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Deshaj Times Special: ये है रेशमी तांगों की ‘ मध्यरात्रि ‘… तकली में कुंजी, ऑर्डर कैंसिल

कभी जिसकी चमक से रौशन हुआ करता था सिल्क रूट, आज उस चंपा नगरी की गलियों में अजब सन्नाटा है। 'खट-खो' की वो तान जो कभी ज़िंदगी बुनती थी यहाँ, अब सिर्फ़ किताबों के पन्नों में सिमटा एक वाक़या है।यह सिर्फ़ एक शहर की कहानी नहीं है, बल्कि अंग प्रदेश की उस साझी विरासत का आंसुओं से भीगा मरसिया (शोकगीत) है जिसकी धड़कन कभी करघों की "खट-खो" से तय होती थी। गंगा के किनारे बसा भागलपुर—जिसने महाभारत के दौर से लेकर बुकानन हैमिल्टन की डायरी तक अपने तसर के धागे से सुनहरी दास्तां लिखी—आज अपनी ही पहचान बचाने के लिए छटपटा रहा है। झीनी होती भागलपुरी रेशमी चदरिया, सुर्ख़ियों वाले हाथ में बेपर्द होती गरीबी और सपने टूटने का शोर, कहां आ ठहरी है। जानिए -

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हाँ के बुनकर कहते थे कि ‘खट‘ वह मशक्कत है जो हाथों की खाल छील दे और ‘खो‘ वह रोटी है जो ख़ुद्दारी से कमाई जाए। अफ़सोस, आज उसी नाथनगर की गलियों में जब दरवाज़े खुलते हैं, तो करघों की खनखनाहट नहीं, बल्कि बेरोज़गारी और ग़रीबी के ताले दिखाई देते हैं। जो सिल्क उद्योग कभी एक लाख लोगों का पेट भरता था, वह आज वैश्विक टैरिफ की मार, कोकून की बेतहाशा महंगाई और सरकारी फाइलों की बेरुखी के कारण सत्तर साल पीछे लौट गया है।

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सूरत और चीन के नकली धागों ने असली तसर की कमर तोड़ दी है। जिस मटका और घिचा सिल्क की मांग कभी पेरिस और न्यूयॉर्क के फैशन शो में हुआ करती थी, आज वह अमेरिकी टैरिफ और कैंसिल होते ऑर्डरों के बोझ तले दबा हुआ है। इतिहास रो रहा है क्योंकि जीआई (GI) टैग का तमगा तो मिल गया, मगर बुनकर के हिस्से में सिर्फ़ दो सौ रुपये की दिहाड़ी आई।

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Bhagalpur Silk Industry Crisis Khat Kho Echo Fading Deshaj Times Special Report
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हालाँकि, एरी सिल्क के नए प्रोजेक्ट और निफ़्ट (NIFT) के डिज़ाइनरों की कोशिशों ने उम्मीद की एक आख़िरी लौ ज़रूर जला रखी है। मगर सवाल वही है—क्या यह तसल्ली भागलपुर के उजड़ते आशियानों और दम तोड़ते हुनर को बचा पाएगी? आइए, देशज टाइम्स की इस विशेष रिपोर्ट के ज़रिए सल्क नगरी की उस कराह को सुनते हैं जो अगर आज नहीं सुनी गई, तो सिर्फ़ यादों का एक धुंधला सा सिल्क रूट बनकर रह जाएगी।

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“खट-खो” की गूंज थम रही है  – सिल्क नगरी की वो कराह जो अब किताबों में ही बचेगी…गंगा किनारे बसी भागलपुर। कभी चंपा नगरी, कभी अंग प्रदेश, कभी भगदतपुरम। सदियों से इस शहर ने रेशम के धागे से अपना इतिहास बुना। कर्ण की धरती पर जहां कभी तसर की चमक यूरोप तक जाती थी, आज उसी शहर की गलियों में सन्नाटा है।

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“खट-खो” की आवाज अब किताबों में दर्ज हो गई है।

जब करघे बोलते थे, अब ताले बोलते हैं

नाथनगर की गलियां कभी करघों की “खट-खो” से जागती थीं। बुनकर कहते थे – “खट” वो मेहनत है जो हाथ छील दे, “खो” वो रोटी है जो ईमान से कमाई हो।

आज 6000 बुनकर परिवारों के दरवाजे खुलते हैं तो करघा नहीं, किराने की दुकान दिखती है। दीवार पर टंगी तकली पर धूल जमी है, और छत से लटका करघा जाले में कैद है।

70 साल पीछे लौट गई सिल्क नगरी

2010 तक भागलपुर सिल्क 1 लाख लोगों का पेट भरता था। 35,000 सक्रिय बुनकर, 25,000 लूम। सालाना 500-600 करोड़ का कारोबार। नाथनगर का एक प्लांट रोज 10,000 वर्ग मीटर सिल्क बुनता था। महीने का 30 लाख का टर्नओवर, 3000 घरों में चूल्हा जलता था। 2024-25 में सब बदल गया।

Bhagalpur Silk Industry Crisis Khat Kho Echo Fading Deshaj Times Special Report
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सक्रिय बुनकर सिर्फ 1500-2000 बचे हैं। कुल जुड़ी आबादी 15-20 हजार से ज्यादा नहीं। 85% रोजगार मिट्टी में मिल गया।

और सबसे कड़वी सच्चाई – इतने ही बुनकर 1950 में बचे थे जब कमला देवी चट्टोपाध्याय “इंडियन क्राफ्ट्स यात्रा” पर निकली थीं। यानी हम 70 साल पीछे लौट आए।

कारोबार 600 करोड़ से गिरकर 150 करोड़ रह गया। फरवरी के बाद 95% ऑर्डर कैंसिल। यूरोप-अमेरिका से 80 लाख के ऑर्डर ऐसे गायब हुए जैसे कभी थे ही नहीं।

क्यों टूट गया रेशम का धागा?

Bhagalpur Silk Industry Crisis Khat Kho Echo Fading Deshaj Times Special Report
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तसर का धागा जो 5 साल पहले 3000 रु किलो था, आज 75,000 रु किलो है। झारखंड-छत्तीसगढ़ का कोकून अब नहीं आता। सूरत, अहमदाबाद, बेंगलुरु और चीन का यार्न आया है। स्थानीय वैल्यू चेन टूट गई।

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बुनकर 12-18 घंटे करघे पर झुका रहे, दिन के 250-300 रु। मासिक आय 3000-5000 रु। युवा पीढ़ी ने करघा छोड़कर ईंट-गारा उठा लिया।

2022 में “एकीकृत बुनकर विकास योजना” का ऐलान हुआ था। बुनकर कहते हैं – फाइलों में योजना है, जमीन पर सिर्फ वादे। सब्सिडी में गड़बड़ी, बैंक लोन नहीं, ब्रांडिंग नदारद

इतिहास भी रो रहा है…

महाभारत का अंग देश, कर्ण की राजधानी चंपा। 14वीं सदी से सिल्क रूट पर चमकता भागलपुर। 1810 में बुकानन हैमिल्टन ने लिखा –

“भागलपुर का तसर दुनिया में बेजोड़ है।”

2013 में GI टैग मिला, पर वो कागज बनकर रह गया।

Bhagalpur Silk Industry Crisis Khat Kho Echo Fading Deshaj Times Special Report
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तसर, मटका, मलबरी, एरी – चार तरह का सिल्क, चार कहानियां। “थाई रीलिंग” में महिलाएं जांघ पर रगड़कर धागा निकालती थीं। “कुंडी फिनिश” से कपड़े में चमक आती थी। आज वो हाथ थक गए हैं।

एक उम्मीद की लौ अभी बाकी है

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पेरिस, लंदन, न्यूयॉर्क में आज भी भागलपुरी तसर की मांग है। NIFT के युवा डिजाइनर साड़ियों पर नए रंग भर रहे हैं। कपड़ा मंत्रालय बिहार में अरण्डी के पत्ते पर एरी सिल्क का पायलट प्रोजेक्ट ला रहा है। भागलपुर, पूर्णिया, मुंगेर में कस्टर की खेती से उम्मीद जगी है।

लेकिन उम्मीद तब तक अधूरी है जब तक सस्ता धागा नहीं मिलेगा, बैंक लोन नहीं खुलेगा, और बाजार तक रास्ता नहीं बनेगा।

एक नज़र में समझिए

  • कांचीपुरम सिल्क महंगी हुई

    सोना-चांदी के दाम बढ़ने से कांचीपुरम सिल्क साड़ियों की कीमत 40-50% तक बढ़ गई है। जरी बनाने में सोना-चांदी इस्तेमाल होता है, इसलिए 70 हजार की साड़ी अब 1.2 लाख तक पहुंच गई है। ग्राहक अब बिना जरी वाली सस्ती साड़ियां खरीद रहे हैं, जिससे प्रीमियम सेगमेंट के बुनकरों का काम ठप्प हो गया है।

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भागलपुर सिल्क पर अमेरिकी टैरिफ का झटका

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अमेरिका के टैरिफ की वजह से भागलपुर का सिल्क कारोबार मुश्किल में है। 70-80 करोड़ का तैयार माल फंस गया है, ऑर्डर कैंसिल हो रहे हैं। अमेरिका को जाने वाले मटका सिल्क, तसर कटिया, घिचा जैसे कपड़ों की डिमांड कम हो गई है। बुनकरों का कहना है कि कोरोना के बाद जो कारोबार 200 करोड़ से 50 करोड़ पर आया था, अब टैरिफ ने हालात और बिगाड़ दिए हैं।

  • उत्तराखंड में दो नए सिल्क पार्क बनेंगे

    कुमाऊं और गढ़वाल मंडल में एक-एक सिल्क पार्क बनाने की घोषणा हुई है। सरकार किसानों को पौधारोपण, कीटपालन, उपकरण और ट्रेनिंग दे रही है। उत्तराखंड में पहले से 6000 से ज्यादा लोग रेशम उद्योग से जुड़े हैं, और यहां का मलबरी रेशम देशभर में सराहा जा रहा है।

झारखंड तसर सिल्क का हब बना

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झारखंड देश के कुल तसर उत्पादन का 70% करता है। 2001 में 90 मीट्रिक टन था, जो 2024-25 में 1363 मीट्रिक टन पहुंच गया। झारखंड की महिलाएं लाइव डेमो देकर कोकून से धागा निकालने की प्रक्रिया दिखा रही हैं।

भागलपुर के लिए ये सिर्फ आंकड़ा नहीं है। ये एक पूरी पीढ़ी का पेशा बदल जाना है। वो पीढ़ी जिसने “खट-खो” की धुन पर जीवन बुना था।

अगर अब भी कदम नहीं उठे, तो वो दिन दूर नहीं जब नाथनगर की गलियां सिर्फ इतिहासकारों की किताबों में जिंदा रहेंगी।

और “सिल्क नगरी” सिर्फ एक नाम बनकर रह जाएगी – एक नाम, जो कभी रेशम की पहचान था।

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