
Manjusha Art: रंगों की दुनिया में जब परंपरा की कूची चलती है, तो इतिहास कैनवास पर जीवंत हो उठता है। बिहार की इसी गौरवशाली विरासत को सीखने के लिए अब शिलांग के निफ्ट (NIFT) के छात्र भागलपुर की धरती पर पहुँचे हैं, जहाँ वे इस कला की बारीकियों को समझ रहे हैं।
भागलपुर के जीरो माइल स्थित रेशम भवन में इन दिनों कला और संस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। यहाँ वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार के डीसी (हैंडलूम/टेक्सटाइल) के सहयोग से उपेंद्र महारथी शिल्प अनुसंधान संस्थान द्वारा 50 दिवसीय मंजूषा पेंटिंग गुरु-शिष्य प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इसी कार्यक्रम के तहत मंगलवार को प्रतिभागियों की प्रायोगिक परीक्षा का आयोजन किया गया।
इस विशेष अवसर पर शिलांग, मेघालय के निफ्ट के विद्यार्थी भी मौजूद रहे, जो मंजूषा प्रशिक्षक मनोज कुमार पंडित के मार्गदर्शन में इस कला की गहराइयों को सीखने पहुँचे थे। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। प्रशिक्षक मनोज कुमार पंडित के नेतृत्व में यह परीक्षा अनुकृति कुमारी द्वारा सफलतापूर्वक संपन्न कराई गई, जिसमें सभी चयनित प्रतिभागियों ने पूरे उत्साह के साथ भाग लिया।
क्या है Manjusha Art और क्यों सीख रहे निफ्ट के छात्र?
प्रतिभागियों ने इस 50 दिवसीय कार्यशाला के दौरान सीखी गई कला का प्रदर्शन अपनी प्रायोगिक परीक्षा में किया। उन्होंने अपनी प्रैक्टिकल कॉपियाँ और कलाकृतियाँ जमा कीं। इस दौरान, शिलांग निफ्ट से आए विद्यार्थियों के समूह ने प्रशिक्षण कार्यक्रम में गहरी रुचि दिखाई। उन्होंने न केवल प्रतिभागियों द्वारा बनाए गए वस्त्रों, पेंटिंग्स और अन्य कलाकृतियों का बारीकी से अवलोकन किया, बल्कि इस अनूठी कला शैली के विभिन्न पहलुओं को भी समझा। शिलांग से आए छात्रों ने कहा कि बिहार की कला में एक अनूठी गहराई है, जिसे सीखना उनके लिए एक शानदार अनुभव है।
कार्यक्रम में शामिल सभी विद्यार्थी काफी उत्साहित नजर आए और उन्होंने इसे अपने लिए एक बड़ा अवसर बताया। प्रतिभागियों में सुरभि सुमन, सुप्रिया कुमारी, खुशबू कुमारी, सलेहा कुमारी, शालिनी कुमारी, मानवी कुमारी, नुसरत, नेहा कुमारी, रीना कुमारी, और पूनम देवी समेत कई अन्य महिला कलाकार शामिल रहीं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। विवेक कुमार शाह जैसे पुरुष प्रतिभागियों ने भी अपनी कला का बेहतरीन प्रदर्शन किया।
गुरु-शिष्य परंपरा से जीवंत है कला
इस कार्यक्रम की सफलता गुरु-शिष्य परंपरा की प्रासंगिकता को दर्शाती है, जहाँ एक अनुभवी गुरु अपनी कला को अगली पीढ़ी तक पहुँचाता है। विद्यार्थियों ने इस अवसर पर कहा कि मंजूषा कला बिहार की एक समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर है और इसे सीखना उनके लिए गर्व की बात है। इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम न केवल कला को जीवित रखते हैं, बल्कि युवा कलाकारों को एक मंच भी प्रदान करते हैं। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। यह कार्यशाला बिहार की कलात्मक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो रही है।




