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फ़रवरी, 10, 2026
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भारत में हर मोबाइल पर हर पल ‘नज़र’? GPS को लेकर मचेगा नया बवाल

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दिल्ली: क्या आपके स्मार्टफोन का GPS अब आपकी हर छोटी-बड़ी गतिविधि का मूक गवाह बनने वाला है? जिस तकनीक से आप रास्ता पूछते हैं, क्या वही तकनीक अब आपकी हर पल की लोकेशन दर्ज कर, आपकी निजी जिंदगी में एक नई बहस छेड़ सकती है? भारत में एक ऐसा प्रस्ताव हवा में तैर रहा है, जो निजता के अधिकार पर सीधा सवालिया निशान लगाता दिख रहा है.

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दरअसल, कुछ हलकों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि देश में मोबाइल फोन पर ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS) को स्थायी रूप से ‘ऑन’ रखने के लिए कोई नियामक ढांचा तैयार किया जा सकता है. हालांकि, अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा या मसौदा सामने नहीं आया है, लेकिन अगर ऐसा होता है तो यह करोड़ों भारतीय स्मार्टफोन यूजर्स के लिए एक बड़ा बदलाव होगा. यह विचार डिजिटल निगरानी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच एक संवेदनशील संतुलन बनाने की चुनौती खड़ी करता है.

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निजता पर बड़ा सवालिया निशान

अगर यह प्रस्ताव हकीकत बनता है, तो निजता के अधिकार पर इसका गहरा असर पड़ना तय है. भारतीय संविधान के तहत निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है और सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे कई फैसलों में दोहराया है. हर व्यक्ति की लोकेशन हर समय ट्रैक किए जाने का मतलब है कि उसकी निजी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा लगातार दर्ज किया जाएगा.

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विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार GPS डेटा संग्रह से व्यक्तियों के आवागमन, आदतों और व्यक्तिगत पैटर्न के बारे में संवेदनशील जानकारी सामने आ सकती है. इस डेटा के दुरुपयोग की संभावना, चाहे वह व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए हो या निगरानी के लिए, एक गंभीर चिंता का विषय है. डेटा सुरक्षा और इसे कौन एक्सेस कर पाएगा, यह भी एक बड़ा सवाल है, जिस पर गहन विचार-विमर्श की आवश्यकता होगी.

सुरक्षा और सुशासन के तर्क

हालांकि, इस तरह के प्रस्ताव के पीछे सुरक्षा और सुशासन से जुड़े तर्क भी दिए जा सकते हैं. यह माना जा सकता है कि हमेशा ऑन रहने वाला GPS आपातकालीन स्थितियों में लोगों का पता लगाने, आपदा प्रबंधन में सहायता करने, खोए हुए व्यक्तियों को ढूंढने या यहां तक कि अपराधों की जांच में भी मददगार साबित हो सकता है. इससे कानून प्रवर्तन एजेंसियों को त्वरित कार्रवाई करने में सहायता मिल सकती है.

सरकार अक्सर सार्वजनिक सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर डेटा तक पहुंच की वकालत करती है. उनका तर्क हो सकता है कि यह कदम एक अधिक सुरक्षित और कुशल समाज बनाने में मदद करेगा. लेकिन, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि सुरक्षा के नाम पर नागरिकों की निजता का हनन न हो, और एक मजबूत कानूनी व तकनीकी ढांचा मौजूद हो जो डेटा के दुरुपयोग को रोक सके.

तकनीकी और व्यावहारिक चुनौतियाँ

हमेशा GPS ऑन रखने का विचार केवल निजता के दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि तकनीकी और व्यावहारिक स्तर पर भी कई चुनौतियाँ पैदा करता है. स्मार्टफोन की बैटरी लाइफ पर इसका सीधा और नकारात्मक असर पड़ेगा. लगातार GPS सक्रिय रहने से बैटरी तेजी से खत्म होगी, जिससे यूजर्स को बार-बार फोन चार्ज करने की आवश्यकता होगी.

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इसके अलावा, बड़ी मात्रा में लोकेशन डेटा के संग्रह, भंडारण और प्रबंधन के लिए एक विशाल और सुरक्षित बुनियादी ढांचे की आवश्यकता होगी. इस डेटा को सुरक्षित रखना और साइबर हमलों से बचाना भी एक बड़ी चुनौती होगी. डेटा लीक या हैकिंग की स्थिति में करोड़ों लोगों की संवेदनशील जानकारी खतरे में पड़ सकती है, जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं.

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वैश्विक बहस और भारत की राह

दुनियाभर में डिजिटल निजता और सरकार द्वारा डेटा संग्रह को लेकर बहस जारी है. कई देशों में डेटा सुरक्षा कानून बनाए गए हैं, जो नागरिकों की जानकारी को सुरक्षित रखने पर जोर देते हैं. भारत में भी डेटा संरक्षण विधेयक लंबित है, जो ऐसे किसी भी प्रस्ताव के लिए एक महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि प्रदान करेगा.

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में जहां करोड़ों लोग स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं, वहां ऐसे किसी भी नीतिगत बदलाव पर व्यापक जन-चर्चा, विशेषज्ञों की राय और सभी हितधारकों की भागीदारी अत्यंत आवश्यक है. यह देखना होगा कि सरकार निजता और सुरक्षा के बीच किस तरह संतुलन स्थापित करती है और क्या कोई ऐसा समाधान निकाला जा सकता है, जो दोनों पहलुओं का सम्मान करे.

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