
Traffic Challan: बिहार में ट्रैफिक चालान से जुड़े विवादों को लेकर अब तक कोई स्पष्ट नीति नहीं थी, जिससे आम जनता को काफी परेशानी उठानी पड़ती थी। लेकिन अब पटना हाईकोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार को सख्त आदेश दिया है, जिससे लोगों को बड़ी राहत मिल सकती है। कोर्ट ने ओडिशा की तर्ज पर एक स्पष्ट अधिसूचना जारी करने का निर्देश दिया है, ताकि इन विवादों का निपटारा लोक अदालत के माध्यम से आसानी से हो सके।
Traffic Challan: लोक अदालत में क्यों नहीं हो रहा निपटारा?
मुख्य न्यायाधीश संगम कुमार साहू की खंडपीठ ने रानी तिवारी की लोकहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि अगली सुनवाई तक यह तय किया जाए कि Traffic Challan से जुड़े मामलों का निपटारा किस प्राधिकारी द्वारा और किस धनराशि तक किया जाएगा। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली और चंडीगढ़ जैसे राज्यों में लोक अदालत के माध्यम से बड़ी संख्या में ट्रैफिक चालान विवादों का निपटारा किया जाता है, तो बिहार में ऐसा प्रभावी तंत्र क्यों नहीं है।
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याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विकास कुमार पंकज ने कोर्ट को बताया कि बिहार में लोक अदालतों का प्रभावी उपयोग न होने से आम लोगों को परिवहन विभाग की मनमानी का सामना करना पड़ रहा है। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि लोक अदालतों का मुख्य उद्देश्य सामान्य अदालतों पर बोझ कम करना और लोगों को त्वरित न्याय सुनिश्चित करना है।
ओडिशा मॉडल: क्या है समाधान?
अदालत ने राज्य सरकार को ओडिशा की तर्ज पर एक स्पष्ट अधिसूचना जारी करने का निर्देश दिया है। यदि ट्रैफिक चालान जैसे मामलों को लोक अदालत में भेजा जाता है, तो न केवल न्यायालयों का भार कम होगा, बल्कि लोगों को भी शीघ्र राहत मिलेगी।
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इस मामले की अगली सुनवाई 27 अप्रैल को निर्धारित की गई है। उम्मीद है कि सरकार इस अवधि में प्रभावी कदम उठाकर लाखों लोगों को राहत देने का रास्ता साफ करेगी। पढ़िए डिटेल में
ट्रैफिक चालान लोक अदालत: बिहार में ट्रैफिक चालान के लंबित मामलों से जूझ रहे लोगों के लिए एक बड़ी खबर है। पटना हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर राज्य सरकार को कड़े निर्देश दिए हैं, जिससे अब हजारों लोगों को राहत मिलने की उम्मीद जगी है। कोर्ट ने साफ कहा है कि ओडिशा की तर्ज पर बिहार भी ट्रैफिक चालान विवादों के निपटारे के लिए स्पष्ट नीति बनाए।
मुख्य न्यायाधीश संगम कुमार साहू की खंडपीठ ने रानी तिवारी की लोकहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया। कोर्ट ने पूछा है कि अगली सुनवाई तक यह तय किया जाए कि ऐसे मामलों का निपटारा कौन सा प्राधिकारी करेगा और कितनी धनराशि तक के मामले निपटाए जा सकेंगे। अदालत ने सवाल उठाया कि आखिर क्यों बिहार में अन्य राज्यों की तरह ट्रैफिक चालान विवादों के निपटारे के लिए लोक अदालतों का प्रभावी उपयोग नहीं हो रहा है।
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ट्रैफिक चालान लोक अदालत: अन्य राज्यों का अनुभव
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता विकास कुमार पंकज ने कोर्ट को बताया कि महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली और चंडीगढ़ जैसे राज्यों में लोक अदालतें और विशेष लोक अदालतें बड़ी संख्या में ट्रैफिक चालान से जुड़े विवादों का त्वरित निपटारा करती हैं। उन्होंने जोर दिया कि बिहार में ऐसा कोई प्रभावी तंत्र न होने के कारण आम लोग परिवहन विभाग की मनमानी का सामना करने को मजबूर हैं। इससे पहले भी पटना हाई कोर्ट राज्य सरकार और बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (बालसा) से इस मामले पर जवाब तलब कर चुका है।
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त्वरित न्याय और अदालती बोझ कम करने का उद्देश्य
कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि लोक अदालतों का मूल उद्देश्य सामान्य अदालतों पर काम का बोझ कम करना और लोगों को त्वरित न्याय दिलाना है। अगर ट्रैफिक चालान जैसे मामलों को इन अदालतों के माध्यम से निपटाया जाए, तो इससे न सिर्फ न्यायालयों का बोझ कम होगा, बल्कि आम जनता को भी जल्द राहत मिल सकेगी।
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इस मामले की अगली सुनवाई अब 27 अप्रैल को होनी है, जिस पर सबकी निगाहें टिकी रहेंगी।







