
तिलका को घसीटते लाए। शरीर पर कोड़ों की लकीरें, कपड़ों पर खून सूख चुका।
आयरकूट आगे बढ़ा: “अब मानोगे न, तू डकैत है?”
तिलका ने सिर उठाया। लाल आंखें। वो लाल आंखें जिनसे कंपनी का इतिहास कांपता था।
हंसा। सिर्फ एक बार।
“रस्सी तन रही है साहब, पर पहाड़ नहीं तनते।
मेरा गला घोंट दोगे, पर राजमहल की हवा नहीं घोंट पाओगे।
आज मुझे लटका दोगे, कल मेरी मिट्टी से हज़ार तिलका उग आएंगे।”
रस्सी खिंची। शरीर झूल गया।
कंपनी ने राहत की सांस ली। “विद्रोह खत्म।
उसी रात राजमहल की पहाड़ियों में आग जली। और आग के साथ एक सुर फूटा:
“तिलका मरा कहां है? वो तो हमारे अंदर जिंदा है।”
जहां फाइल खामोश हुई, वहां लोक बोला महाश्वेता देवी ने पहली बार तिलका को उपन्यास में उतारा – “सालगिरह की पुकार”।

महाश्वेता ने क्या लिखा?
तिलका को शहीद बनाया, डकैत नहीं। आदिवासी अस्मिता का प्रतीक।
ये पहली किताब थी जिसने तिलका को मुख्यधारा के पाठक तक पहुंचाया। 2007 में भागलपुर के इप्टा ने इसका नाट्य मंचन किया।

महाश्वेता का मकसद साफ था – इतिहास का “प्रति-आख्यान” लिखना। वो कहानियां जो कागज़ पर नहीं, लोगों की जुबान पर जिंदा हैं।
‘सालगिरह की पुकार’ में क्या है?
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 1757 के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल-बिहार को निचोड़ना शुरू किया। जंगल-उपज, धान-चावल, सब व्यापार के नाम पर लूट।
आदिवासी विद्रोह: संथाल परगना के संथाल और पहाड़िया अपनी ज़मीन नहीं छोड़ रहे थे। विद्रोह की कमान संभाली “तिलका मांझी” ने।
तिलका का चरित्र: महाश्वेता ने तिलका को अंग्रेजों की “डकैत” वाली छवि से खींचकर माटी का बेटा बना दिया। जंगल, पहाड़, तीर-कमान – सब उसके साथ खड़े थे।
उपन्यास का स्वर: ये इतिहास कम, गौरव-स्मृति ज़्यादा है। सरकारी फाइलें चुप हैं, पर लोक की स्मृति धधक रही है।
आज भी…
कंपनी गई। अंग्रेज गए। फाइलें धूल खा गईं।
पर भादो की रात जब संथाल परगना में हवा चलती है, महुआ महकता है,
कोई फुसफुसाता है – “तिलका मरा कहां है?”
और बच्चे, बूढ़े, जवान एक सुर में कहते हैं –
“वो तो हमारे अंदर जिंदा है।“
किसान के हल में। मज़दूर की हड़ताल में। छात्र के नारे में। मां की लोरी में।
क्योंकि तिलका इंसान नहीं, आग था।
और आग मरती नहीं।
फांसी पर झूला शरीर, पर नहीं झुकी पहाड़ियां।
तिलका मरा कहां है?
वो तो मरता ही नहीं।
वो हर उस हिंदुस्तानी में जिंदा है जो कहता है –
“ये मिट्टी मेरी है, और मैं इसे बिकने नहीं दूंगा।”
| बिंदु | विवरण |
| ईस्ट इंडिया कंपनी का सच | 1770 का अकाल। जब 1 करोड़ लोग मर रहे थे, कंपनी का मुनाफा 1.5 करोड़ से बढ़कर 3 करोड़ हो गया। |
| शोषण का तरीका | नकदी फसलों (नील, अफीम) का दबाव और लगान में 50% तक की बढ़ोतरी। |
| तिलका का जवाब | “भूख की तिजारत” के खिलाफ तीर-कमान का विद्रोह। |
| लोक स्मृति | भागलपुर के इप्टा (IPTA) द्वारा मंचन और आदिवासी अस्मिता का जागरण। |
“अकाल तक बेचा गया” जब लोग मर रहे थे, तब अंग्रेज खजाने भर रहे थे
महाश्वेता देवी ने “सालगिरह की पुकार” में लिखा कि ईस्ट इंडिया कंपनी अकाल के वक्त भी मुनाफे की सोच नहीं छोड़ रही थी। जब लोग मर रहे थे, तब अंग्रेज खजाने भर रहे थे।
1770 का बंगाल-बिहार अकाल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
मुनाफे के लिए अनाज की तिजारत
भंडारण और जमाखोरी: कंपनी के अफसर और उसके दलाल व्यापारी अनाज खरीदकर गोदामों में भर लेते थे। जब अकाल पड़ा और अनाज की कमी हुई तो वही अनाज 3-4 गुना दाम पर बेचा गया।
किसानों को रोकना: कंपनी ने किसानों को अनाज भंडार करने से मना कर दिया था। पहले किसान 2-3 महीने खेत परती छोड़ देते थे ताकि जमीन की उर्वरा शक्ति बनी रहे। कंपनी ने दबाव डालकर नकदी फसल जैसे नील, अफीम उगवाई। नतीजा – खाने का अनाज कम पैदा हुआ।

टैक्स में कोई रियायत नहीं
1765 में कंपनी को बंगाल की दीवानी मिल गई। राजस्व 10% से बढ़ाकर 50% कर दिया गया।
1769 में मानसून फेल हुआ, फसल बर्बाद हो गई। 1770 में अकाल शुरू हुआ। पर कंपनी ने लगान वसूलना बंद नहीं किया।
अकाल के साल 1770 में ही कंपनी का मुनाफा 1.5 करोड़ से बढ़कर 3 करोड़ रुपये हो गया।

राहत के नाम पर कुछ नहीं
ब्रिटिश प्रशासन के पास राहत के लिए कोई नीति नहीं थी।
नतीजा: 1 करोड़ लोग मरे, यानी बंगाल-बिहार की 1/3 आबादी खत्म। खेत खाली हो गए, गांव उजड़ गए।
यही वजह थी कि संथाल, पहाड़िया, तिलका मांझी भड़के। कंपनी जंगल के महुए, तेंदू, धान पर कब्जा कर रही थी। बाजार को हथियार बना रही थी। खाना कम, टैक्स ज्यादा, और अकाल में भी अनाज बिक रहा था।
तिलका ने इसी को “भूख की तिजारत” कहा था। उसके लिए ये सिर्फ आर्थिक शोषण नहीं था, ये आदिवासी की जमीन, जंगल और अस्तित्व पर हमला था।
सीधी बात: कंपनी ने अकाल को “आपदा” नहीं, “अवसर” माना। जब लोग मर रहे थे, तब उसके खजाने भर रहे थे। इसी गुस्से ने 1771 में तिलका के नेतृत्व में विद्रोह को जन्म दिया।







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