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औकात हमारी बाजार लिख रहे हैं, रहने की कुछ बहतरीन जगहों में से एक जगह अपनी औकात भी है

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औकात हमारी बाजार लिख रहे हैं, रहने की कुछ बहतरीन जगहों में से एक जगह अपनी औकात भी हैदरभंगा, देशज टाइम्स। चीज़ों से हो रही है पहचान आदमी की,औकात अब हमारी बाजा़र लिख रहे हैं… रूबरू होने की तो छोड़िए, लोग गूफ्तगू से भी कतराने लगे हैं… गुरूर  ओढ़े हैं रिश्ते, अपनी हैसियत पर इतराने लगे हैं, रहने की कुछ बहतरीन जगहों में से, एक जगह अपनी औकात भी है। कहने को तो हम अक्सर बार-बार अपने आप से यह बात दोहराते हैं कि, अपनी औकात को कभी नहीं भूलना चाहिए।

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औकात हमारी बाजार लिख रहे हैं, रहने की कुछ बहतरीन जगहों में से एक जगह अपनी औकात भी हैऔरों से तो यह कहना मुनासिब नहीं है और न ही हमें ऐसी अपेक्षा रखनी चाहिए लेकिन, व्यवहार में हम अपनी सोच को बदलने में अक्सर नाकामयाब रहते हैं। हम ऐसा मानते हैं- “मेरी औकात से बढ़कर, मुझे कुछ मत देना मेरे मालिक, क्योंकि ज़रूरत से ज़्यादा रोशनी भी, इंसान को अंधा बना देती है.” ऐसा भी नहीं है कि, ऐसे लोगों का सर्वथा अकाल है।

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अनेक लोग ऐसे हुए हैं और अभी भी हैं जो, अपने व्यवहार से इस कसौटी पर ख़रे उतरे हैं और उतर रहे हैं. उनका मानना है कि- “अगर परछाई कद से और बातें औकात से बड़ी होने लगें, तो समझ लो, कि सूरज डूबने ही वाला है। औकात हमारी बाजार लिख रहे हैं, रहने की कुछ बहतरीन जगहों में से एक जगह अपनी औकात भी है

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