

धूल उड़ती है भागलपुर के सीटीएस (CTS) मैदान से। लेकिन यह महज धूल नहीं है; ये सदियों की वो ठंडी सांसें हैं जिन्हें ब्रिटिश हुकूमत ने अपनी सत्ता के बूटों तले बेरहमी से दबा दिया था। बच्चे जब इस विशाल मैदान में दौड़ते हैं, तो जाने-अनजाने वे इतिहास की किसी भूली हुई पदचाप पर पांव रख देते हैं। ईंटें मौन जरूर हैं, पर मिट्टी चीख-चीख कर बोलती है—बस उसे सुनने वाला एक संवेदनशील हृदय चाहिए।
मशहूर शायर साहिर लुधियानवी ने जुल्म और शहादत के इसी मौन संघर्ष के लिए लिखा था:
“ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है बढ़ता है तो मिट जाता है,
ख़ून फिर ख़ून है टपकेगा तो जम जाएगा।”
यह कहानी उसी जमे हुए खून की है, यह कहानी है उस ‘क्लीवलैंड कांड’ की, जिसने न केवल एक महान संस्कृति को नेपथ्य में धकेल दिया, बल्कि स्वतंत्र आदिवासियों के स्वाभिमान को कूटनीति के जाल में फंसाकर उन्हें कंपनी बहादुर का गुलाम सिपाही बना दिया।
सत्ता की कूटनीति: ‘चिलमिल साहेब’ का छलावा
यह उस दौर का काला पन्ना है जब भागलपुर की आबोहवा में एक गोरा अफसर दाखिल हुआ—ऑगस्टस क्लीवलैंड। उम्र महज़ 25 साल थी, पर उसकी आंखों में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार का एक क्रूर और चालाक नक्शा खिंचा था। वह भली-भांति जानता था कि पहाड़िया वीरों के अचूक तीर उसकी बंदूकों की गोलियों पर भारी पड़ रहे हैं। बल प्रयोग से उन्हें झुकाना आसान नहीं था। इसलिए उसने वह रास्ता चुना जो सत्ता अक्सर चुनती है—छल और लालच का रास्ता।

क्लीवलैंड ने खुद को इतना उदार दिखाने की कोशिश की कि भोली-भाली जनता उसे ‘चिलमिल साहेब’ कहने लगी। उसने 1300 तीर-धनुष धारियों की एक फौज बनाने का प्रस्ताव रखा और पहाड़िया सरदारों को 10 रुपये प्रति माह के भत्ते का लालच दिया। यह इतिहास की शुरुआती ‘रिश्वत’ थी जिसने पहाड़िया समाज की एकता को खंडित कर दिया।
जंगल के जो बेटे कभी आजाद हवा में सांस लेते थे, उन्हें ‘हिल रेंजर्स’ बना दिया गया। वसीम बरेलवी का यह शेर उन बिकते हुए सरदारों पर सटीक बैठता है:
“उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है,
जो ज़िन्दा हो तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है।”
दानवीर कर्ण के महल पर षड्यंत्र
क्लीवलैंड की इस चाल का सबसे बड़ा और खामोश शिकार बनी हमारी स्थानीय संस्कृति। पहाड़िया फौज को प्रशिक्षण देने के लिए नाथनगर में एक विशाल शिविर स्थापित किया गया। हेरिसन की पुस्तक और ऐतिहासिक प्रमाण इस बात की तस्दीक करते हैं कि यह वही पवित्र क्षेत्र था, जिसके ठीक नीचे दानवीर महाराज कर्ण का ऐतिहासिक महल स्थित था।
इतिहासकारों का मत है कि क्लीवलैंड ने जानबूझकर इस सांस्कृतिक स्थल को चुना ताकि भागलपुर के गौरव और कर्ण के महल की पहचान को हमेशा के लिए जूतों तले रौंद सके। इसी दौरान उसने ‘दमिन-इ-कोह’ (Damin-i-koh) की नींव रखी, जिसने आदिवासियों को उनकी अपनी ही ज़मीन पर सरकारी बंधक बना दिया।
बाबा तिलका मांझी: साल के पत्तों से क्रांति का आह्वान
जब विश्वासघात का यह खेल चरम पर था, तब जंगलों से एक नाम गूंजा—बाबा तिलका मांझी (जहाँरा पहाड़िया)। जहाँ क्लीवलैंड कागजी मुहरों से षड्यंत्र रच रहा था, वहीं तिलका मांझी ‘साल के पत्तों’ के जरिए गांव-गांव विद्रोह का संदेश भेज रहे थे।

13 जनवरी 1784 की वह ऐतिहासिक शाम थी। तिलका मांझी ने ताड़ के पेड़ पर छिपकर अपने अचूक ज़हरीले तीर से क्लीवलैंड के अहंकार को बींध दिया। ब्रिटिश रिकॉर्ड्स भले कहें कि उसकी मौत ‘बुखार’ से हुई, लेकिन लोक-स्मृतियां तिलका के शौर्य की गवाही देती हैं। बिस्मिल अज़ीमाबादी की पंक्तियां यहाँ जीवंत हो उठती हैं:
“सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है।”
वह फांसी का तख्ता और अमर इतिहास
अंग्रेजों ने तिलका मांझी को घोड़ों से घसीटकर भागलपुर के बीचों-बीच एक बरगद के पेड़ पर फांसी दे दी। क्लीवलैंड को लगा था कि वह एक विद्रोही को मारकर अमर हो जाएगा, लेकिन राहत इंदौरी के शब्दों में:
“जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे,
किरायेदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है।”
आज का सीटीएस मैदान कोई साधारण मैदान नहीं है। यहाँ कभी दानवीर कर्ण ने कवच-कुंडल दान दिए थे और यहाँ तिलका के तीरों ने इतिहास बदला था। आज यहाँ ईद की नमाज में हजारों सिर एक साथ झुकते हैं—यह मैदान हिंदुस्तान की साझी आत्मा का आईना है।

महल आज भी मिट्टी के नीचे दबा है और सवाल सतह पर: क्या हम इस ऐतिहासिक स्थल पर गंभीर शोध कर इसके दबे हुए सच को बाहर लाएंगे, या पैरों के नीचे धड़कते इस बेबाक इतिहास को हमेशा के लिए अनसुना कर देंगे?






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