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Deshaj Times Special : ‘ सिल्वर स्क्रीन ‘ की रील से उतरी रियल हेरोइन

कभी सिनेमा के परदे पर देखा था जो तबाही का मंज़र, सोचा न था वो क़यामत एक दिन अपने ही घर आएगी। शराब की बोतल तो टूटी, मगर पुड़िया ने ऐसा डसा, कि हँसती-खेलती नसल यहाँ ख़ाक में मिल जाएगी।यह सिर्फ़ एक ख़बर नहीं, बल्कि सिल्क नगरी भागलपुर की रगों में चुपचाप उतरते उस काले ज़हर का मरसिया (शोकगीत) है जिसने हमारी 'खाम खुंटी' यानी नई पीढ़ी को दीमक की तरह चाटना शुरू कर दिया है। साल 1988 में जब अजंता टॉकीज के परदे पर संजय दत्त की फ़िल्म में लोग 'ब्राउन शुगर' की तस्करी का खेल देख रहे थे, तब किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि रील का वह ख़ौफ़नाक खेल एक दिन भागलपुर की तंग गलियों की हक़ीक़त बन जाएगा।

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न् 2016 की शराबबंदी के बाद नशे के सौदागरों ने अपना पैंतरा बदला। बोतल की जगह अब जेबों में आसानी से छिप जाने वाली उस घातक पुड़िया ने ले ली, जिसे ‘स्मैक’ या ‘सूखा नशा’ कहा जाता है। आदमपुर, नाथनगर और तिलकामांझी जैसे इलाक़ों के कॉलेज जाने वाले लड़के—जिनकी उम्र महज़ 16 से 25 साल है—इस मौत के सौदागरों के आसान शिकार बन रहे हैं।

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विशेषज्ञों की राय बंटी है कि क्या सिनेमा ने इस ज़हर का बीज बोया या उसने सिर्फ़ समाज का आइना दिखाया। मगर हक़ीक़त यह है कि आज अजंता टॉकीज तो बंद होकर इतिहास बन चुका है, लेकिन ब्राउन शुगर का वह काला कारोबार 2026 में भी बदस्तूर जारी है। सिर्फ़ दो सौ से पाँच सौ रुपये की एक पुड़िया युवाओं को डिप्रेशन, हेपेटाइटिस और अपराध के उस दलदल में धकेल रही है जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं बचता।

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जब माँ-बाप अपने ही बच्चों की आँखों में उतरते इस सूनेपन और चिड़चिड़ेपन से डरने लगें, तो समझ जाना चाहिए कि पानी सर से ऊपर बह चुका है। आइए, हिमांशु शेखर की इस विशेष रिपोर्ट के ज़रिए इस कड़वे सच का सामना करते हैं और जानते हैं कि आख़िर क्यों इस ज़हर के ख़िलाफ़ पुलिस, परिवार और समाज को एक साथ जिरहबख्तर बनकर खड़ा होना होगा।

जंता टॉकीज के पर्दे से भागलपुर की गलियों तक: ब्राउन शुगर का काला कारोबार…साल 1988। भागलपुर का अजंता टॉकीज हाउसफुल था। संजय दत्त की फिल्म में लोग ब्राउन शुगर की तस्करी का खेल देख रहे थे। किसी ने नहीं सोचा था कि पर्दे पर दिखने वाला वो जहर एक दिन शहर की रगों में उतर जाएगा।

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Deshaj Times Special : ' सिल्वर स्क्रीन ' की रील से उतरी रियल हेरोइन

आज 36 साल बाद भागलपुर समेत पूरा बिहार “सूखे नशे” की चपेट में है। शराबबंदी 2016 के बाद नशे के सौदागरों ने ब्राउन शुगर, स्मैक, चरस, गांजा को गांव-गांव पहुंचा दिया।

क्या है ये “सूखा नशा” ब्राउन शुगर?

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ब्राउन शुगर हेरोइन का अशुद्ध रूप है। इसे स्मैक भी कहते हैं। रंग हल्का भूरा या मटमैला होता है, इसलिए नाम ब्राउन शुगर। ये अफीम से निकलने वाले मॉर्फिन से बनता है।

  • कैसे तैयार होता है: अफीम की खेती से निकले कच्चे माल को रासायनिक प्रक्रिया से गुजारा जाता है। इसमें कई जहरीले केमिकल मिलाए जाते हैं। ये प्रक्रिया अवैध लैब में होती है। सुरक्षा कारणों से इसकी विस्तृत विधि नहीं दी जा सकती। तैयार माल को पुड़िया में पैक कर बेचा जाता है। एक पुड़िया 200 से 500 रुपये की मिलती है।

Deshaj Times Special : ' सिल्वर स्क्रीन ' की रील से उतरी रियल हेरोइन

  • कैसे करते हैं सेवन: नशेड़ी इसे पन्नी या सिगरेट में रखकर जलाते हैं और धुआं खींचते हैं। इसे “चेजिंग” कहते हैं। कुछ लोग इंजेक्शन से भी लेते हैं।

भागलपुर-बिहार में कितना फैला जाल?

भागलपुर में कार्रवाई:

  • 2023-2024: भागलपुर पुलिस ने NDPS एक्ट में 60+ केस दर्ज किए। 90 से ज्यादा तस्कर गिरफ्तार।

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  • 2024, अगस्त: तिलकामांझी इलाके से 50 ग्राम ब्राउन शुगर के साथ 2 युवक पकड़े गए।

  • 2025, मार्च: नाथनगर में कॉलेज छात्र से 30 पुड़िया बरामद। खरीदार 16 से 25 साल के लड़के।

बिहार का हाल —

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Bihar Police के अनुसार 2022 से 2025 के बीच सूखे नशे के 11,000+ केस दर्ज हुए। 15,000+ लोग गिरफ्तार। पटना, मुजफ्फरपुर, गया, पूर्णिया, कटिहार हॉटस्पॉट बने हैं। बंगाल, झारखंड, नेपाल बॉर्डर से तस्करी हो रही है।

शराबबंदी के बाद नशे का पैटर्न बदला। बोतल की जगह पुड़िया ने ले ली। क्योंकि छिपाना आसान, नशा तेज।

मानव जीवन पर जहर जैसा असर

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डॉक्टरों के अनुसार ब्राउन शुगर शरीर को दीमक की तरह खा जाता है:

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शारीरिक असर:

  • 2-3 महीने में वजन 10-15 किलो कम

  • लीवर, किडनी फेल होने का खतरा

  • हेपेटाइटिस-B, C का खतरा

  • सांस की बीमारी, टीबी

मानसिक असर:

  • याददाश्त कमजोर, चिड़चिड़ापन

  • डिप्रेशन, आत्महत्या की प्रवृत्ति

  • नशा न मिलने पर शरीर में तेज दर्द, कंपकंपी

सामाजिक असर:

नशे के लिए चोरी, छिनतई, घर का सामान बेचना आम हो गया है। भागलपुर के कई मोहल्लों में मां-बाप अपने ही बच्चों से डरने लगे हैं।

क्या सिनेमा का बुरा असर समाज पर पड़ रहा है?

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संजय दत्त की फिल्म में ब्राउन शुगर दिखाया गया था। सवाल उठता है—क्या फिल्में नशे को बढ़ावा देती हैं?

विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है:

  • पक्ष 1: हां, असर पड़ता है

    मनोवैज्ञानिक कहते हैं, “सिनेमा में ग्लैमर के साथ नशा दिखाने से युवा उसे ‘कूल’ समझते हैं। अजंता टॉकीज में 1988 में जिसने फिल्म देखी, उसने पहली बार ‘ब्राउन शुगर’ शब्द सुना। बीज वहीं पड़ा।”

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  • पक्ष 2: नहीं, सिनेमा आईना है

    फिल्म समीक्षक प्रवीण झा का तर्क है, “सिनेमा समाज को दिखाता है, बनाता नहीं। नशा पहले से था, फिल्म ने उजागर किया। असली वजह बेरोजगारी, डिप्रेशन, आसान पैसा और तस्करों का नेटवर्क है।”

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संतुलित बात:

सेंसर बोर्ड अब फिल्मों में नशे के सीन से पहले चेतावनी जरूरी करता है। कानून भी है कि नशे को महिमामंडित नहीं किया जा सकता। पर असल लड़ाई पुलिस, परिवार और जागरूकता की है। सिर्फ फिल्म को दोष देना पूरा सच नहीं।

प्रशासन क्या कर रहा है?

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  • भागलपुर में एंटी-नारकोटिक्स सेल सक्रिय। स्कूल-कॉलेज में जागरूकता अभियान।

  • NDPS एक्ट में सजा सख्त: 10 ग्राम से ज्यादा मिलने पर 10 साल तक जेल

  • 1933 हेल्पलाइन पर नशा तस्करी की सूचना दे सकते हैं। नाम गुप्त रहेगा।

SSP भागलपुर प्रमोद कुमार यादव का बयान:

“नशे के खिलाफ जीरो टॉलरेंस है। पकड़े गए 90% लड़के 18-30 साल के हैं। मां-बाप बच्चों पर नजर रखें। पुड़िया, जली पन्नी, इंजेक्शन दिखे तो तुरंत 112 पर कॉल करें।”

अजंता टॉकीज आज बन्द हो गया, पर ब्राउन शुगर का खेल जारी है। 1988 में हमने फिल्म में तस्करी देखी थी। 2026 में हम अपने घर के बच्चों को बचाने की जंग लड़ रहे हैं। शराबबंदी के बाद सूखा नशा नई चुनौती है।

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सिनेमा समाज का आईना हो सकता है, पर नशे का जहर रोकने के लिए पुलिस, परिवार और समाज—तीनों को एक साथ खड़ा होना होगा। वरना “खाम खुंटी” यानी हमारी अगली पीढ़ी नशे की भेंट चढ़ जाएगी।

यदि आप या आपका कोई परिचित नशे की लत से जूझ रहा है, तो तुरंत नजदीकी सरकारी अस्पताल के नशा-मुक्ति केंद्र या राष्ट्रीय हेल्पलाइन 14446 पर संपर्क करें।

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