
बिहार में अगले आदेश तक नगर निकाय चुनाव पर रोक लगने का सबसे ज्यादा असर उम्मीदवारों पर पड़ा है। वहीं, किंक मेकरों की मौज हो गई है। किंग मेकर इस वजह से खुश हैं कि चलो खर्चा पानी अभी कुछ दिनों तक और मिलेगा। फिर देखेंगे आगे क्या होता है।
भारत की आजादी के बाद शायद यह पहला अवसर होगा जब नामांकन होने और मतदान को लेकर तैयारी पूरी होने के बाद चुनाव स्थगित करने की घोषणा की गई। वहीं, आरक्षण के मामले पर चुनाव स्थगित होने के बाद कई उम्मीदवार प्रसन्न नजर आए। वहीं हाई कोर्ट के निर्णय का खुल कर स्वागत करते दिखे। कुछ उम्मीदवारों में नाराजगी इस बात को लेकर है कि अब खर्च और बढ़ेगा।
कारण, यह भी है जिससे उम्मीदवारों में चिंता है वह यह कि बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट जाने का फैसला किया है। अगर ऐसा होता है और तो मामले की सुनवाई तत्काल होने के आसार न के बराबर होगी। सुप्रीम कोर्ट अर्जेंट मामलों की ही तत्काल सुनवाई करता है। ऐसे में जब बिहार में चुनाव स्थगित हो चुका है तो मामले की तत्काल सुनवाई की कोई हड़बड़ी एससी नहीं दिखाएगा, इसे सामान्य मामले की तरह ही देखेगा।
ऐसे में, उम्मीदवारों को लग रहा है कि चुनाव लड़ने के लिए उन्होंने बजट तय किया था, लेकिन अगर दो महीने तक चुनाव नही होता तो इन दो महीनो में मतदाताओं को अपने पक्ष में बनाए रखने के लिए अलग अलग मदों में खर्च करना पड़ेगा और यह सोच कर वो परेशान हैं। वही एक मतदाता ने कहा कि चुनाव स्थगित होना यह सिद्ध करता है कि विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं के अंतर्गत सामंजस्य की कमी रही। इस सामंजस्य की कमी का खामियाजा उम्मीदवारों को उठाना पड़ रहा है।
वहीं,वैसे प्रत्याशी समर्थक या कहे तो तथाकथित किंग मेकर भी खुश दिखे जिन्होंने खुद चुनाव नही लड़कर किसी न किसी उम्मीदवार को खड़ा किया है और खर्चा तो उम्मीदवार कर रहे है लेकिन चर्चा में ये किंग मेकर बने हुए है। अब राज्य निर्वाचन आयोग का अगला कदम क्या होता है फिलहाल सभी की नजर इसी बात पर टिकी हुई हैं। लेकिन चुनाव स्थगित होने से उम्मीदवारों की परेशानी तो बढ़ ही चुकी है और उम्मीदवारों के पेशानी पर पसीना साफ दिखाई दे रहा है।
हाईकोर्ट ने स्थानीय नगर निकाय चुनाव में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और अति पिछड़ा वर्ग के लिए सीटों के आरक्षण को अवैध करार दिया है और कहा है कि ऐसी सीटें सामान्य श्रेणी के तौर पर माने जाने के बाद ही चुनाव कराए जाएं।
कई दिनों से मतदाताओं और उम्मीदवारों में चुनाव को लेकर उधेड़-बुन की स्थिति बनी हुई थी। मंगलवार को लोगो के द्वारा अलग अलग कयास लगाए जा रहे थे। लेकिन शाम होते होते स्थिति साफ हो गई।
राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से अगले आदेश तक चुनाव पर रोक लगाए जाने के बाद उम्मीदवार और उनके समर्थक निराश दिखे। चुनाव आयोग ने भले ही उम्मीदवारों के चुनावी खर्च की सीमा को तय किया हो, लेकिन उम्मीदवारों की ओर से चुनाव जीतने के लिए कितनी राशि खर्च की जाती है यह किसी से छुपी हुई नहीं है, बुधवार को एक उम्मीदवार सुरेंद्र कुमार शर्मा ने बताया कि चुनाव की तिथि आगे बढ़ने से खर्च बढ़ जाएगा।
मतदान में एक सप्ताह से भी कम समय बचे रहने से उम्मीदवार खुश थे। लेकिन शाम को अधिसूचना जारी होने के बाद दर्जनों प्रत्याशी जो की मध्यम वर्ग के थे उन्हें खर्च बढ़ने का डर सताने लगा।
इधर,राज्य के वित्त मंत्री विजय चौधरी ने कहा कि नगर निकाय चुनाव पर पटना हाई कोर्ट का फैसला सही नहीं है। नगर निकाय चुनाव पर रोक लगाने से पिछड़े वर्ग के लोगों को नुकसान होगा।
मंत्री ने कहा कि इस बात को कोई भी समझ सकता है कि आरक्षण का प्रावधान 2007 में किया गया था यानी इन 15 वर्षों में इस प्रावधान के तहत तीन नगर निकाय चुनाव हुए हैं। सभी ने देखा है कि पिछड़े वर्ग के पुरुष और महिलाएं हर सामाजिक प्रतियोगिता में आगे बढ़कर आए हैं।
उन्होंने कहा कि राज्य में नगर निकाय चुनाव कराने के लिए बिहार सरकार हमेशा से संकल्पित है कि किसी भी हाल में पिछड़े वर्ग के लोगों का हक नहीं मारा जाना चाहिए। हम इस लड़ाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जाएंगे और वहां से जो अंतिम फैसला आएगा वो हमारे पक्ष में होगा। अगर ऐसा नहीं होता है तो नीतीश सरकार पिछले 15 साल से जो पिछड़े वर्ग को अधिकार देते आ रही है उसका हनन हो जाएगा।
वहीं,नगर निकाय चुनाव पर पटना हाई कोर्ट की रोक के बाद विपक्ष राज्य सरकार पर लगातार हमलावर है। इसी कड़ी में प्रतिपक्ष के नेता विजय कुमार सिन्हा ने बुधवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इसके लिए जिम्मेदार बताया है। विजय सिन्हा ने कहा कि जब ये मामला हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चल रहा था तो सरकार को इसे गंभीरता से लेनी चाहिए थी लेकिन बिहार सरकार ने कभी इस मामले पर विचार ही नहीं किया तो अब पछताने से क्या फायदा?
प्रतिपक्ष के नेता ने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को संवैधानिक संस्था पर भरोसा नहीं है। हाई कोर्ट और चुनाव आयोग के फैसले को भी वह भाजपा से जोड़ देते हैं। वे जनता के बारे में नहीं सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं। सरकार ने जनता और जनहित के विषय को नजरअंदाज किया है। इसी का परिणाम है कि निकाय चुनाव पर रोक लगा दिया गया है। ये सब सरकार की जल्दीबाजी का नतीजा है।




