

सरकार नए साल पर कुछ लोग आएं हैं बधाई लेकर…पूछ रहे मुर्गा में प्याज डालें या प्याज में मुर्गा मुख्य बातें
- महंगाई ने नए साल का जश्न किया फीका
- मुर्गा से मंहगा बिक रहा प्याज
- सरसों तेल के दाम भी अचानक 15 रुपया किलो बढ़ गया
मनोरंजन, दरभंगा, देशज न्यूज। 31 दिसंबर से ही लोग नए साल के जश्न में डूब गए हैं। बाजार में भीड़ लगी है। मगर, मंहगाई डायन ने बड़ा हमला कर रखा है। मांसाहारी पिकनिक मनाने वालों को खरीददारी से पहले सोचना पड़ रहा है। मुर्गा का भाव तो वहीं है परंतु प्याज मुर्गा से 20 रुपया तेज है, तो सरसों तेल के दाम भी अचानक 15 रुपया किलो बढ़ गया है। इसके कारण लोग समझ नहीं पा रहे हैं, मुर्गा में प्याज डालें या प्याज में मुर्गा डालें। काटते समय रुलाने वाला प्याज बगैर घर आए ही लोगों को खूब रुला रहा है।
दरअसल कुछ महीनों से प्याज के भाव कम होने के नाम नहीं ले रहे हैं। इसके कारण रसोई का स्वाद फीका हो गया है। दो प्याज के बढ़े भाव ने लोगों को बगैर प्याज के ही सब्जी खाने के लिए मजबूर कर दिया है। प्याज के भाव का हालत यह है कि मुर्गा 80 रुपये किलो और प्याज एक सौ रुपये प्रति किलो बिक रहा है। यहां के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में तो 120 रुपए किलो तक पहुंच गया है।
प्याज की मारामारी का आलम यह है, अन्य साल दस रुपये प्रति किलो बिकने वाला हरा पत्तीदार प्याज भी 40 से 60 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है और मजबूरी में रसोई का स्वाद बढ़ाने के लिए लोग खरीद रहे हैं। शहर मुख्यालय के थोक प्याज विक्रेता राधे साह ने देशज टाइम्स को बताया, उनकी गद्दी से औसतन प्रत्येक दिन करीब एक सौ बोरी प्याज की बिक्री होती थी। 28-30 दिसम्बर के दौरान तो रोज तीन-चार सौ बोरी प्याज बिकता था लेकिन इस बार तीन दिन में तीस बोरी प्याज भी नहीं बिक सका। उन्होंने बताया, जुलाई से बढ़ रहा भाव अब तक काबू नहीं हो रहा है। इधर सूखे प्याज के दाम में लगी आग के कारण हरा प्याज भी इठला रहा है और उत्पादक किसान राहत में हैं।
सब्जी व्यवसायी विनोद साह ने देशज टाइम्स को बताया, पिछले साल लोकल हरी पत्ती वाला प्याज आठ से दस रुपये प्रति किलो की दर से बिकता था लेकिन बाहरी प्याज के दामों में अप्रत्याशित वृद्धि तथा आवक कम होने से हरे प्याज का भाव काफी तेज है। किसान 30-35 रुपये किलो से कम भाव में थोक दर पर देने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने बताया, नए साल को लेकर हरे प्याज की बिक्री में अचानक तेजी आई है। महंगा भाव सुनकर लोग एक किलो से ज्यादा लेने को तैयार नहीं हैं।










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