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फ़रवरी, 14, 2026
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नेपाल के बाद अब फ्रांस-पेरिस जल उठा…‘ब्लॉक एवरीथिंग’! बवाल, उपद्रव, आगजनी, तोड़फोड़, झड़पें-सरकार के खिलाफ लाखों लोग सड़कों पर, मैक्रों सरकार घिरी!

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नेपाल के बाद फ्रांस में भी बवाल ! पेरिस जल उठा! मैक्रों सरकार के खिलाफ लाखों लोग सड़कों पर, 200 से ज्यादा गिरफ्तार। राष्ट्रपति मैक्रों के इस्तीफ़े की मांग, पुलिस-प्रदर्शनकारियों में भिड़ंत। नेपाल के बाद अब फ्रांस में आगजनी! ‘ब्लॉक एवरीथिंग’ आंदोलन से देशभर में उथल-पुथल।@स्पेशल सेल,देशज टाइम्स।

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संसद से सड़कों तक ‘सब कुछ रोक दो’

200 से अधिक उपद्रवी गिरफ्तार, फ्रांस में सड़कों पर लाठीचार्ज और आंसू गैस – हालात बेकाबू। फ्रांस में मैक्रों सरकार घिरी! बजट कटौती और पेंशन रोक पर जनता फूटी सड़कों पर। नेपाल के बाद फ्रांस में भी उग्र प्रदर्शन! संसद से सड़कों तक ‘सब कुछ रोक दो’ आंदोलन का असर। फ्रांस में राजनीतिक संकट गहराया! एक साल में 4 प्रधानमंत्री बदले, जनता का गुस्सा चरम पर@स्पेशल सेल,देशज टाइम्स।

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नेपाल के बाद फ्रांस में भी बवाल, मैक्रों सरकार के खिलाफ लाखों लोग सड़कों पर | 200 से अधिक गिरफ्तार

नेपाल में उग्र प्रदर्शनों के बाद अब फ्रांस (France) भी राजनीतिक और सामाजिक अस्थिरता (Political Crisis) की चपेट में आ गया है। राजधानी पेरिस (Paris) सहित 30 से ज्यादा शहरों में एक लाख से अधिक लोग राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों (Emmanuel Macron) के खिलाफ सड़कों पर उतर आए।

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प्रदर्शन की मुख्य वजहें

सरकार की बजट नीतियां और भारी कटौती (Budget Cuts), पेंशन और सामाजिक योजनाओं का घटा हुआ बजट, लगातार बदलते प्रधानमंत्री और राजनीतिक अस्थिरता, जनता का मानना कि सरकार अमीर तबके का पक्ष ले रही है और गरीबों को नजरअंदाज कर रही है।

‘ब्लॉक एवरीथिंग’ आंदोलन

सोशल मीडिया से शुरू हुआ यह आंदोलन तेजी से फैल गया। 11 सितंबर से लोगों ने कामकाज ठप करने और सड़कें जाम करने का आह्वान किया। राजधानी पेरिस समेत कई शहरों में आगजनी, तोड़फोड़ और झड़पें हुईं।

हिंसा और पुलिस की कार्रवाई

प्रदर्शनकारियों ने कूड़ेदान जलाए, वाहनों को आग लगाई और पुलिस पर हमला किया। पुलिस ने हालात काबू करने के लिए आंसू गैस के गोले दागेगृह मंत्री ब्रूनो रिटेलो ने बताया कि सिर्फ बुधवार को ही 200 से अधिक उपद्रवियों को गिरफ्तार किया गया।सरकार ने हालात को देखते हुए 80,000 पुलिसकर्मियों की तैनाती की है।

राजनीतिक और संगठनात्मक समर्थन

आंदोलन को वामपंथी दल फ्रांस अनबाउंड (LFI) और कई ट्रेड यूनियनों का समर्थन। यूनियनों ने 18 सितंबर को देशव्यापी हड़ताल का ऐलान किया। इससे साफ है कि यह आंदोलन अब केवल जनता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संगठित राजनीतिक रूप ले चुका है।

राष्ट्रपति मैक्रों की चुनौतियाँ

एक साल में चौथी बार प्रधानमंत्री बदले गए। पूर्व प्रधानमंत्री फ्रांस्वा बायरो विश्वास मत न मिलने पर इस्तीफा दे चुके हैं। राष्ट्रपति मैक्रों ने अब रक्षा मंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू को नया प्रधानमंत्री नियुक्त किया है। चुनौती यह है कि वे संसद को 2026 के बजट पर सहमत करा पाएंगे या नहीं।

जनता का गुस्सा क्यों बढ़ा?

पेंशन और सामाजिक योजनाओं में कटौती और जीवनस्तर में गिरावट और बेरोजगारी… अरबपति उद्योगपतियों जैसे एलवीएमएच के सीईओ बर्नार्ड अर्नाल्ट के खिलाफ नाराजगी है। जनता का मानना है कि सरकार कॉरपोरेट घरानों का साथ दे रही है, जबकि आम जनता की उपेक्षा हो रही है।

स्थिति की गंभीरता

लगातार बदलते प्रधानमंत्री ने प्रशासन की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। बजट घाटा और सामाजिक असंतोष मिलकर हालात को और विस्फोटक बना रहे हैं। यदि समाधान जल्द नहीं निकला तो यह आंदोलन और ज्यादा उग्र और व्यापक हो सकता है।

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