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मार्च, 5, 2026
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सिम बाइंडिंग का नया फरमान: WhatsApp, Telegram हुए अलर्ट, अब इन ऐप्स के बिना नहीं चलेंगे

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नई दिल्ली: डिजिटल दुनिया में एक बड़ा बदलाव आने वाला है। दूरसंचार विभाग (DoT) के एक कड़े निर्देश के बाद अब WhatsApp, Telegram, Signal जैसे लोकप्रिय मैसेजिंग ऐप्स को इस्तेमाल करने के लिए आपके डिवाइस में एक्टिव सिम कार्ड का होना अनिवार्य होगा। यह नया नियम उन यूजर्स के लिए खास तौर पर मायने रखता है जो बिना सिम वाले टैबलेट या अन्य डिवाइस पर इन ऐप्स का उपयोग करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम ओवर-द-टॉप (OTT) प्लेटफॉर्म पर सरकार के नियंत्रण को और मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम हो सकता है।

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बता दें कि टेक कंपनियां पहले से ही आशंका जता रही थीं कि नया टेलीकॉम एक्ट 2023, OTT ऐप्स को भी अपने दायरे में ला सकता है। हालांकि, शुरुआत में यह कहा गया था कि OTT इस कानून के दायरे से बाहर रहेंगे, लेकिन DoT का यह नया आदेश उन आशंकाओं को बल देता दिख रहा है।

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कानूनी विशेषज्ञों की चिंता और अधिकार क्षेत्र पर सवाल

यह नया निर्देश जारी होने के बाद कई कानूनी विशेषज्ञ इसे दूरसंचार विभाग के अधिकार क्षेत्र से बाहर का कदम मान रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट की वकील वृंदा भंडारी के अनुसार, यह फैसला सीधे तौर पर मैसेजिंग ऐप्स के नियमन जैसा है, जबकि इस तरह के ऐप्स का अधिकार क्षेत्र पारंपरिक रूप से सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के पास रहा है।

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एक अन्य विशेषज्ञ ऐश्वर्या कौशिक का मानना है कि कोई भी ऐसी सेवा जो मोबाइल नंबर का उपयोग करती है, उसे DoT के साइबर सुरक्षा ढांचे में शामिल करना एक बड़ा विस्तार है। उनका तर्क है कि DoT के अधिकार मुख्य रूप से टेलीकॉम पहचान की सुरक्षा तक ही सीमित रहने चाहिए।

बार-बार लॉग-इन की झंझट, प्राइवेसी पर भी खतरा?

DoT ने WhatsApp, Telegram, Snapchat, Signal और अन्य ऐप्स को बाकायदा नोटिस भेजकर निर्देश दिया है कि यूजर्स का सिम कार्ड उनके अकाउंट से लगातार जुड़ा रहना चाहिए। इसका सीधा मतलब यह है कि बिना सिम वाले डिवाइस पर इन ऐप्स का इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा।

इतना ही नहीं, WhatsApp Web जैसे वेब संस्करणों को हर छह घंटे में ऑटो-लॉगआउट कर दिया जाएगा। यूजर्स को हर बार QR कोड स्कैन करके अपने अकाउंट को दोबारा लिंक करना होगा। सरकार इस कदम को डिजिटल धोखाधड़ी रोकने के उपाय के तौर पर पेश कर रही है, लेकिन डिजिटल अधिकारों के पैरोकारों को यूजर्स की निजता पर गंभीर खतरा मंडराता दिख रहा है।

यूजर्स पर बढ़ेगा कानूनी बोझ, तकनीकी चुनौतियां भी गंभीर

विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार सिम-बाइंडिंग की बाध्यता से यह धारणा बन सकती है कि किसी भी डिजिटल गड़बड़ी या धोखाधड़ी के लिए सिम कार्ड धारक ही जिम्मेदार है। इससे यूजर्स पर अनावश्यक कानूनी बोझ बढ़ सकता है, भले ही उन्होंने ऐसा कुछ न किया हो।

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इसके अतिरिक्त, तकनीकी रूप से सिम-बाइंडिंग को प्रभावी ढंग से लागू करना मैसेजिंग ऐप्स के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है। गार्टनर की विश्लेषक अपेक्षा कौशिक के अनुसार, यह तरीका धोखाधड़ी रोकने में सहायक तो हो सकता है, लेकिन अगर इसे ठीक से लागू नहीं किया गया तो यह वास्तविक यूजर्स के लिए परेशानी का सबब भी बन सकता है।

नए साइबर नियमों का आधार और कानूनी पेंच

टेलीकॉम एक्ट 2023 के लागू होने के बाद DoT ने कई नए नियम जारी किए हैं, जिनमें इंटरनेट शटडाउन, साइबर सुरक्षा और कानूनी निगरानी जैसे पहलू शामिल हैं। 2025 में जारी टेलीकम्युनिकेशंस (टेलीकॉम साइबर सिक्योरिटी) अमेंडमेंट रूल्स ने मोबाइल नंबर वैलिडेशन प्लेटफॉर्म का मार्ग प्रशस्त किया, जिसके तहत अब ऐप्स को सिम-बाइंडिंग लागू करने का निर्देश दिया गया है। हालांकि, यह ध्यान देने योग्य है कि नियमों में “कंटीन्यूअस सिम-बाइंडिंग” जैसी कठोर शर्त सीधे तौर पर उल्लेखित नहीं है।

बैंकिंग ऐप्स से तुलना: अंतर और प्रभाव

भारत में SBI सहित कई बैंकिंग ऐप्स SIM-binding जैसी सुरक्षा सुविधा प्रदान करते हैं, लेकिन वे असल में डिवाइस-बाइंडिंग का उपयोग करते हैं, न कि सीधे सिम-बाइंडिंग का। विशेषज्ञों का कहना है कि DoT का नया आदेश मैसेजिंग ऐप्स के लिए एक तरह से डी-फैक्टो व्हाइटलिस्ट जैसा प्रभाव पैदा करेगा। यानी, जो ऐप इन नई शर्तों को पूरा करेगा, वही भारत में काम कर पाएगा।

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टेलीकॉम कंपनियों में खुशी, टेक कंपनियों में नाराजगी

टेलीकॉम कंपनियों ने इस आदेश का गर्मजोशी से स्वागत किया है। COAI ( ) ने इसे साइबर धोखाधड़ी रोकने के लिए “दुनिया में पहली बार लागू की गई एक मजबूत पहल” बताया है। वहीं, दूसरी ओर Google और Meta जैसी बड़ी कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले ब्रॉडबैंड इंडिया फोरम (Broadband India Forum) ने इस निर्देश पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।

उनका कहना है कि इस नियम को लागू करने की समय-सीमा बढ़ाई जानी चाहिए, एक खुली सार्वजनिक परामर्श प्रक्रिया शुरू की जाए, और टेक कंपनियों व सुरक्षा विशेषज्ञों के साथ मिलकर एक नया और संतुलित ढांचा तैयार किया जाए। उनका मानना है कि यह आदेश अनावश्यक नियंत्रण को बढ़ावा देगा और यूजर्स की सुविधा व निजता को नुकसान पहुंचा सकता है।

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