे बड़ी गलती का सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया है। यह खुलासा क्रिकेट प्रेमियों के लिए किसी झटके से कम नहीं है, खासकर तब जब बात क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर से जुड़ी हो।
सचिन तेंदुलकर को गलत आउट देने पर 22 साल बाद स्टीव बकनर का चौंकाने वाला कबूलनामा!
क्रिकेट इतिहास के सबसे सम्मानित और अनुभवी अंपायरों में से एक स्टीव बकनर ने आखिरकार वह बात कह ही दी, जिसका इंतजार शायद कई सालों से हो रहा था। 22 साल पहले, 2003 में ऑस्ट्रेलिया के ब्रिसबेन में खेले गए टेस्ट मैच के दौरान, भारतीय महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर को एलबीडब्ल्यू आउट देने का उनका फैसला गलत था। इस बात को उन्होंने खुद स्वीकार किया है, जिसने एक बार फिर से उस पुरानी बहस को छेड़ दिया है कि क्या मैदान पर हुई गलतियों का क्रिकेट पर कितना गहरा असर होता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
क्या सच में सचिन तेंदुलकर के साथ हुआ था अन्याय?
स्टीव बकनर का यह कबूलनामा सिर्फ एक गलती नहीं, बल्कि उस समय के क्रिकेट में निर्णय लेने की प्रक्रिया और उसके प्रभावों पर एक बड़ी टिप्पणी है। ब्रिसबेन टेस्ट का वह पल, जब सचिन तेंदुलकर को गलत तरीके से एलबीडब्ल्यू आउट दिया गया, आज भी कई प्रशंसकों को याद है। टीवी रिप्ले में यह साफ दिख रहा था कि गेंद स्टंप के ऊपर से जा रही थी, लेकिन मैदान पर बकनर का फैसला अलग था। उनकी यह स्वीकारोक्ति निश्चित रूप से यह सवाल खड़ा करती है कि कितने और ऐसे गलत फैसले हुए होंगे, जिन्होंने मैच के नतीजों को प्रभावित किया होगा।
बकनर ने एक इंटरव्यू में स्वीकार किया, “हां, मेरी जिंदगी में गलतियां हुई हैं। 2003 में ब्रिसबेन में ऑस्ट्रेलिया बनाम भारत टेस्ट मैच में सचिन तेंदुलकर को एलबीडब्ल्यू आउट देना मेरी सबसे बड़ी गलती थी।” उन्होंने आगे कहा कि उस समय क्रिकेट में ऐसे फैसले आम थे, लेकिन बाद में तकनीक के आने से इसमें काफी सुधार हुआ।
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स्टीव बकनर के इस कबूलनामे के बाद क्रिकेट जगत में मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ लोग इसे उनकी ईमानदारी मान रहे हैं, वहीं कुछ का कहना है कि इतने साल बाद इस गलती को स्वीकार करने का क्या फायदा जब उस फैसले से हुए नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती।
अंपायरिंग की दुनिया और तकनीक का प्रभाव
यह घटना हमें अंपायरिंग की चुनौतियों और खेल में तकनीक के बढ़ते महत्व की याद दिलाती है। डीआरएस (DRS) और अन्य तकनीकी उपकरणों के आने से अब ऐसे फैसलों की संभावना कम हो गई है, लेकिन अंपायर का दबाव और निर्णय लेने की क्षमता आज भी महत्वपूर्ण है। स्टीव बकनर के करियर में यह एक अकेला पल नहीं था, जब उन पर सवाल उठे, लेकिन यह उनकी सबसे यादगार और चर्चित गलतियों में से एक बन गया है।
आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। सचिन तेंदुलकर के करोड़ों प्रशंसक आज भी उस पल को याद करते हैं और शायद बकनर का यह कबूलनामा उन्हें थोड़ा सुकून दे। यह दिखाता है कि इंसान गलतियों से सीखता है और उन्हें स्वीकार करना एक बड़ी बात है।





