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अगर पत्रकारिता को कुछ हो गया तो…Manoranjan Thakur के साथ

पत्रकारों को समझना होगा, पत्रकारिता किसके लिए और क्यों? बंटवारा हो गया। एक जिस्म था। कई हिस्से हो गए। समाज बंट गया। देश बंटा। भारत के दर्शक बंटे। पाठक बंट गए। मीडिया खंड-खंड होकर एक्सपोज हो गया। डिजायनर पत्रकार आगे बढ़ गए। जो सच बोल रहा था, धकेल दिए गए। ऐसे में, अगर पत्रकारिता को कुछ हो गया तो...आगे हम और बातें करेंगे, पत्रकारिता का चरित्र सत्यापन करते रहेंगे...फिलहाल, 14 गिरामी पत्रकारों पर बैन, क्या कहलाता है...

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उन बेजुबान मोमबत्तियों का क्या जो जंतर-मंतर पर पिघल गईं…असंख्य। उन नारों के शब्द गुम पड़ गए…अचानक। आंसू जो बहे, सूख गए…तत्काल। शोर जो थे, शांत हो गए…अनायास। आखिर हुआ क्या…ये शोर कहां से उठा। ये मोमबत्तियां किसने खरीदी। वो आंसू कहां से बंधक लिए गए।

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देश आज एक-दूसरे, हर किसी से खतरे में है। कोई ट्वीट x कर दे तो खतरा। कोई फेसबुक पर लिख दे तो खतरा। कोई मीम बना दे तो खतरा। कोई कार्टून शेयर कर ले तो हमला। कोई वीडियो बना दे तो बलवा।

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इन सबके बीच पत्रकारों की फजीहत का फंसाना ही कुछ और है। शायद, पत्रकारिता की राजनीति बदल रही है। कोई चिल्लाता है। कोई उसे दुत्कारता है। कोई अपनी शान में है। कोई नुकसान में है, मगर पत्रकारिता हो रही है।

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बाजार सज रहे हैं। दर्शक खरीदे जा रहे हैं। पाठकों की साख बेची जा रही है। अंडरवर्ल्ड, माफिया, ड्रग्स, नशा, धमकी, वसूली, हत्या जैसे शब्द मुंबई कल्चर में जबरिया कहां से शामिल कर लिए गए। या हाथरस में एक महिला रिपोर्टर की हाथ मरोड़ती पुलिस की तस्वीर कैसें और क्यों हमें विचलित नहीं कर रही।

क्यों, हम इसे अब सिस्टम का हिस्सा मानकर, आंखें मूंदें, चुपचाप, घिनौने रूप में सामने बैठे हैं। और वहीं, उसी मंच पर सार्वजनिक हिस्से में एक दूसरे को लपेटते, घसीटते, मर्यादा तोड़ते, पत्रकारिता का दंभ परास्त होता दिख रहा है। आखिर, ये सिलसिला कहां जाकर थमेगा…।. पत्रकारिता कबतलक, क्यों और कैसे असुरक्षित माहौल में कोने में दुबकता दिख रहा है, या दिखता रहेगा।

कोई पैपराजी से परेशान, वल्चर की बातों में मशगूल, किसी अभिनेत्री के प्राइड में खोने से लेकर लिंचिंग तक जब किसी इंटरव्यू में मुख्य संदेही ही कहे…तो क्या हम आत्महत्या कर लें, फिर कौन जिम्मेदार होगा…।

शायद, पत्रकारिता का दूसरा पहलु इसी खुदकुशी की ओर है…अग्रसर। इसे देखने, उसे
समझने की कुछ हितैषी, पेशानी पर बल आ जाने के बाद भी घबराहट में कतई कोई नहीं है। सभी, पत्रकारिता को बिकते देख रहे हैं…आकंठ उसी डूबती नाव पर सवार होकर जिस ओर आज की पत्रकारिता आगे बढ़ती, बंटती दिख रही…।

भारत में इस समय 1 लाख से ज्यादा समाचार पत्र और पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं। अलग-अलग भाषाओं में हर रोज 17 हजार से ज्यादा अखबारों का प्रकाशन होता है। इनकी 10 करोड़ प्रतियां हर रोज छपती हैं। भारत में 24 घंटे न्यूज़ दिखाने वाले चैनलों की संख्या 400 से ज्यादा है।

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56 करोड़ यूजर्स के साथ भारत सोशल मीडिया के मामले में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बाजार है। इस मामले में चीन पहले नंबर पर है। यानी, कभी अखबारों के जरिए, कभी न्यूज़ चैनलों के जरिए, तो कभी सोशल मीडिया के जरिए भारत के लोग हर समय सूचनाओं से घिरे रहते हैं।

और, इन्हीं सूचनाओं के आधार पर आप यह तय करते हैं कि देश किस दिशा में जा रहा है। लेकिन, सूचनाओं के अंबार के बीच आज सबसे बड़ी चुनौती पत्रकारिता की साख का है। उसके सम्मान का है। मर्यादा का है।

तेजपाल की गिरफ्तारी के साथ ही राजनेता-पत्रकार के गहरे रिश्ते दाग अच्छे हैं, के मानिंद बिल्कुल साफ हो चुके थे। तहलका दफ्तर में ताला जड़ने की नौबत और आग व गर्मी के इस याराने में तय उसी वक्त सबकुछ हो चुका था, जो जितना ओहदे, नामवाला, ताकतवर पत्रकार वो नेताओं, उद्योगपति, बॉलीवुड के उतने ही खास। उतनी ही करीब। उतना ही पास-पास।

ऐसे में, मीडिया आज कहां है! कहीं यह दूसरों की ईमान खरीदते, कहीं खुद को बेचते, खरीददार तलाशते, टटोलते, उसी के बहकावे में खुद का चरित्र गढ़ते, बेपर्द आवरण में स्वयं को दोराहे पर खड़ा करने की जिद पर आमादा उसी में जीने, दिखने, परोसने, सांझा करने की हड़बड़ी लिए उसी कोशिश, कशमकश में आज पत्रकारिता कहां आ खड़ा है, सबके सामने है।

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आज फड़फड़ाते, हांफते मीडिया के चेहरे उसके दोयम, दागदार, पक्षपाती शब्दावली से इनकार या स्वीकार करने की गलती में एक वर्ग का यूं रूठ जाना कदापि, पत्रकारिता के लिए खुशहाल माहौल का संकेत नहीं है।

पार्टी लाइन पर बडे़-बडे़ मीडिया घरानों की नूराकुश्ती, दौड़-भाग करते उनके संपादकों के घनघनाते फोन, कहीं राज्यसभा पहुंचने की चाहत, जल्दीबाजी। कहीं माल बोरे में भरने, बांटने, बंटोरने की जल्दबाजी ने, एक अंधकार सरीखे पत्रकारिता को ढ़क, शिकंजे में कस लिया है, जहां पूरे खबर तंत्र से विश्वास का टूटना जगजाहिर है।

चौदह पत्रकारों पर बैन, समय का तकाजा है। समय की मांग है। राजनीतिक जरूरत के बदलते परिवेश का हिस्सा भर है। कभी, नए अखबार को लाने से पहले संपादक प्रबंधन से पूछता था, प्रो तो नहीं, अगर प्रो है…तो मैं संपादक नहीं बन सकता। आज, पत्रकारिता की प्रकृति ही प्रो हो चुकी है। विपक्ष हाशिए पर खड़ा है। उसे दुत्कार ही मिलती दिख रही। सत्कार के शब्द उसके लिए खत्म सरीखे हो चुके हैं। ऐसे में, पत्रकारों को समझना होगा, पत्रकारिता किसके लिए और क्यों?

बंटवारा हो गया। एक जिस्म था। कई हिस्से हो गए। समाज बंट गया। देश बंटा। भारत के दर्शक बंटे। पाठक बंट गए। मीडिया खंड-खंड होकर एक्सपोज हो गया। डिजायनर पत्रकार आगे बढ़ गए। जो सच बोल रहा था, धकेल दिए गए। ऐसे में, अगर पत्रकारिता को कुछ हो गया तो…आगे हम और बातें करेंगे, पत्रकारिता का चरित्र सत्यापन करते रहेंगे…मनोरंजन ठाकुर के साथ।

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