
Newborn Resuscitation: जन्म के बाद हर शिशु की पहली साँस सुनिश्चित करना अब एक राष्ट्रीय संकल्प बन गया है। इसी कड़ी में दरभंगा मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (डीएमसीएच) में एक दिवसीय व्यापक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया, जहाँ डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को नवजात शिशुओं की जान बचाने वाली तकनीकें सिखाई गईं। यह कार्यक्रम देशव्यापी ‘हर नवजात की पहली श्वास सुरक्षित करने का राष्ट्रीय संकल्प’ का हिस्सा था, जो नवजात मृत्यु दर को कम करने में अहम भूमिका निभाएगा।
देशव्यापी अभियान और ‘गोल्डन मिनट’ का महत्व
नेशनल नियोनेटोलॉजी फोरम ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित राष्ट्रव्यापी नवजात पुनर्जीवन कार्यक्रम (एनआरपी) प्रशिक्षण दिवस के अंतर्गत 10 मई 2026 को दरभंगा मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में यह ‘हैंड्स-ऑन’ प्रशिक्षण संपन्न हुआ। इस ऐतिहासिक अभियान को इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (आई.ए.पी.), फाग्सी (एफ.ओ.जी.एस.आई.), यूनिसेफ के सहयोग तथा स्टेट हेल्थ सोसाइटी बिहार के समर्थन से चलाया गया है। देशभर के 27 से अधिक राज्यों के 1000 से अधिक केंद्रों पर 24,000 से अधिक स्वास्थ्यकर्मियों को नवजात पुनर्जीवन का प्रशिक्षण दिया गया है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य प्रत्येक नवजात को जन्म के तुरंत बाद सुरक्षित श्वास सहायता उपलब्ध कराना तथा “गोल्डन मिनट” के महत्त्व के प्रति स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षित करना है। यह सुनिश्चित करना कि हर नवजात शिशु को जन्म के बाद शुरुआती ‘गोल्डन मिनट’ में सही देखभाल मिले, इस प्रशिक्षण का मूल मंत्र था।
नवजात पुनर्जीवन प्रशिक्षण का महत्व और विशेषज्ञों की राय
डीएमसीएच के शिशु रोग विभाग के सेमिनार रूम में आयोजित इस कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं राष्ट्रगान के साथ हुआ। डीएमसीएच के प्राचार्य डॉ. यू. सी. झा ने कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए कहा कि नवजात पुनर्जीवन प्रशिक्षण नवजात मृत्यु दर को कम करने की दिशा में अत्यंत महत्त्वपूर्ण पहल है और प्रत्येक स्वास्थ्यकर्मी को इन जीवनरक्षक कौशलों में दक्ष होना चाहिए। डीएमसीएच के अधीक्षक डॉ. जगदीश चंद्र ने आशा व्यक्त की कि इस प्रशिक्षण से अस्पताल में नवजात मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी आएगी। वरिष्ठ स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. भरत प्रसाद ने प्रसूति विशेषज्ञों के लिए इन कौशलों के प्रशिक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया, क्योंकि जन्म के तुरंत बाद सबसे पहले वही नवजात को संभालते हैं। फाग्सी की अध्यक्ष डॉ. कुमुदिनी झा और आई.एम.ए. के अध्यक्ष डॉ. कन्हैया जी झा ने भी नवजात पुनर्जीवन तकनीकों में हुई प्रगति की सराहना की। एनेस्थीसिया विभागाध्यक्ष डॉ. हरि दामोदर सिंह ने बताया कि सीज़ेरियन ऑपरेशन के दौरान नवजात की प्रारंभिक देखभाल की जिम्मेदारी कई बार एनेस्थेटिस्टों पर भी होती है, इसलिए उनका दक्ष होना अनिवार्य है। इस अवसर पर एम्स पटना से राष्ट्रव्यापी शुभारंभ समारोह का सीधा प्रसारण भी प्रतिभागियों को दिखाया गया।
बिहार में नवजात मृत्यु दर कम करने की पहल
आई.ए.पी. के अध्यक्ष डॉ. के. एन. मिश्रा ने कार्यक्रम में आई.ए.पी. के योगदान को रेखांकित किया। डॉ. रिज़वान ने बताया कि बिहार में नवजात मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से कम है और ऐसे प्रशिक्षण अभियानों से इसे भविष्य में एकल अंक तक लाने का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. अशोक कुमार ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत किया। कार्यक्रम के कोर्स समन्वयक डॉ. कमोद झा ने प्रशिक्षण कार्यक्रम की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की, जबकि राज्य समन्वयक द्वारा नवजात पुनर्जीवन तकनीकों का लाइव डेमो दिया गया। मुख्य प्रशिक्षक डॉ. ओम प्रकाश के नेतृत्व में डॉ. ए. के. साहू, डॉ. मिथिलेश कुमार सिंह, डॉ. रणधीर मिश्रा तथा डॉ. कुमार आनंद की टीम ने लगभग 50 चिकित्सकों, नर्सिंग कर्मियों तथा सरकारी एवं निजी स्वास्थ्य संस्थानों के स्वास्थ्यकर्मियों को “हैंड्स-ऑन” प्रशिक्षण प्रदान किया। कार्यक्रम में इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स एवं नेशनल नियोनेटोलॉजी फोरम ऑफ इंडिया के बड़ी संख्या में सदस्य उपस्थित रहे। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1। अंत में डॉ. मणि शंकर ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह अभियान केवल एक प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं, बल्कि प्रत्येक नवजात को जीवन की पहली सुरक्षित श्वास देने का राष्ट्रीय संकल्प है।
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