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1 सितम्बर, 2024
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“पत्नी कोई संपत्ति नहीं!” द्रौपदी का जिक्र, Recorded Call पर मुहर –अब पति की रिकॉर्ड की गई कॉल बन सकती है तलाक का सबूत! Supreme Court का Big Decision

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“निजता” या “सच” – किसे माने अदालत? अब पति की रिकॉर्ड की गई कॉल बन सकती है तलाक का सबूत! सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला। “पत्नी कोई संपत्ति नहीं!” कोर्ट ने द्रौपदी उदाहरण देकर बदली सोच – पढ़िए सुप्रीम कोर्ट का संदेश। “गोपनीयता सीमित है” – कोर्ट ने कहा: पति-पत्नी के बीच की रिकॉर्डिंग वैवाहिक मामलों में जरूरी हो सकती है। द्रौपदी का जिक्र, कॉल रिकॉर्डिंग पर मुहर – सुप्रीम कोर्ट का फैसला बदलेगा वैवाहिक विवादों की दिशा@दिल्ली-देशज टाइम्स।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: वैवाहिक विवादों में कॉल रिकॉर्डिंग अब वैध साक्ष्य

नई दिल्ली, देशज टाइम्स। भारतीय समाज में विवाह को पवित्र और अटूट बंधन माना जाता है, लेकिन जब यह संबंध विवादों और अलगाव की ओर बढ़ता है, तो अदालतों को बीच-बचाव करना पड़ता है। इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिससे वैवाहिक मामलों में तकनीकी सबूतों का महत्व बढ़ गया है।

कॉल रिकॉर्डिंग को अब कोर्ट में माना जाएगा वैध साक्ष्य

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि यदि पति अपनी पत्नी की जानकारी के बिना कॉल रिकॉर्ड करता है, तो उसे तलाक या वैवाहिक विवादों में साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। यह फैसला पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के उस निर्णय को पलटते हुए दिया गया जिसमें कॉल रिकॉर्डिंग को निजता का उल्लंघन बताते हुए खारिज किया गया था।

निजता बनाम वैवाहिक पारदर्शिता

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा: वैवाहिक जीवन में निजता का अधिकार सीमित होता है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 122 के तहत पति-पत्नी के बीच की बातचीत गोपनीय होती है, लेकिन तलाक जैसे मामलों में यह छूट मिलती है।कोर्ट ने कहा कि: अक्सर घटनाएं सिर्फ पति-पत्नी के बीच होती हैं, जिनका कोई प्रत्यक्ष गवाह नहीं होता। ऐसे में तकनीकी सबूत, जैसे कि कॉल रिकॉर्डिंग, महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

मामले की पृष्ठभूमि: बठिंडा से सुप्रीम कोर्ट तक

यह केस पंजाब के बठिंडा से जुड़ा है, पति ने तलाक की अर्जी देते समय पत्नी की कॉल रिकॉर्डिंग प्रस्तुत की। फैमिली कोर्ट ने इसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया। पत्नी ने हाईकोर्ट में इसे चुनौती दी, जहां रिकॉर्डिंग को अवैध ठहराया गया। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां हाईकोर्ट का फैसला पलट दिया गया।

निजता का अधिकार पूर्ण नहीं: सुप्रीम कोर्ट

पति के वकील ने तर्क दिया कि निजता का अधिकार पूर्ण और अबाधित नहीं है। कोर्ट ने माना कि अनुच्छेद 21 के तहत निजता का अधिकार सामाजिक संतुलन और न्याय के सिद्धांतों के साथ देखा जाना चाहिए। सत्य की खोज और जनहित में निजता का संयमित प्रयोग किया जा सकता है।

व्यभिचार और स्त्री अधिकारों पर भी चर्चा

दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में एक फैसले में कहा कि, पत्नी को पति की संपत्ति मानने की पितृसत्तात्मक मानसिकता अब असंवैधानिक है। यह सोच महाभारत काल से चली आ रही है, जब द्रौपदी को जुए में दांव पर लगा दिया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि स्त्री अब कोई निर्बल पात्र नहीं, बल्कि स्वतंत्र और संवैधानिक अधिकारों से सशक्त नागरिक है।

 तकनीक, पारदर्शिता और समानता 

यह फैसला न केवल तकनीकी सबूतों को वैधता देता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि सत्य और न्याय की तलाश में निजता के दायरे का पुनर्मूल्यांकन किया जा सकता है। 

साथ ही, यह समाज को यह संदेश देता है कि स्त्रियों को वस्तु नहीं, सम्मान और समान अधिकारों वाली इकाई माना जाए। यह निर्णय भारतीय न्यायपालिका द्वारा पारदर्शिता, समानता और सामाजिक सुधार की दिशा में एक ऐतिहासिक और निर्णायक कदम है।

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