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Bhagalpur News: बीत गए 35 साल…’Tilka Majhi’ के नाम चैप्टर कब जोड़ेगा भागलपुर TMB विश्वविद्यालय @Deshaj Times Special Ep. 02 | कब मिलेगी बाबा तिलका मांझी की आत्मा को शांति?

इतिहास को सहेजना। नई पीढ़ी तक उसे पहुंचाना। विस्तृत विमर्श का मार्ग खोलना। शहीद क्रांतिवीर तिलका मांझी के नाम एक दीप जलाना। उसे आत्मसात करना। वर्तमान का काम । कर्तव्य। धर्म है। मगर, 35 साल बीत गए। भागलपुर विश्वविद्यालय ने नाम बदले, लेकिन, उस महामना के विस्तृत इतिहास को पाठयक्रम में शामिल करने में तनिक भी रुचि नहीं दिखाई। काश! विश्वविद्यालय प्रबंधन जागता। नि:संदेह, बाबा तिलका मांझी की आत्मा को शांति मिलती? देशज टाइम्स पढ़िए, जाग जाइए...!

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1784 का वह साल, जब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक आदिवासी योद्धा ने पहली बार ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दी थीं। शहीद तिलका मांझी, जिन्होंने भागलपुर के अत्याचारी कलेक्टर अगस्तस क्लीवलैंड को अपने जहर बुझे तीर से निशाना बनाया, आज उसी शहर के शैक्षणिक विमर्श से ‘गायब’ हैं।

Bhagalpur News: 80 सालों से नहीं जली बाबा Tilka Majhi की समाधि पर दीप… Deshaj Times Special Ep. 01 | कब मिलेगी बाबा तिलका मांझी की आत्मा को शांति?

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विराम चिह्न और प्रमाणपत्रों के हेडर में तो ‘तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय’ (TMBU) शान से लिखा जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि 1991 में नामकरण के 35 साल बाद भी, इस संस्थान के पाठ्यक्रम में ‘बाबा तिलका’ का इतिहास एक अध्याय के रूप में भी नहीं जुड़ सका है।

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1. अकादमिक विरोधाभास: संजीवनी बूटी पर शोध, नायक पर शून्य

भागलपुर विश्वविद्यालय ने विज्ञान और साहित्य के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। रिकॉर्ड बताते हैं कि विश्वविद्यालय के टीएनबी कॉलेज के बॉटनी विभाग ने ‘संजीवनी बूटी’ के औषधीय गुणों और उसके पुनर्जीवित होने की क्षमता पर गंभीर शोध किया है।

Bhagalpur News: 35 Years Have Passed... When Will Bhagalpur TMB University Add a Chapter Dedicated to 'Tilka Majhi'?

  • वैज्ञानिक उपलब्धियाँ: ओजोन परत के क्षरण, जल शोधन और ऐसी ‘लोची’ (स्थानीय व्यंजन) के उत्पादन पर शोध हुआ जो 15 दिनों तक खराब न हो।

  • साहित्यिक शोध: मुंशी प्रेमचंद, रामधारी सिंह दिनकर और शरद चंद्र जैसे दिग्गजों पर दर्जनों पीएचडी (PhD) पूरी की गईं।

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लेकिन सवाल यह उठता है कि जिस महानायक के नाम पर विश्वविद्यालय की मुहर लगती है, उस पर एक भी आधिकारिक शोध पीठ (Research Chair) या समर्पित विभाग क्यों नहीं है? जहाँ ‘अंबेडकर विचार विभाग’ और ‘गांधी विचार विभाग’ मौजूद हैं, वहां ‘तिलका मांझी विचार विभाग’ आज तक अस्तित्व में नहीं आ सका।

“यह सिर्फ एक नाम बदलने की प्रक्रिया थी, शिक्षा के भगवाकरण या स्वदेशीकरण की नहीं। यदि हम अपने स्थानीय नायकों को नहीं पढ़ाएंगे, तो छात्र अपनी जड़ों से कैसे जुड़ेंगे?”
— एक स्थानीय शिक्षाविद् (नाम न छापने की शर्त पर)

2. ‘मंगल पांडे’ से 74 साल पहले का विद्रोह

भारतीय इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में अक्सर 1857 के विद्रोह को ‘प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’ कहा जाता है। लेकिन तथ्य यह है कि तिलका मांझी ने 1784 में ही अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह शुरू कर दिया था।

Bhagalpur News: 35 Years Have Passed... When Will Bhagalpur TMB University Add a Chapter Dedicated to 'Tilka Majhi'?
Bhagalpur News: 35 Years Have Passed… When Will Bhagalpur TMB University Add a Chapter Dedicated to ‘Tilka Majhi’?

तिलका मांझी (मूल नाम: जबर पहाड़िया) ने ‘साल के पत्तों’ को गुप्त कोड (Secret Code) के रूप में इस्तेमाल कर जंगलों में संदेश फैलाया। पत्तों का एक गांव से दूसरे गांव घूमना युद्ध का निमंत्रण था—एक ऐसी रणनीति जिसे अंग्रेज कभी समझ नहीं पाए।

3. इतिहास बनाम किंवदंती: तथ्यों की उलझन

विश्वविद्यालय में तिलका मांझी के पाठ्यक्रम में शामिल न होने के पीछे ‘तथ्यों की स्पष्टता’ का तर्क दिया जाता है।

  • स्थानीय मान्यता: 13 जनवरी 1784 को तिलका मांझी ने ताड़ के पेड़ पर छिपकर कलेक्टर क्लीवलैंड को जहर बुझे तीर से मारा था।

  • ब्रिटिश रिकॉर्ड: कोलकाता के एक कब्रिस्तान में क्लीवलैंड की कब्र पर मृत्यु का कारण ‘बीमारी’ लिखा है।

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Bhagalpur News: 35 Years Have Passed... When Will Bhagalpur TMB University Add a Chapter Dedicated to 'Tilka Majhi'? @Deshaj Times Special Ep. 02 | When Will the Soul of Baba Tilka Manjhi Find Peace?

विशेषज्ञों का मानना है कि चूंकि आदिवासी विद्रोह ‘लिपिबद्ध’ नहीं था, इसलिए ब्रिटिश दस्तावेजों ने इसे दबाने की कोशिश की। विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी थी कि वह इन विसंगतियों पर शोध कर एक प्रामाणिक इतिहास तैयार करता, लेकिन प्रशासनिक उदासीनता ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया।

4. लोकगीतों में जीवित हैं ‘बाबा’

भले ही आधिकारिक सिलेबस उन्हें भूल गया हो, लेकिन संथाल समुदाय के लोकगीतों में वे आज भी अमर हैं…बहुत ही प्रसिद्ध लोकगीत की पंक्तियाँ कुछ इस तरह हैं (अनुवादित):

“तिलका मांझी, तुमने तीर चलाया था,

ताड़ के पेड़ से मौत का पैगाम आया था,

घोड़ों से घसीटा गया, फिर भी तुम नहीं झुके,

बरगद की डाल पर तुम अमर हो गए…”

स्थानीय मान्यता है कि 1785 में जिस बरगद के पेड़ पर उन्हें फांसी दी गई थी, वहां की मिट्टी उनके खून से लाल हो गई थी। आज वह स्थान ‘बाबा तिलका मांझी चौक’ के रूप में एक जीवित स्मारक है।

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शहीद Tilka Majhi: एक नज़र में

विवरणतथ्य
जन्म11 फरवरी 1750, तिलकपुर (बिहार)
विद्रोहपहाड़िया विद्रोह (प्रथम सशस्त्र आदिवासी आंदोलन)
मुख्य प्रहारकलेक्टर अगस्तस क्लीवलैंड की तीर से हत्या (1784)
बलिदान13 जनवरी 1785 (बरगद के पेड़ पर फांसी)
विश्वविद्यालय नामकरण1991

एक बौद्धिक बेईमानी

शहीद तिलका मांझी ने जो तीर क्लीवलैंड पर चलाया था, वह गुलामी के खिलाफ इस मिट्टी का पहला प्रहार था। आज शिक्षा के क्षेत्र में उन्हीं के नाम पर चल रहा विश्वविद्यालय यदि उनके इतिहास को पुनर्जीवित नहीं करता, तो यह उन तमाम गुमनाम शहीदों के प्रति एक बड़ी बौद्धिक बेईमानी होगी।

Bhagalpur News: 35 Years Have Passed... When Will Bhagalpur TMB University Add a Chapter Dedicated to 'Tilka Majhi'? @Deshaj Times Special Ep. 02 | When Will the Soul of Baba Tilka Manjhi Find Peace?
Bhagalpur News: 35 Years Have Passed… When Will Bhagalpur TMB University Add a Chapter Dedicated to ‘Tilka Majhi’? @Deshaj Times Special Ep. 02 | When Will the Soul of Baba Tilka Manjhi Find Peace?

क्या यह विडंबना नहीं है कि जो नायक ‘साल के पत्तों’ पर गुप्त संदेश भेजकर पूरी ब्रिटिश फौज को हरा देता था, उसी के संदेश आज उसी के नाम पर बनी यूनिवर्सिटी के ‘सिलेबस के पन्नों’ तक नहीं पहुँच पा रहे हैं?

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