



Herbal Gulal: रंगोत्सव की आहट के साथ ही बाजार में एक बार फिर उमंग और उल्लास का दौर शुरू हो गया है। इस बार होली में सिर्फ रंग नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता का संकल्प भी घुल रहा है। बिहार के जाले में ग्रामीण महिलाओं ने हर्बल गुलाल बनाकर न केवल अपनी किस्मत के रंग भरे हैं, बल्कि दूसरों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन गई हैं।
होली में हर्बल गुलाल की बढ़ती मांग: जाले की महिलाएं बनीं आत्मनिर्भर
हर्बल गुलाल: स्वरोजगार की नई राह
जाले। कृषि विज्ञान केंद्र में अनुसूचित जाति परियोजना के अंतर्गत ग्रामीण युवाओं और युवतियों के लिए आयोजित चार दिवसीय हर्बल गुलाल (अबीर) निर्माण प्रशिक्षण का समापन सफलतापूर्वक हो गया है। इस प्रशिक्षण के माध्यम से युवाओं और महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़कर आत्मनिर्भर बनाने का महत्वपूर्ण लक्ष्य रखा गया था।
केंद्र के अध्यक्ष सह वरीय वैज्ञानिक डॉ. दिव्यांशु शेखर ने इस पहल पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हर्बल अबीर न केवल त्वचा के लिए सुरक्षित है, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी है। उन्होंने बताया कि होली के अवसर पर बाजार में इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है और इसके लिए अच्छी कीमत भी मिल सकती है, जिससे इन महिलाओं की आय में वृद्धि होगी। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।प्रशिक्षण की संयोजिका और गृह वैज्ञानिक डॉ. पूजा कुमारी ने प्रतिभागियों को सैद्धांतिक और व्यवहारिक दोनों तरह का नि:शुल्क प्रशिक्षण प्रदान किया। उन्होंने विस्तार से बताया कि कैसे चुकंदर से आकर्षक गुलाबी रंग, हल्दी से चमकीला पीला, पालक और धनिया से हरा, तथा गेंदे के फूल से नारंगी जैसे प्राकृतिक रंग तैयार कर उनसे हर्बल गुलाल बनाया जाता है। सूखे अवशेषों में अरारोट मिलाकर गुलाल तैयार किया जाता है और सुगंध के लिए गुलाब जल या इत्र का उपयोग किया जा सकता है। डॉ. पूजा ने रासायनिक गुलाल के खतरों के प्रति भी आगाह किया। उन्होंने बताया कि रासायनिक गुलाल में मौजूद केमिकल्स से चर्म रोग और एलर्जी जैसी कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती हैं, जबकि हर्बल गुलाल पूरी तरह सुरक्षित है और प्राकृतिक रंगों से बना है।प्रशिक्षण कार्यक्रम में बेलवारा, सिंघवारा, जाले और राढ़ी जैसे विभिन्न क्षेत्रों से कुल 27 युवक-युवतियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। इस अवसर पर वैज्ञानिक कृषि अभियंत्रण ई. निधि कुमारी, प्रक्षेत्र प्रबंधक डॉ. चंदन कुमार, संजीव कुमार सहित अन्य कर्मी भी उपस्थित रहे। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
रासायनिक गुलाल के खतरे और प्राकृतिक रंग का महत्व
यह पहल न केवल महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त कर रही है, बल्कि उन्हें एक स्वस्थ और सुरक्षित विकल्प प्रदान करने में भी सहायक सिद्ध हो रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में इस प्रकार के कौशल विकास कार्यक्रम आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान करते हैं। होली के त्योहार पर जब रंग हवा में घुलेंगे, तो उनमें इन महिलाओं की मेहनत और स्वावलंबन की खुशबू भी होगी। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
यह एक ऐसा प्रयास है जो न केवल त्योहारों को और भी रंगीन बना रहा है, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव भी ला रहा है। ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देने वाले ऐसे कार्यक्रमों से देश में आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने में मदद मिल रही है।


