
पोखर की मिट्टी में बुलडोजर चल रहा था। मजदूर रोज की तरह खुदाई कर रहे थे। तभी फावड़ा किसी पत्थर से टकराया। पहले लगा कोई साधारण चट्टान होगी, लेकिन जैसे-जैसे मिट्टी हटती गई, सदियों पुराना इतिहास बाहर आने लगा। काले पत्थर की एक दुर्लभ प्रतिमा, जिसका सिर गायब था, मगर शरीर पर उकेरी गई बारीक नक्काशी बता रही थी कि यह कोई मामूली मूर्ति नहीं है। जांच हुई तो पता चला कि यह पालकालीन दौर की जाम्भल प्रतिमा है, जो करीब 900 से 1200 साल पुराने इतिहास की गवाही दे रही है। इस खोज ने न सिर्फ लखीसराय बल्कि पूरे बिहार के पुरातात्विक नक्शे पर एक नया अध्याय जोड़ दिया है।
खबर विस्तार से बिहार के लखीसराय जिले में एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक खोज सामने आई है, जिसने क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत को नई पहचान दी है। शहर के संसार पोखर की खुदाई के दौरान नौवीं से बारहवीं शताब्दी ईस्वी के पालकालीन दौर की एक दुर्लभ जाम्भल प्रतिमा मिली है। लगभग दो फीट ऊंची यह काले पत्थर की प्राचीन प्रतिमा अब लखीसराय संग्रहालय में सुरक्षित रख दी गई है, जिससे इतिहास प्रेमियों और शोधकर्ताओं में उत्साह का माहौल है।




प्रारंभिक जांच में इसे जाम्भल की प्रतिमा के रूप में पहचाना गया है, जिसे विशेषज्ञ पालकाल की एक अमूल्य धरोहर मान रहे हैं। इस खोज से लखीसराय के प्राचीन इतिहास और संस्कृति को समझने में महत्वपूर्ण मदद मिलेगी।
कैसे सामने आई यह ऐतिहासिक खोज?
संसार पोखर में सुंदरीकरण का काम चल रहा था, जिसके तहत खुदाई की जा रही थी। इसी दौरान यह प्राचीन प्रतिमा मिली। सुरक्षा कारणों से इसे तत्काल कवैया थाना में जमा करा दिया गया था। अनुमंडल पदाधिकारी को इस महत्वपूर्ण खोज की सूचना मिलते ही उन्होंने मामले की गंभीरता को समझा।
इसके बाद जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी सह सहायक संग्रहालयाध्यक्ष डॉ. मृणाल रंजन ने इस मामले में त्वरित कार्रवाई की। शनिवार को कवैया थानाध्यक्ष रंधीर कुमार ने सभी वैधानिक प्रक्रियाओं को पूरा करते हुए इस दुर्लभ प्रतिमा को विधिवत रूप से संग्रहालय प्रशासन को सौंप दिया।
डॉ. मृणाल रंजन ने बताया, ‘यह प्रतिमा लखीसराय के इतिहास के लिए एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसके मिलने से पालकालीन संस्कृति और कला पर नई रोशनी पड़ेगी। संग्रहालय में इसे सुरक्षित रखने के बाद आगे की जांच और शोध कार्य किए जाएंगे।’
संग्रहालय में सुरक्षित, अब क्या होगा?
पालकालीन जाम्भल प्रतिमा के संग्रहालय में सुरक्षित होने के बाद अब पुरातत्वविदों द्वारा इसकी विस्तृत जांच की जाएगी। प्रतिमा की संरचना, उस पर उकेरी गई कलाकृतियों और उसके निर्माण में प्रयुक्त पत्थर का अध्ययन किया जाएगा, ताकि इसके ऐतिहासिक महत्व को और गहराई से समझा जा सके। यह खोज न केवल लखीसराय बल्कि पूरे बिहार के पुरातात्विक मानचित्र पर एक नया अध्याय जोड़ेगी।
यह दुर्लभ धरोहर अब आम जनता के लिए भी उपलब्ध होगी, जिससे लोग बिहार की समृद्ध प्राचीन संस्कृति से रूबरू हो सकेंगे। यह प्रतिमा आने वाले समय में जिले के पर्यटन और ऐतिहासिक अध्ययन को भी बढ़ावा देगी।







