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मार्च, 17, 2026
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प्रेम कुमार बने बिहार विधानसभा के 18वें अध्यक्ष, लेकिन क्या आप पहले स्पीकर का नाम और 87 साल पुरानी कहानी जानते हैं?

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बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तहत गया शहर के अनुभवी विधायक प्रेम कुमार को बिहार विधानसभा का 18वां अध्यक्ष निर्विरोध चुन लिया गया है। सदन में ध्वनिमत से उनके नाम पर मुहर लगी, जिसके बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने उन्हें आसन तक पहुंचाया। प्रेम कुमार का लंबा राजनीतिक अनुभव रहा है और वह पहले भी कई महत्वपूर्ण पदों पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं।

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आजादी से भी पुराना है स्पीकर पद का इतिहास

भले ही प्रेम कुमार 18वें अध्यक्ष बने हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बिहार विधानसभा अध्यक्ष पद का इतिहास भारत की आजादी से भी पुराना है? इसकी नींव ब्रिटिश शासन काल में ही रख दी गई थी, जब ‘भारत सरकार अधिनियम, 1935’ के तहत प्रांतों को सीमित स्वायत्तता देने का प्रावधान किया गया। इसी कानून के आधार पर भारत के कई प्रांतों में पहली बार विधानसभा चुनावों का रास्ता साफ हुआ।

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1937 का ऐतिहासिक चुनाव और पहली सरकार

साल 1937 में इस अधिनियम के तहत बिहार में भी प्रांतीय चुनाव कराए गए। यह चुनाव बिहार के राजनीतिक इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ। उस दौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने चुनावों में शानदार प्रदर्शन करते हुए बहुमत हासिल किया था। चुनाव के बाद बिहार में पहली बार एक निर्वाचित सरकार का गठन हुआ, जिसका नेतृत्व डॉ. श्रीकृष्ण सिंह ने किया, जिन्हें उस समय ‘प्रीमियर’ कहा जाता था।

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उस ऐतिहासिक चुनाव से जुड़ी कुछ खास बातें:

  • चुनाव का वर्ष: 1937
  • कानूनी आधार: भारत सरकार अधिनियम, 1935
  • प्रमुख राजनीतिक दल: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
  • परिणाम: कांग्रेस ने बहुमत हासिल कर सरकार बनाई

श्री रामदयालु सिंह: बिहार के पहले स्पीकर

जब 1937 में पहली विधानसभा का गठन हुआ, तो सदन के संचालन के लिए एक अध्यक्ष की आवश्यकता थी। इस ऐतिहासिक पद के लिए श्री रामदयालु सिंह को चुना गया। उन्होंने 23 जुलाई, 1937 को बिहार विधानसभा के पहले अध्यक्ष के रूप में पदभार ग्रहण किया। उन्होंने उस चुनौतीपूर्ण दौर में सदन की कार्यवाही के लिए नियम और परंपराएं स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस प्रकार, बिहार विधानसभा का अध्यक्ष पद एक ऐसी विरासत है जो स्वतंत्रता संग्राम के दिनों से चली आ रही है और आज भी लोकतंत्र के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में कायम है।

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