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रह-रह आंखों में चुभती है पथ की निर्जन दोपहरी…हम मान लेते हैं कि ज़िंदगी अभी भी जीने लायक है

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रह-रह आंखों में चुभती है पथ की निर्जन दोपहरी…हम मान लेते हैं कि ज़िंदगी अभी भी जीने लायक है दरभंगा, देशज टाइम्स। गति पर सदा नियंत्रण हो ऐसी ही गति से चलना तुम, यातायात के नियमों के अनुरूप सदा ही ढलना तुम। आप सुरक्षित हम भी सुरक्षित परिवार सुरक्षित रहे सदा, सबकी उम्मीदों के चिराग बन ऐसे सदा ही जलना तुम।

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कारण, हम किसी सफर में नहीं हैं कोई पहाड़ी, नदी या बाग नहीं हम शहर के बीच हैं ये आम दिन हैं सड़क पर फ़ोन बजता है सैंकड़ों वाहनों के बीच बातें करते हैं हम जीवन के रंगों की बातें हैं दफ्तर के रंग बच्चों के रंग जैसे वर्षों से बसंत ढूंढती औरत का रंग छत की मुंडेर से आस्मान में चल पड़ते आदमी का रंग ख़ुद से ही छिपती जाती लड़की का रंग कुछ रंग वर्षों से धुंधले होते गए हैं और हम भूल ही जाते हैं उन्हें यूं सड़क पर फ़ोन पर अपने दिनों पर बातें करते हुए।

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रह-रह आंखों में चुभती है पथ की निर्जन दोपहरी…हम मान लेते हैं कि ज़िंदगी अभी भी जीने लायक हैहालात यही है, शहर हर रोज जाम में फंसता है और हम बड़ी मुश्किल से बेहाली के दौर से निकल पाते हैं। हम मान लेते हैं कि ज़िंदगी अभी भी जीने लायक है। सड़कों की हालत तो दरभंगा की पूछिए ही मत। कालीकरण के नाम पर कालिख पुता है विभाग के दीवारों पर।रह-रह आंखों में चुभती है पथ की निर्जन दोपहरी…हम मान लेते हैं कि ज़िंदगी अभी भी जीने लायक है

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