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ग़नीमत है नगर वालों लुटेरों से लुटे हो तुम, हमें तो गांव में अक्सर, दरोगा लूट जाता है
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जी हां बात शहर की हो या देहात की हर जगह हर वेश में लुटेरे गरीबों को लूटने के लिए तैयार बैठे हैं। हद तो यह सरकारी सवारियां यहां तक कि रेल का सफर सुरक्षित नहीं रहा। बस स्टैंड से लेकर रेलवे स्टेशन तक सुरक्षित नहीं रहे।
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सरकार चुप है। व्यवस्था खामोश है। पुलिस की शक्ल में भेड़िए घूम रहे हैं लाइसेंसी बंदूक के साथ और देश से लेकर छोटे शहरों का मिजाज यह है,.तमाशा देखने वालों, तमाशा खत्म ही समझो, डसेंगे नाग काले, शक्ल में आए सपेरों की…।
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