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Rangbhari Ekadashi 2026: रंगभरी एकादशी 2026: काशी में शिव-पार्वती गौने संग होली का आगाज़

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Rangbhari Ekadashi 2026: फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को रंगभरी एकादशी के नाम से जाना जाता है। यह पावन पर्व भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है और इसी दिन से काशी में होली के उत्सव का श्रीगणेश होता है, जो रंग और भक्ति के अनूठे मेल का प्रतीक है। आइए, इस शुभ अवसर पर जानते हैं इसका महत्व, पूजा विधि और पौराणिक कथा।

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Rangbhari Ekadashi 2026: रंगभरी एकादशी 2026: काशी में शिव-पार्वती गौने संग होली का आगाज़

सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित एकादशी व्रत अत्यंत पुण्यदायी माने जाते हैं, और इनमें से रंगभरी एकादशी 2026 का विशेष स्थान है। यह एकादशी भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के बाद उनके प्रथम गौने के रूप में मनाई जाती है, जिसे लेकर भक्तों में अपार उत्साह देखा जाता है। इस दिन आमला एकादशी के रूप में आंवले के वृक्ष की पूजा का भी विधान है, जो सभी पापों का नाश कर मोक्ष प्रदान करने वाला माना जाता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

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Rangbhari Ekadashi 2026: रंगभरी एकादशी 2026 का पौराणिक महत्व और पूजा विधि

रंगभरी एकादशी का पौराणिक महत्व अत्यंत गहरा है। मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव विवाह के उपरांत माता पार्वती को पहली बार काशी लेकर आए थे। यह दिन उनका गौना कहलाता है और इसी के साथ काशी में रंगोत्सव की शुरुआत हो जाती है, जो फाल्गुन पूर्णिमा यानी होलिका दहन तक चलता है। इस दिन महादेव अपने गणों के साथ माता पार्वती और अन्य देवी-देवताओं संग रंग खेलते हैं।

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काशी विश्वनाथ और रंगभरी एकादशी का अनूठा संबंध

काशी विश्वनाथ धाम में रंगभरी एकादशी का दृश्य अलौकिक होता है। इस दिन बाबा विश्वनाथ की पालकी यात्रा निकाली जाती है, जिसमें माता पार्वती और गणेश जी भी साथ होते हैं। भक्त अबीर-गुलाल उड़ाते हुए हर-हर महादेव के जयकारों के साथ इस यात्रा में शामिल होते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसे देखकर ऐसा लगता है मानो स्वर्ग से देवता स्वयं इस रंगोत्सव में भाग ले रहे हों। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

आंवले के वृक्ष की पूजा का महत्व

रंगभरी एकादशी को आमला एकादशी या आमलकी एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि आंवले के वृक्ष में भगवान विष्णु और सभी देवी-देवताओं का वास होता है। आंवले के वृक्ष की पूजा करने, उसके नीचे बैठकर भोजन करने और गरीबों को आंवले दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। यह पापों का शमन कर आरोग्य और सौभाग्य प्रदान करता है।

रंगभरी एकादशी व्रत की संपूर्ण पूजा विधि

  • एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • हाथ में जल और पुष्प लेकर व्रत का संकल्प लें।
  • भगवान विष्णु और शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित करें।
  • भगवान विष्णु को चंदन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य अर्पित करें।
  • शिव-पार्वती को गुलाल, अबीर, बेलपत्र, भांग, धतूरा, अक्षत, पुष्प अर्पित करें।
  • आंवले के वृक्ष के पास जाकर उसकी जड़ में जल दें और हल्दी, कुमकुम, अक्षत अर्पित करें।
  • आंवले के वृक्ष की परिक्रमा करें और उसके नीचे बैठकर भगवान विष्णु का ध्यान करें।
  • दिनभर निराहार या फलाहार रहकर व्रत करें।
  • शाम को आरती करें और अगले दिन पारण करें।

शुभ मुहूर्त और पारण का समय (Rangbhari Ekadashi 2026)

विवरणसमय (मार्च 2026)
रंगभरी एकादशी तिथि आरंभ1 मार्च 2026, रविवार, रात्रि 09:30 बजे
रंगभरी एकादशी तिथि समाप्त2 मार्च 2026, सोमवार, रात्रि 11:45 बजे
पारण का समय3 मार्च 2026, मंगलवार, प्रातः 06:30 बजे से प्रातः 10:30 बजे तक

रंगभरी एकादशी व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में राजा चेदि के पुत्र चंद्रहास ने आमलकी एकादशी के दिन आंवले के वृक्ष की पूजा की थी। एक बार वह जंगल में शिकार खेलने गए, जहां डाकुओं ने उन्हें घेर लिया। डाकुओं के प्रहार से वे अचेत हो गए। डाकुओं ने उन्हें मारने का प्रयास किया, लेकिन उनके शरीर से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई जिसने सभी डाकुओं का संहार कर दिया। होश में आने पर चंद्रहास ने देखा कि सभी डाकू मरे पड़े थे। उन्हें ज्ञात हुआ कि यह सब आमलकी एकादशी व्रत और आंवले के वृक्ष की पूजा के प्रभाव से हुआ था। तभी से इस एकादशी का महत्व और बढ़ गया।

भगवान विष्णु का प्रिय मंत्र

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

इस मंत्र का जाप करने से भगवान विष्णु शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

निष्कर्ष और उपाय

रंगभरी एकादशी का पावन पर्व हमें भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का अवसर देता है। इस दिन व्रत रखने और विधि-विधान से पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है, सभी पापों का नाश होता है और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन विशेष रूप से शिव-पार्वती को अबीर-गुलाल चढ़ाना और आंवले का सेवन करना अत्यंत शुभ माना जाता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
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