
Maithili Research: मिथिला की समृद्ध साहित्यिक विरासत पर शोध कितना और क्यों जरूरी है? इसी सवाल के जवाब और भविष्य की दिशा तय करने के लिए ठाकुर विश्वविद्यालय में एक विशेष व्याख्यान का आयोजन हुआ। इसमें प्रख्यात विद्वान डॉ. शांतिनाथ सिंह ठाकुर ने आधुनिक मैथिली साहित्य में अनुसंधान के कई अनछुए पहलुओं को उजागर किया और शोध की अहमियत बताई।
ठाकुर विश्वविद्यालय के मैथिली विभाग में ‘आधुनिक मैथिली भाषा साहित्य में अनुसंधान की दशा और दिशा’ विषय पर एक विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया। मुख्य वक्ता के तौर पर महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह मेमोरियल महाविद्यालय के अवकाश प्राप्त सहायक प्राध्यापक डॉ. शांतिनाथ सिंह ठाकुर ने अपने विचार रखे। कार्यक्रम की अध्यक्षता विभागाध्यक्ष प्रो. अरुण कुमार कर्ण ने की, जबकि पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. दमन कुमार झा ने स्वागत भाषण दिया और विषय का उपस्थापन किया।
Maithili Research के नए आयाम
डॉ. शांतिनाथ सिंह ठाकुर ने अपने व्याख्यान में मैथिली अनुसंधान के कई अनदेखे और महत्वपूर्ण पहलुओं को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि महाकवि विद्यापति और चंदा झा की पदावली पर तो बहुत चर्चा हुई है, लेकिन उनके काव्यशास्त्रीय पक्ष और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अभी गहन अध्ययन बाकी है।
डॉ. ठाकुर ने विद्यापति के रचना संसार को तीन मुख्य भागों में वर्गीकृत किया: भक्ति विषयक, श्रृंगारिक विषयक और व्यावहारिक विषयक। उन्होंने एक महत्वपूर्ण शोधपरक तथ्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनके ‘व्यवहार गीत’ तत्कालीन लोककंठ, खासकर महिलाओं में सुरक्षित थे, लेकिन सामान्य पदों की तुलना में इन पर उतना अनुसंधान नहीं हो सका। इसका मुख्य कारण समाज में कड़ाई से व्याप्त पर्दा प्रथा थी। इस सामाजिक रूढ़ि के चलते अनुसंधानकर्ता उन तक सीधे नहीं पहुँच सके जहाँ ये गीत जीवित थे।
आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1। डॉ. ठाकुर ने आगे बताया कि इन गीतों के जो भी अंश आज उपलब्ध हैं, वे मुख्यतः पुरुष वर्ग की कृपा से ही मिल पाए, जिन्होंने अपने घर की स्त्रियों से उन गीतों को सुना और फिर अनुसंधानकर्ताओं के समक्ष उसका वाचन किया। यही कारण है कि ‘व्यवहार गीत’ आज तक पूरी तरह संचित और संग्रहित नहीं हो सके हैं।
शोधार्थियों के लिए इतिहास का महत्व
Maithili Research के लिए ऐतिहासिक ज्ञान अनिवार्य है। विद्यापति द्वारा रचित ‘उचिती गीतों’ का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि साहित्य के शोधार्थियों के लिए इतिहास की जानकारी रखना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने ऐतिहासिक दृष्टि से शोध करने पर विशेष बल दिया और बताया कि कवि लोचन के दरबार में रहकर बहुत सारे उत्कृष्ट संगीत लिखे गए, जिनकी चर्चा आज विदेशों में भी हो रही है। इसके साथ ही उन्होंने मैथिली भाषा के विकास में विभिन्न रियासतों के महत्वपूर्ण योगदान की भी चर्चा की।
केवल डिग्री नहीं, नई दिशा दे अनुसंधान
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. अरुण कुमार कर्ण ने शोधार्थियों का मार्गदर्शन करते हुए कहा कि केवल डिग्री प्राप्त करना ही अनुसंधान का एकमात्र उद्देश्य नहीं होना चाहिए। अनुसंधान ऐसा हो जो आगे का रास्ता दिखाए और समाज के सामने नई वस्तुओं व तथ्यों का संकलन प्रस्तुत करे। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि शोध के निष्कर्ष में शोधार्थी को अपने मौलिक विचारों को महत्व देना चाहिए। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
इस अवसर पर विभाग के वरीय प्राध्यापक प्रो. अशोक कुमार मेहता, डॉ. सुनीता कुमारी, डॉ. सुरेश पासवान और डॉ. अभिलाषा कुमारी सहित बड़ी संख्या में शोधार्थी और छात्र-छात्राएं उपस्थित थे। कार्यक्रम का कुशल संचालन प्रो. दमन कुमार झा ने किया।







