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फ़रवरी, 11, 2026
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From the Editor-in-Chief: सच मानो मेरे भाई/चलो/उठो/ टाइम आ गया/अब मौत होने पर जश्न मनाया जाए

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Deshaj Group Editor-in-Chief Manoranjan Thakur on the deadly second wave.

बसे पहले रोहित तुम्हें नमन/ तेरे जाने का क्षणिक दु:ख है/ वह भी आज तक/ कल-तुम्हें/ देश भूल जाएगा/ बाकी निशां बचेंगे नहीं/पत्रकारिता यूं ही/धीरे-धीरे/खामोश/स्तब्ध/अकारण/बुत बन/कहीं सोया/मौत की सिरहाने पड़ा मिलेगा/ कारण, तुमने ही तो कहा था/ मेरे दोस्त/ मेरे भाई/ जिंदा हो तो वोट/ मर गए तो कूड़ा/ दु:ख है/ आंखें भरीं हुई हैं/ लब थरथरा रहे हैं/सहसा यकीं नहीं है/यह सोचकर/ जानकर/ तुम अब कूड़ा बन चुके हो/ इस देश के लिए/ उस देश के लिए/ जिसके पास जमीं नहीं बची/ दफन कहां करूंगा तुम्हें/आग की लपटों में चैन/ सुकून से सो भी सको तुम/कहां से तलाशूं/ हवाओं के भरोसे/ कटते-हत्या होती पेड़ों से/उसी ऑक्सीजन के भरोसे/ भला/ ऐसी जिंदगी कब-तलक/ सिर्फ आज तक/ वह भी तब/ जब देश की आबादी की महज एक फीसद ही/ अभी काल की कपाट/ उसकी चपेट में है/ हर रोज बिलखते परिवारों के रोते क्रंदित-क्रंदन/ हताश/असंख्य/अनगिनत/ लाशों को कंधे पर उठाए बांहें/ निराश/ व्यवस्था की भयावह त्रासदी में मरने को आतुर बनें हम/ अभी कतार भर में हैं, मेरे दोस्त/ कहीं अस्पतालों के बाहर/ वहीं घरों में/ मौत की तलाश करते/राह भरते/निराहते/उसे स्वीकार करते/ उसकी लौ में खुद/ समाज/परिवार/उस आवरण को/ धधकते/सुलगते देख/ बेसुध/ महसूस/ पड़ा हूं/ कल-तलक/ चुनाव था/ सरकारें थी/ सभाएं थी/ भीड़ था/ कितना शोर था/आज हर तीसरे व्यक्ति में संक्रमण/अचानक/बदहवास/सबकुछ असहज/अनायास/अनायास-कैसे/कहां से/ ऐसा नहीं होता/ ऐसा सब-कुछ/ सबकुछ होता है/ उस देश में/ जब  देश से ऊपर सत्ता का सिंहासन/उसका तख्त खड़ा/बड़ा हो उठे/आत्मा बंधक पड़ते-पड़ते/संड़ाध/दुर्गंध मारती/हांफती/बेजार/हाथों की मुठ्‌ठी में फड़फड़ा उठने को ताकत सहेजने लगे/ सत्ता की लोलुपता/उसकी जरूरत/उसी को मकसद बनाए/ बड़े-बड़े संस्थान/ लोकतंत्र की नींव/ उसकी बुनावट/ उसके सर्वोच्च होने का अहसास ही खत्म/अकारण हत्यारा बन बैठे/ या/ फिर/ उस देश में/ जीने का मतलब कहां शेष/ बची है/ तो कुछ/ चंद सांसें/ जो खुद को जिंदा मानने को कतई तैयार कहां/ दिख रहे/ समझ लेना मेरे दोस्त/अपना देश आ गया/उस कछार पर/सच मानो मेरे भाई/चलो/उठो/ टाइम आ गया/अब मौत होने पर जश्न मनाया जाए/ मुंबई/गुजरात/हर अस्पताल में लगी है आग/

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ये कहां से ले आए हो आग/जिंदा बचा नहीं सकते/कम से कम जिंदा अंत्येष्टि पर क्यों आमादा हो/अस्पतालों की ये आग/कहां से/क्यों/ क्या ऑक्सीजन सिलेंडर थामने की ताकत/ नसों में पड़ती झुरझरी का अहसास/ बयां कर रही है/पहले से खाक होते देश को क्या इस आग लगने से बचा लोगे/ देखो/छोटा ही सही/विरोध की चिंगारी भड़क चुकी/ गांधी कहीं फिर से ना लौट जाएं/रोक लो/देखो/ संकट में है देश और तुम्हें/ पंचायत सरकारें बनाने की इतनी जिद/जल्दी क्यों/ लो/यूपी पंचायत चुनाव का/ शिक्षकों/ कर्मचारियों के दो बड़े संगठनों का मतगणना से बहिष्कार/ झेलो/मौत का हिसाब नहीं दे सकते/कम से कम जिंदगी तो बच जाने दो/सरकार ये आपके हीं विधायक हैं/कह रहे हैं/नौकरशाही के ज़रिए/खेल मत खेलिए/ कोविड नियंत्रण का/सीएम साहेब/आपका प्रयोग/ असफल हो गया/अब तो भाजपा विधायकों की जान बचा लीजिए/या फिर/आप/दिल्ली में राष्ट्रपति शासन ही लगा दीजिए/आप संकट वाली मशीन बन चुके हैं/समझ लीजिए/श्मशान! श्मशान! /मंत्रमुग्ध कब्रिस्तान/आखिर कबतक/वैटिलेटर पर देश/ तारीफें बटोरीं आपने/ नियंत्रित कहां रहा/ अकेला फैसला/ ख़तरनाक संकेत/ऑक्सीजन संकट/ नतीजे/ देश के टुकड़ों में आपसी बैर/ एक तीखी/ गंदी लड़ाई/ सियासी दल/ इल्जाम हटाने की कोशिशें/देश की मानचित्र पर/सिर्फ एक शासन/ एक झंडा/मगर/एक मई/भटकते मजदूर/ खुदकुशी तलाशते हाथ/ टीका नदारद/कौन कर रहा राज/किसकी यह नीति/कौन बताए/किसे पड़ी जरूरत/युवाओं की फौज/सेना के हवाले अस्पताल/आखिर कहां जा रहा देश/ किधर जाने से रोक पाओगे देश को/ लाशों के धंधे/कफन/ताबूत/किडनी बाजार/ जिस्मानी खेल/अंगों की तस्करी/नए दौर में/पुरानी बात/नई बात/सत्ता का कारोबार/

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नसीहत/ दोषारोपण/नीयत/खोट/आराम कुर्सी का स्वाद/कांग्रेस की याद/भाजपा के साथ/देश वहीं/ उसी दोराहे पर/जमींन से आसमां तक/घोर पाप/सत्य बंदी/असत्य का सत्कार/कानून की बात/अकारण/बिना स्वाद/ वर्दी में सफेदी/ खादी में खून/लाल खून का बाजार/ कौन साफ/कौन पाक/ फिर क्यों ना मनाएं तुम्हारी मौत पर जश्न/जब अदालत को केंद्र से पूछना पड़े/ मध्य प्रदेश/ महाराष्ट्र को मांग से अधिक/ दिल्ली को कम ऑक्सीजन क्यों/जवाब/जनता देगी/गलती जिसने की/ उसे हर वोट की कीमत चुकानी पड़ेगी/उसे हक कहां/वह खोजे/करे विकास की तलाश/कहां का इंसाफ/क्यों दे ऑक्सीजन हमारी सरकार/कोई भी महत्वपूर्ण फैसला कहां लेने देंगे तुम्हें/करेंगे बेपर्द/ वजह साफ/ हो रहा/ आज/अपनों का सामाजिक बहिष्कार/ देखो उस बुज़ुर्ग को/अपनी पत्नी की लाश साइकिल पर लाद ले जाने को होना पड़ा है उसे मजबूर/सुन लो/वह सूरज दूर नहीं/जल्द उगेगा/ जब ईवीएम से जिन्न नहीं/ मौत निकलेगा/ फसरी लगाए/नर-पिशाच/नाचेंगे/ तब देर मत करना/तुम भी मेरे साथ आना/ चलना/ मेरे भाई/ मेरे दोस्त/ उस मौत पर जश्न मनानें/जो अभी-अभी कानपुर की एक महिला के लिए ट्वीट कर जिंदगी की जुगाड़ करता/खुद/ देखते-देखते सफेद कपड़ों को तिरंगा समझ लिपट गया/छोड़ गया देश/रह गई उसकी यादें/बस आजतक/कल कोई और उसकी जगह/उसी सफेदी को ओढ़/कफन समझ लेगा/फिर देर मत करना/ उसी मौत पर जश्न मनाने आ जाना/क्योंकि अरे जिंदा बचोगे सिर्फ तुम/देश मर जाएगा/

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