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Bhagalpur News: चंद रुपयों में बिक गया Tilka Majhi का ठिकाना, बचे सिर्फ बे-ईमान … बरगद का पेड़ पूछ रहा मौन ‘ सवाल ’ | Deshaj Times Special Ep. 03 | कब मिलेगी बाबा तिलका मांझी की आत्मा को शांति?

1785 में अंग्रेजों पर पहला तीर चलाने वाले नायक का इतिहास TMBU के सिलेबस से गायब | फांसी वाले सूखे बरगद से फिर फूटा अंकुर

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देशज टाइम्स | Highlights -

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इतिहास सिर्फ तारीखों का बहीखाता नहीं है, यह समाज की आत्मा और संघर्षों का जीवित दस्तावेज है। लेकिन क्या होता है जब किसी महानायक को इस मुख्यधारा के दस्तावेज से ही सुनियोजित तरीके से मिटा दिया जाए? भागलपुर के तिलकामांझी चौक पर खड़ा एक बरगद का पेड़ आज भी यही मौन सवाल पूछ रहा है।

Bhagalpur News: 80 सालों से नहीं जली बाबा Tilka Majhi की समाधि पर दीप… Deshaj Times Special Ep. 01 | कब मिलेगी बाबा तिलका मांझी की आत्मा को शांति?

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अंग प्रदेश के महानायक और 1857 से पहले की क्रांति अंग प्रदेश की धरती पर जन्मे बाबा तिलका मांझी का संघर्ष महज़ एक स्थानीय घटना नहीं थी। इतिहास की किताबें मंगल पांडे, झांसी की रानी और तात्या टोपे का उल्लेख तो विस्तार से करती हैं, लेकिन यह एक कड़वा सच है कि:

“1857 की क्रांति इतिहास की किताबों में दर्ज हुई, लेकिन उससे बहुत पहले, 1785 में ही जंगलों में तिलका मांझी अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिला चुके थे।”

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यह कहानी है 1857 की क्रांति से 72 साल पहले ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाने वाले पहले आदिवासी जननायक बाबा तिलका मांझी की, जिन्हें दुश्मनों की तोपों ने नहीं, बल्कि अपनों के लालच ने मारा। विडंबना यह है कि जिस विश्वविद्यालय का नाम उनके नाम पर रखा गया, आज उसी के पाठ्यक्रम से उनका संघर्ष नदारद है।

“शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,

वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा।”

— मगर तिलका मांझी के संदर्भ में, यह निशान भी अकादमिक विमर्शों और इतिहास की किताबों में जानबूझकर धुंधला कर दिया गया।

विद्रोह की पहली चिनगारी: सत्ता को सीधी चुनौती

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा अक्सर मंगल पांडे, झांसी की रानी और तात्या टोपे से शुरू होती है। लेकिन 18वीं सदी के उत्तरार्ध में, जब ईस्ट इंडिया कंपनी बंगाल, बिहार और झारखंड में अपनी जड़ें जमा रही थी और सामंती गठजोड़ के जरिए आदिवासियों के ‘जल-जंगल-जमीन’ को छीन रही थी, तब संताल और पहाड़िया समुदायों के बीच से एक युवा योद्धा का उदय हुआ—जाबरा पहाड़िया, जिन्हें दुनिया ने ‘तिलका मांझी’ (गुस्सैल लाल आंखों वाला व्यक्ति) के नाम से जाना।

उनका संघर्ष केवल सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं थी। वह औपनिवेशिक दमन, शोषणकारी लगान व्यवस्था और आदिवासी अस्मिता को कुचलने के खिलाफ एक संगठित गुरिल्ला युद्ध था। महेशी-तिलकपुर की पहाड़ियों को अपना आधार बनाकर उन्होंने ब्रिटिश सेना के खिलाफ ‘हिट एंड रन’ रणनीति की शुरुआत की।

Bhagalpur News: Tilka Majhi's Abode Sold Off for a Mere Pittance; Only the Dishonest Remain...

तिलका मांझी का संघर्ष: सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं उनका यह विद्रोह केवल किसी शासक को हटाने तक सीमित नहीं था, बल्कि यह एक गहरी वैचारिक और सामाजिक लड़ाई थी। यह संघर्ष मुख्य रूप से था—

  • जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों के नैसर्गिक अधिकार का।

  • अंग्रेजों द्वारा थोपी गई शोषणकारी लगान व्यवस्था के खिलाफ।

  • सामंती गठजोड़ और औपनिवेशिक दमन के विरुद्ध।

साम्राज्य के अहंकार पर प्रहार: क्लीवलैंड का वध

वर्ष 1784। भागलपुर का ब्रिटिश कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड अंग्रेजी प्रशासन का सबसे प्रभावशाली और क्रूर चेहरा था। ब्रिटिश दस्तावेजों में भले ही उसे ‘शांतिदूत’ (पीस-मेकर) बताया गया हो, लेकिन आदिवासी समाज के लिए वह दमन का प्रतीक था।

Bhagalpur News: बीत गए 35 साल…’Tilka Majhi’ के नाम चैप्टर कब जोड़ेगा भागलपुर TMB विश्वविद्यालय @Deshaj Times Special Ep. 02 | कब मिलेगी बाबा तिलका मांझी की आत्मा को शांति?

तिलका मांझी ने एक ताड़ के पेड़ की ओट लेकर क्लीवलैंड पर अपने अचूक और जहरीले तीर से प्रहार किया। यह महज एक अंग्रेज अफसर की हत्या नहीं थी; यह ब्रिटिश साम्राज्य के अजेय होने के अहंकार पर सीधा और अचूक प्रहार था। इस घटना ने पहली बार लंदन तक यह संदेश भेजा कि भारत का आदिवासी समाज केवल मूक करदाता नहीं, बल्कि प्रतिरोध की एक प्रचंड ज्वाला है। यहीं से तिलका मांझी को ब्रिटिश राज का ‘सबसे खतरनाक विद्रोही’ घोषित कर दिया गया।

“जुल्म की टहनी कभी फलती नहीं,

नाव कागज की सदा चलती नहीं।

खींच कर लाओ उसे सरेआम मकतल में,

जो कातिल है उसे बचने का कोई हक नहीं।”

चंद सिक्कों में बिका ईमान: अपनों का विश्वासघात

इतिहास में क्रांतियां अक्सर बाहरी ताकतों से कम, भीतर के विश्वासघात से ज्यादा हारती हैं। ब्रिटिश सेना अपनी पूरी ताकत झोंकने के बाद भी जंगलों के इस नायक को पकड़ने में नाकाम साबित हो रही थी। लेकिन सत्ता हमेशा लालच का हथियार आजमाती है।

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Bhagalpur News: Tilka Majhi's Abode Sold Off for a Mere Pittance; Only the Dishonest Remain...
Bhagalpur News: Tilka Majhi’s Abode Sold Off for a Mere Pittance; Only the Dishonest Remain…

कुछ रुपयों और इनाम के लालच में एक मुखबिर ने गद्दारी की और तिलका मांझी का गुप्त ठिकाना अंग्रेजों को बता दिया। महेशी-तिलकपुर की पहाड़ियों में घेराबंदी कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। यह आदिवासी समाज के लिए सबसे गहरा घाव था—अंग्रेजों से ज्यादा खतरनाक वह गद्दारी साबित हुई जिसने अपने ही महानायक को चंद रुपयों के लिए दुश्मनों के हवाले कर दिया।

औपनिवेशिक क्रूरता और वह गवाह बरगद

गिरफ्तारी के बाद अंग्रेजों ने बर्बरता की हर सीमा लांघ दी। उनका उद्देश्य केवल एक विद्रोही को मारना नहीं, बल्कि पूरे समाज में खौफ पैदा करना था।

  • अमानवीय यातना: तिलका मांझी के हाथ-पैर बांधकर उन्हें चार घोड़ों से महेशी से भागलपुर तक सड़कों पर घसीटा गया।

  • सार्वजनिक फांसी: 13 जनवरी 1785 को भागलपुर के एक बरगद के पेड़ पर उन्हें सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी गई।

  • भय का प्रदर्शन: स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, फांसी के बाद भी जब उनके शरीर में हरकत थी, तो अंग्रेज सिपाहियों ने गोलियां चलाकर उनकी मौत सुनिश्चित की।

“गिरे हैं जो लहू के कतरे इस मिट्टी पर,

वो कयामत तक बगावत की फसल बोते रहेंगे।”

स्थानीय मान्यता है कि जिस बरगद के पेड़ से उन्हें फांसी दी गई थी, वह कुछ समय बाद सूख गया था। लेकिन चमत्कारिक रूप से उसी तने से एक नया अंकुर फूटा। यह अंकुर इस बात का प्रतीक बन गया कि क्रूरता से शरीर नष्ट किए जा सकते हैं, लेकिन प्रतिरोध की चेतना कभी नहीं मरती।

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सूखे बरगद से फूटा अंकुर: स्मृति, प्रतीक और तीन मौन सवाल स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, जिस बरगद के पेड़ पर उन्हें फांसी दी गई थी, वह कुछ समय बाद सूख गया था। लेकिन चमत्कारिक रूप से उसी तने से एक नया अंकुर फूटा। यह घटना लोक-विश्वास में एक प्रतीक बन गई, मानो इतिहास खुद मिटने से इंकार कर रहा हो। भागलपुर के तिलकामांझी चौक पर खड़ा यह बरगद आज भी आने-जाने वालों और हमारे समाज से तीन सीधे सवाल करता प्रतीत होता है—

  1. क्या हमने अपने पहले आदिवासी शहीद को वह सम्मान दिया, जिसके वे वास्तव में हकदार थे?

  2. क्या इतिहास की किताबों में उनकी जगह हमेशा सिर्फ एक ‘फुटनोट’ (Footnote) भर रह जाएगी?

  3. और क्या भारत की आजादी की कहानी, बिना आदिवासी प्रतिरोध के कभी पूरी मानी जा सकती है?

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इतिहास की मुख्यधारा से बाहर क्यों रहे तिलका मांझी?

इस सवाल का उत्तर भारत के औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक इतिहास लेखन में छिपा है। मुख्यधारा का इतिहास लंबे समय तक शहरी, दरबारी और अभिजात राजनीतिक आंदोलनों के इर्द-गिर्द ही लिखा गया। आदिवासी संघर्षों को अक्सर “स्थानीय विद्रोह” कहकर सीमित कर दिया गया। तिलका मांझी का संघर्ष तत्कालीन और वर्तमान सत्ता के लिए इसलिए भी असुविधाजनक माना गया क्योंकि उसमें—

  • जमीन के अधिकार का सीधा प्रश्न था।

  • संसाधनों पर स्थानीय स्वामित्व की बेबाक मांग थी।

  • और शोषणकारी सत्ता के खिलाफ प्रत्यक्ष और हिंसक युद्ध था।

Bhagalpur News: Tilka Majhi's Abode Sold Off for a Mere Pittance; Only the Dishonest Remain...
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अकादमिक उपेक्षा: पाठ्यक्रम से नायक की बेदखली

सबसे बड़ा और तीखा सवाल आज हमारी शिक्षा व्यवस्था और इतिहास लेखन पर खड़ा होता है। तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (TMBU) का नाम भले ही उनके नाम पर है, लेकिन विश्वविद्यालय के इतिहास और राजनीति विज्ञान के पाठ्यक्रमों में उनके संघर्ष को वह वैचारिक और ऐतिहासिक स्थान नहीं मिला जिसके वह हकदार थे।

यह भारतीय इतिहास लेखन की एक लंबी और सुनियोजित विडंबना रही है:

  • विद्रोह का अवमूल्यन: दरबारी और अभिजात आंदोलनों को ‘राष्ट्रीय संग्राम’ माना गया, जबकि तिलका मांझी के व्यापक विद्रोह को ‘स्थानीय विद्रोह’ कहकर हाशिये पर धकेल दिया गया।

  • अपराधीकरण की साजिश: ब्रिटिश रिकॉर्ड्स में जानबूझकर तिलका मांझी को विद्रोही के बजाय ‘डकैत’ (Dacoit) या ‘आउटलॉ’ लिखा गया, ताकि उनके आंदोलन को अपराध की श्रेणी में रखा जा सके।

  • असुविधाजनक इतिहास: उनका संघर्ष असुविधाजनक था क्योंकि उसमें संसाधनों (जल-जंगल-जमीन) पर स्थानीय स्वामित्व की सीधी मांग थी, जो आज के सत्ताधीशों को भी असहज करती है।

इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों का स्पष्ट मानना है कि तिलका मांझी का विद्रोह कोई सामान्य घटना नहीं थी। अकादमिक दृष्टिकोण से देखें तो उनका यह संघर्ष—

  • संगठित आदिवासी प्रतिरोध का सबसे प्रारंभिक मॉडल था।

  • गुरिल्ला युद्ध (Guerrilla Warfare) की शुरुआती और अचूक रणनीतियों में शामिल था।

  • यही वह वैचारिक जमीन थी जिस पर आगे चलकर संताल हूल, बिरसा मुंडा का उलगुलान तथा अन्य आदिवासी संघर्ष पल्लवित हुए।

विरासत और शाश्वत प्रेरणा

भले ही पाठ्यपुस्तकों ने उन्हें भुला दिया हो, लेकिन अंग और संताल परगना के लोकगीतों, कथाओं और जन-स्मृतियों में तिलका मांझी आज भी एक जीवित देवता हैं। उनके विद्रोह ने ही आगे चलकर संताल हूल और बिरसा मुंडा के उलगुलान की वैचारिक जमीन तैयार की थी।

1970 के दशक में जब संताल समाज ने अलग राज्य की मांग की, तो तिलका मांझी एक बार फिर अस्मिता के प्रतीक बनकर उभरे, जिसके बाद प्रशासन को उनकी प्रतिमा स्थापित करने के लिए बाध्य होना पड़ा।

“कलम भले ही बिक जाए दरबारों में,

लोकगीत हमेशा बागी का ही गान करेंगे।”

आज आवश्यकता केवल चौराहों पर प्रतिमाएं लगाने की नहीं है, बल्कि इतिहास की निष्पक्ष पुनर्समीक्षा करने की है। जब तक स्कूलों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में तिलका मांझी और उनके जैसे आदिवासी नायकों को उनका वास्तविक और गौरवशाली स्थान नहीं मिलता, तब तक भारत की आजादी का इतिहास अधूरा ही रहेगा। तिलका मांझी का जीवन इस बात का शाश्वत प्रमाण है कि आजादी केवल सत्ता परिवर्तन का नाम नहीं, बल्कि सम्मान, पहचान और अपने संसाधनों पर अधिकार की अनवरत लड़ाई है।

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Bhagalpur News: Tilka Majhi’s Abode Sold Off for a Mere Pittance; Only the Dishonest Remain…

आज भी जिंदा है तिलका मांझी का लोक-नायकत्व भले ही पाठ्यपुस्तकों में उनका नाम सीमित कर दिया गया हो, लेकिन संताल परगना और अंग क्षेत्र के गांवों में तिलका मांझी आज भी लोक-देवता की तरह पूजे जाते हैं। उनकी कहानी सिर्फ अतीत के पन्नों में कैद नहीं है, बल्कि वर्तमान की चुनौतियों से भी सीधे जुड़ती है।

आज जब देश भर में जल-जंगल-जमीन के संरक्षण, कॉर्पोरेट लूट, विस्थापन (Displacement) और आदिवासी अधिकारों की बहस सबसे ज्वलंत है, तब तिलका मांझी का संघर्ष और भी अधिक प्रासंगिक हो उठता है। वे हमें याद दिलाते हैं कि आजादी केवल राजनीतिक सत्ता का हस्तांतरण नहीं है, बल्कि यह अपने जल, जंगल, जमीन, सम्मान और पहचान को बचाए रखने की एक अनवरत लड़ाई है।

क्यों खास हैं बाबा तिलका मांझी?

1784: अंग्रेज अफसर पर पहला सीधा हमला

भागलपुर के कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड पर जहरीले तीर से हमला कर अंग्रेजी सत्ता को खुली चुनौती दी।

पहले आदिवासी शहीद

ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लड़ते हुए फांसी पर चढ़ने वाले पहले आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी माने जाते हैं।

आगे के आंदोलनों की प्रेरणा

उनके विद्रोह ने आगे चलकर संताल हूल और बिरसा मुंडा जैसे आंदोलनों की वैचारिक नींव तैयार की।

आज भी लोक-मानस में अमर

मुख्यधारा के इतिहास से उपेक्षित होने के बावजूद अंग और संताल क्षेत्र का समाज आज भी उन्हें अपना सबसे बड़ा नायक मानता है।

अंग्रेज उन्हें ‘ डकैत ‘ साबित करना चाहते थे?

ब्रिटिश रिकॉर्ड्स में कई जगह तिलका मांझी को “dacoit” या “outlaw” लिखा गया, ताकि उनके आंदोलन को स्वतंत्रता संग्राम नहीं बल्कि अपराध बताया जा सके।
यह औपनिवेशिक रणनीति थी—क्रांतिकारियों को अपराधी घोषित कर जनता का समर्थन कम करना।

गुरिल्ला युद्ध की रणनीति में थे माहिर

तिलका मांझी ने पहाड़, जंगल और घाटियों का इस्तेमाल करते हुए अंग्रेजों के खिलाफ hit-and-run tactics अपनाई थी। यानी हमला करो और तुरंत जंगलों में गायब हो जाओ। बाद में यही रणनीति कई आदिवासी आंदोलनों और स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनाई। लोककथाओं के अनुसार तिलका मांझी अंग्रेजों के खजाने और जमींदारों से लूटे गए अनाज को गरीब आदिवासियों और किसानों में बांट देते थे। इस कारण आम जनता उन्हें “जननायक” मानने लगी थी।

बरगद का पेड़ बना प्रतिरोध का प्रतीक

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार जिस बरगद से उन्हें फांसी दी गई थी, उसके सूख जाने के बाद उसी तने से नया अंकुर निकला। लोग इसे “संघर्ष कभी नहीं मरता” के प्रतीक के रूप में देखते हैं।

1857 से पहले ही “जल-जंगल-जमीन” की लड़ाई

आज जो “जल, जंगल, जमीन” का नारा आदिवासी आंदोलनों में सुनाई देता है, उसकी वैचारिक जड़ें तिलका मांझी जैसे योद्धाओं के संघर्ष में दिखाई देती हैं।
उन्होंने अंग्रेजों द्वारा जंगलों और संसाधनों पर कब्जे का विरोध किया था।

ऑगस्टस क्लीवलैंड अंग्रेजों का “हीरो” था

ब्रिटिश इतिहास में ऑगस्टस क्लीवलैंड को “peace-maker” बताया गया, लेकिन आदिवासी समाज उसे दमनकारी अधिकारी मानता था। यही इतिहास की दो अलग-अलग व्याख्याएं दिखाता है।

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