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मधुबनी पेटिंग की सरकारी उपेक्षा से Patna High Court नाराज…एक सप्ताह के भीतर मांगा ब्लू प्रिंट

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बिहार ही नहीं पूरे देश और विश्व में प्रतिष्ठित मिथिला की पारंपरिक लोक चित्रकला मिथिला पेटिंग की सरकारी उपेक्षा और कलाकारों की दयनीय हालात पर पटना हाई कोर्ट ने नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में एक सप्ताह के भीतर ब्लू प्रिंट दें। ऐसा नहीं करने पर कोर्ट गंभीरता से इसे लेगा।

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जानकारी के अनुसार,पटना हाईकोर्ट में मधुबनी पेंटिंग को लेकर गुरुवार को फिर सुनवाई हुई इस दौरान बिहार सरकार की एक्शन रिपोर्ट से कोर्ट असंतुष्ट नजर आया वहीं याचिकाकर्ता ने कहा कि सरकारी उपेक्षा के कारण कलाकारों का शोषण होता है अब इस मामले में अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद होगी। पढ़िए पूरी खबर

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जानकारी के अनुसार, पटना हाई कोर्ट ने मधुबनी पेटिंग की उपेक्षा को गंभीरता से लिया है। कोर्ट ने कलाकारों की दयनीय स्थिति को लेकर सुनवाई की। कहा कि आत्मबोध की जनहित याचिका पर एसीजे जस्टिस सीएम सिंह की खंडपीठ ने सरकार को दिए गए कार्रवाई रिपोर्ट पर गहरी नाराजगी जताई है।

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आत्मबोध की जनहित याचिका पर एसीजे जस्टिस सी एस सिंह की खंडपीठ ने राज्य सरकार की ओर से दिए गए कार्रवाई रिपोर्ट पर गहरा असंतोष जाहिर किया। कोर्ट ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि यदि इस सम्बन्ध में ब्लू प्रिंट एक सप्ताह में नहीं पेश किया गया, तो कोर्ट इस पर गंभीर रुख अपनाएगा।

कोर्ट ने कहा कि यदि इस संबंध में ब्लू प्रिंट एक सप्ताह के भीतर पेश नहीं किगया गया तो कोर्ट इस पर गंभीर रूख अख्तियार करेगा। पिछली सुनवाई में कोर्ट ने कला और संस्कृति सचिव व उद्योग विभाग के निदेशक को पटना एयरपोर्ट परिसर में बने मधुबनी पेटिंग का निरीक्षण कर कोर्ट में रिपोर्ट देने को कहा था। उन्होंने जो रिपोर्ट दिया उससे स्पष्ट है कि पटना एयरपोर्ट के परिसर में मधुबनी पेटिंग लगी है।

वहां न तो कलाकारों को क्रेडिट दिया गया ना ही जीआई टैग ही लगा है। इससे मधुबनी पेटिंग व उसके कलाकारों की उपेक्षा स्पष्ट होती है।कोर्ट ने सरकार को कहा था कि मधुबनी पेटिंग के विकास और विस्तार के लिए युद्ध स्तर पर कार्य किया जाना चाहिए।

याचिका कर्ता के वकील मोर्य विजय चंद्र ने कोर्ट को बताया कि मधुबनी पेटिंग सरकारी उपेक्षा का शिकार तो है ही साथ ही मधुबनी पेटिंग करने वाले कलाकार भी शोषण के शिकार हैं। कलाकार गरीबी में जीवन जी रहे हैं जबकि पेटिंग की ख्याति विदेशों में भी है। इसी का लाभ बिचौलिए उठा रहे हैं।

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उन्होंने बताया कि 2005 में ही जीआई टैग् केंद्र सरकार से लगाने की अनुमति मिली। लेकिन इसका आज तक रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ जबकि यह भौगोलिक क्षेत्र के तहत होता है।

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