Bihar Panchayat Election: आगामी बक्सर जिले में बिहार पंचायत चुनाव की सरगर्मियां तेज हो गई हैं। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, आरक्षण रोस्टर और सीटों के चक्रीकरण ने स्थानीय राजनीति में एक नई हलचल पैदा कर दी है। इस बार कई स्थापित नेताओं को अपनी राजनीतिक जमीन खिसकने का डर सता रहा है, क्योंकि नए समीकरणों ने उनकी नींद उड़ा दी है।
त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव 2026 को लेकर बक्सर जिले में सस्पेंस का माहौल बना हुआ है। पंचायतों की सीटों का रोटेशन (चक्रीकरण) इस बार कई मौजूदा मुखिया और पार्षदों के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर रहा है। जिला प्रशासन द्वारा नए सिरे से आरक्षण रोस्टर तैयार किया जा रहा है, जिसके कारण कई जाने-पहचाने चेहरों की सीटों में बदलाव होना तय माना जा रहा है।




सीटों के चक्रीकरण ने बढ़ाई चिंता
बिहार पंचायती राज अधिनियम के तहत, कोई भी सीट स्थायी रूप से एक ही वर्ग के लिए आरक्षित नहीं रह सकती। हर दो चुनाव के बाद सीटों का स्वरूप बदलना अनिवार्य होता है। ऐसे में सिमरी, राजपुर, ब्रह्मपुर, डुमराव और नावानगर जैसे प्रखंडों में बड़े राजनीतिक उलटफेर के संकेत मिल रहे हैं। जो नेता अब तक अपनी सीट को सुरक्षित मानकर चल रहे थे, वे अब पंचायत राज कार्यालयों के चक्कर लगाकर नए समीकरण को समझने में जुटे हैं।
महिला आरक्षण से बदली चुनावी रणनीति
इस बार के पंचायत चुनाव में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू होने से आधी सीटें उनके खाते में जाएंगी। इस प्रावधान ने कई पुरुष उम्मीदवारों की राजनीतिक रणनीति को पूरी तरह बदल दिया है। अब कई दिग्गज नेता ‘प्लान-बी’ के तहत अपनी पत्नी, मां या बहू को चुनाव मैदान में उतारने की तैयारी कर रहे हैं। कई जगहों पर पुरुष नेता खुद पीछे रहकर महिला उम्मीदवारों के नाम पर प्रचार भी शुरू कर चुके हैं।
बक्सर की 142 पंचायतों पर असर
बक्सर जिले के 11 प्रखंडों की कुल 142 पंचायतों में इस बार नए आरक्षण रोस्टर का सीधा असर देखने को मिलेगा। सिमरी प्रखंड में सबसे ज्यादा बदलाव की संभावना जताई जा रही है। वहीं, ब्रह्मपुर और राजपुर में भी कई सीटों के आरक्षित होने की चर्चा है। शहरी क्षेत्र से सटे बक्सर, डुमराव और नावानर में परिसीमन और मतदाता संतुलन के कारण नए चेहरे सामने आ सकते हैं। चौसा और इटाढ़ी जैसे इलाकों में युवाओं के लिए अवसर बढ़ने की उम्मीद है।
प्रशासन द्वारा अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) की नई जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर सीटों का निर्धारण किया जा रहा है। जहां इन वर्गों की आबादी बढ़ी है, वहां सीटों का आरक्षण बदलना तय है। सियासी समीकरण बदलते देख कई नेता अब अपनी पंचायत छोड़कर पड़ोसी पंचायतों में जमीन तलाश रहे हैं और वहां सामाजिक गतिविधियों में भाग लेकर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
फिलहाल, अंतिम आरक्षण रोस्टर जारी होने तक बक्सर की राजनीतिक फिजा में अनिश्चितता बनी रहेगी। यह तय है कि आगामी पंचायत चुनाव कई पुराने चेहरों के लिए बड़ी चुनौती और नए उम्मीदवारों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर साबित होने वाले हैं।







