
Bihar Vedic Research: नई दिल्ली में आयोजित ‘पितृसमीक्षा’ पर एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्यशाला में दरभंगा स्थित ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ कृष्णकान्त झा ने ‘यम के स्वरूप’ पर गहन व्याख्यान दिया। श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा 15 से 21 जून, 2026 तक चलने वाली इस सात दिवसीय कार्यशाला में डॉ झा ने मुख्य वक्ता के रूप में अपनी बात रखी। उनके व्याख्यान ने वैदिक विज्ञान के गूढ़ रहस्यों को उजागर किया, खासकर यम और पितरों से जुड़े पहलुओं पर उन्होंने विस्तार से चर्चा की।
अग्नितत्त्व और सोमतत्त्व में छिपा है यम का वैदिक रहस्य
कार्यशाला के चौथे दिन, जेएनयू, नई दिल्ली के संस्कृत एवं प्राच्य विद्या अध्ययन संस्थान के आचार्य प्रो संतोष कुमार शुक्ल की अध्यक्षता में डॉ कृष्णकान्त झा ने ‘पितृ समीक्षा में यम का स्वरूप’ विषय पर अपना ऑनलाइन संबोधन दिया। उन्होंने वैदिक विज्ञान के सिद्धांतों को समझाते हुए बताया कि अग्नितत्त्व और सोमतत्त्व के विष्टम्भभाव को ही ‘यम’ कहा जाता है। डॉ झा के अनुसार, यम पितरों के अधिपति हैं, जो इन दोनों मूलभूत तत्वों के संतुलन और स्थिति को नियंत्रित करते हैं। यह व्याख्यान भारतीय दर्शन और वैदिक परंपरा को समझने की एक नई दिशा प्रदान करता है।




डॉ कृष्णकान्त झा ने कहा, ‘अग्नितत्त्व एवं सोमतत्त्व के विशद व्याख्यान के क्रम में कहा कि इन दोनों तत्त्वों के विष्टम्भभाव को यम कहा जाता है। यम पितरों के अधिपति हैं।’
पितरों की श्रेणियां और कार्यशाला की व्यापकता
डॉ झा ने अपने संबोधन में पितरों की विभिन्न श्रेणियों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि पितरों को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा जा सकता है: दिव्य पितर, ऋतु पितर और प्रेत पितर। इन श्रेणियों को क्रमशः पर, मध्यम और अवर के नाम से भी जाना जाता है। इस राष्ट्रीय कार्यशाला में देश-विदेश से 100 से अधिक शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी और भारतीय संस्कृति के अनुरागी ऑनलाइन माध्यम से जुड़े। श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान, नई दिल्ली के सचिव के आग्रह पर डॉ झा ने यह महत्वपूर्ण व्याख्यान दिया, जिसकी सराहना विश्वविद्यालय के शिक्षकों, संबंधियों और मित्रों ने की है। यह आयोजन वैदिक ज्ञान के प्रचार-प्रसार में एक मील का पत्थर साबित हो रहा है।







