
जब 1785 में भागलपुर के बरगद पर बाबा तिलका को फांसी दी गई, तो हुकूमत ने समझा कि ‘विद्रोह समाप्त’ हो गया। मगर वे भूल गए थे कि आदिवासी संस्कृति में शहादत अंत नहीं, बल्कि एक नए गीत का आग़ाज़ होती है।
वही गीत 1831 में बुद्ध भगत की ज़बान से ‘कोल विद्रोह’ बनकर गूंजा, जहां दस हज़ार से ज़्यादा आदिवासियों ने “अबकी बार, न कोड़, न लगान, न बेगारी” का नारा देकर अंग्रेजी चौकियों को तहस-नहस कर दिया।
और वही गीत 1855 में सिदो-कान्हू और चांद-भैरव की हुंकार बनकर ‘संथाल हूल’ के रूप में फूटा। जब तीस हज़ार संथालों ने तीर-कमान उठाए, तो उनके गीतों में आज भी बाबा तिलका का नाम गूंज रहा था—”बाबा तिलका ने ख़ून दिया, अब हमारी बारी है।”

दुश्मन वही था—चाहे वह कंपनी का अफ़सर हो, ज़मींदार हो या दिकू महाजन। मुद्दा भी वही था—अपनी ही ज़मीन पर बटाईदार बना दिए जाने का दर्द और जल-जंगल-ज़मीन की अस्मिता पर हुआ वार। तिलका मांझी महज़ एक योद्धा नहीं थे, वे पहले स्वतंत्रता सेनानी और आदिवासियों के आदि-गुरु थे, जिनके दिखाए रास्ते पर चलकर कोल और संथालों ने हूल का इतिहास लिखा।
आइए, देशज टाइम्स की इस विशेष पड़ताल के ज़रिए इतिहास की उस अनवरत धारा को समझते हैं, जहां कागज़ भले ही ख़ामोश हो जाएं मगर लोक की स्मृतियां आज भी चीख़कर पूछती हैं—“धरती हमारी है, तो हम गुलाम क्यों?”
तिलका पहले स्वतंत्रता सेनानी, बाकी सब शिष्य…तिलका की चिंगारी से कोल और संथाल विद्रोह तक…एक ही लड़ाई की तीन लहरें…इतिहास की किताबें तीन विद्रोहों को तीन तारीखों में बांट देती हैं—1771, 1831, 1855। पर लोक की स्मृति तारीख नहीं मानती। लोक जानता है कि तिलका मांझी ने 1771 में जो मशाल जलाई थी, वो बुझी नहीं। वो राख के नीचे सुलगती रही, और 60 साल के अंदर दो बड़े ज्वालामुखी बनकर फूटी—1831 का कोल विद्रोह और 1855 का संथाल हूल। ये तीनों अलग घटनाएं नहीं, एक ही संघर्ष की तीन लहरें हैं।

तिलका मांझी 1771-1785: नींव रखी गई
तिलका का युद्ध तीन चीजों के खिलाफ था, जो आज भी जंगल-पहाड़ में जिंदा हैं:

जमींदारी-महाजनी शोषण: अंग्रेजों ने स्थायी बंदोबस्त के तहत जमीन महाजनों को सौंप दी। आदिवासी अपनी ही जमीन पर बटाईदार बन गया। जो धरती उसकी मां थी, वही कागज पर किसी और की हो गई।
अत्यधिक कर और जबरन वसूली: 1770 के भयावह सूखे में भी कंपनी ने लगान दोगुना कर दिया। अनाज नहीं तो जमीन छीन लो—यही फरमान था।

न्याय का अभाव: कचहरी अंग्रेजों की, कानून महाजनों का। आदिवासी की फरियाद सुनने वाला कोई नहीं था।
तिलका ने छापामार युद्ध से, अंग्रेज अफसरों पर हमले से और सामूहिक लामबंदी से दिखा दिया कि आदिवासी संगठित हो तो साम्राज्य भी डगमगा सकता है। 1785 में भागलपुर में उन्हें बरगद से लटका दिया गया। पर फांसी ने आंदोलन नहीं रोका, उसे गीत बना दिया। और गीत 50 साल तक पहाड़ियों में गूंजते रहे।
1831 का कोल विद्रोह: पहली बड़ी लहर
तिलका की शहादत के 46 साल बाद, छोटानागपुर के कोल, मुंडा आदिवासियों ने हथियार उठा लिए। कारण वही थे, सिर्फ चेहरे बदले थे।

ठिकेदार और महाजन का राज: अंग्रेजों ने जमीन ठिकेदारों को दे दी। ये ठिकेदार बाहरी महाजन और बंगाली पटवारी लाए। उन्होंने जमीन हड़पी, बंधुआ मजदूरी थोप दी।
बेगारी और जबरन श्रम: सड़क, किले, साहब के बंगले—सब आदिवासी से बेगारी करवाकर बनवाए गए। मजदूरी का नाम नहीं, कोड़े का निशान मिला।

सांस्कृतिक अपमान: बाहरी लोग आदिवासी देवस्थलों, अखरा, सरना स्थलों को अपवित्र करने लगे।
कोल विद्रोहियों का नारा था—
“अबकी बार, न कोड़, न लगान, न बेगारी।”
नेता बुद्ध भगत थे। वो खुलकर कहते थे—
“बाबा तिलका ने जो रास्ता दिखाया, वही हम चल रहे हैं।”
1831 में 10,000 से ज्यादा कोल विद्रोहियों ने अंग्रेजी चौकियों पर हमला किया। अंग्रेजों को फौज बुलानी पड़ी। बुद्ध भगत मारे गए, पर विद्रोह ने साबित कर दिया कि तिलका की चिंगारी राख नहीं हुई है।
1855 का संथाल हूल: ज्वालामुखी का विस्फोट

तिलका के 84 साल बाद, संथाल परगना में सिदो-कान्हू, चांद-भैरव के नेतृत्व में 30,000 से ज्यादा संथाल उठ खड़े हुए। इसे उन्होंने “हूल” कहा—मतलब विद्रोह, तूफान।
दिकू का शोषण: “दिकू” यानी बाहरी महाजन, पटवारी, police। सूद पर कर्ज देते, न चुकाने पर जमीन और इज्जत दोनों छीन लेते।
रेलवे और जमीन अधिग्रहण: अंग्रेज संथाल इलाके में रेल ला रहे थे। जमीन छीनकर आदिवासियों को बेदखल किया जा रहा था।

तिलका की स्मृति: संथाल गीतों में तिलका मांझी अब भी जिंदा हैं। सिदो-कान्हू सभाओं में कहते — “बाबा तिलका ने खून दिया, अब हमारी बारी है।”

1855 में भगनाडीह में 10,000 संथालों ने इकट्ठा होकर हूल का ऐलान किया। कचहरी, डाकखाना, महाजनों के घर—सब जल उठे। अंग्रेजों ने मार्शल लॉ लगा दिया। 15,000 से ज्यादा संथाल शहीद हुए।
पर खून बेकार नहीं गया। इसी हूल के बाद अंग्रेजों को “संथाल परगना टेनेंसी एक्ट 1876” बनाना पड़ा, जिसमें आदिवासी जमीन की बिक्री पर रोक लगी।

एक ही चिंगारी, तीन आग
| विशेषता | तिलका मांझी 1771-85 | कोल विद्रोह 1831 | संथाल हूल 1855 |
| दुश्मन | अंग्रेज, महाजन, जमींदार | ठिकेदार, महाजन, पटवारी | दिकू महाजन, कंपनी |
| कारण | जमीन हड़प, लगान, बेगारी | जमीन लूट, अपमान | कर्ज, जमीन छीनना, रेलवे |
| तरीका | छापामार युद्ध | सामूहिक हमला | संगठित हूल |
| स्मृति | लोकगीतों में जिंदा | तिलका को गुरु माना | तिलका का नाम लेकर लड़े |
तिलका ने सिर्फ युद्ध नहीं किया। उन्होंने आदिवासी अस्मिता को भाषा दी। उन्होंने दिखा दिया कि हार मानना मजबूरी नहीं है।
इसीलिए इतिहासकार कहते हैं:
तिलका मांझी पहले स्वतंत्रता सेनानी थे, कोल और संथाल विद्रोह उनके शिष्य थे।
तिलका की चिंगारी आज भी नहीं बुझी। जब भी आदिवासी जल, जंगल, जमीन के लिए लड़ते हैं, तब वही सवाल उठता है जो तिलका ने 1771 में उठाया था—
“धरती हमारी है, तो हम गुलाम क्यों?”

महाश्वेता देवी ने ठीक ही लिखा है—
“जहाँ कागज खामोश हो जाते हैं, वहाँ लोक की स्मृति बोलती है।”
और लोक आज भी बोलता है—
बाबा तिलका मांझी, खाम खुंटी काना हो।






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