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फ़रवरी, 11, 2026
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घिनौने चेहरे पर पिता की असली बेटिया वाराणसी की प्रीति… सच मानो तो मनोरंजन ठाकुर के साथ

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च मानो तो मनोरंजन ठाकुर के साथ

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…जब अपनों ने मुंह मोड़ा…तो संबल बनीं बेटी…। इस बेटी ने समाज को दिखाया आईना। पिता की अर्थी को कांधा दिया। घाट पहुंचाया। फिर पिता को मुखाग्नि। यह मामला है, उस वाराणसी का जहां साक्षात् शिव विराजते हैं। अनवरत, असंख्य लकड़कियों के बीच काशी विश्वनाथ की गोद में अनंत कतारवद्ध मुखाग्नि देते लोग दिखते हैं। समय की घुमती सूईं के मानिंद चिताएं अनवरत जलती, कभी ना बुझने की कसम लिए वहां मिलती, दिखती रहती है। आखिर मोक्ष तो वहीं मिलता है। ऐसे में, समाज का एक क्रूर और घिनौना चेहरा सामने आता है। एक ऐसा चेहरा जिसकी झलक तक देखना मुनासिब नहीं…।

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…और फिर वहीं पिता को मुखाग्नि देती एक बेटी अवतरित होती है। उस अवतरण के साथ, जहां संपूर्ण समाज बेकसूर सा खड़ा है और एक बेटी पूरी कसूरवार है। पढ़िए, बिहार दिवस के साथ उस रंगपंचमी पर एक बेटी की कहानी… जहां…पांच दिवसीय होलिका पर्व का समापन मंगलवार को रंगपंचमी के साथ हो रहा है। रंगपंचमी यानी भगवान भोलेनाथ का दिन। जब भोलेनाथ ने भगवान श्रीराम, गिर्राज और भगवान चक्रधर के साथ गुलाल और फूलों की होली खेली थी।

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रंगपंचमी पर मंगलवार सुबह से रंग और गुलाल का दौर शुरू हो गया था। भगवान भोलेनाथ पर पुष्पों की वर्षा हो रही थी। चारों तरफ बैंड बज रहे थे। ठेलों में गुलाल और पुष्प रखे हुए थे। हर तरफ स्वागत और ठंडाई का दौर चल रहा था।
ठीक ऐन मौके पर, वाराणसी की यह बेटी बेटों वाली फर्ज अदा करती उस पंगत में खड़ी थी जहां मोक्ष का द्वार उसी शिव के आदेश पर खुलता और बंद हो रहा था। बेटों सी आगे बढ़कर रिश्तों को निभाती यह बेटी है गौर गांव मिर्जामुराद की।

 

खबरों में आज मंगलवार को सामने आया कि गौर गांव के 73 वर्षीय रिक्शा-ट्राली चालक बचाऊ गुप्ता की लंबी बीमारी के बाद सुबह निधन हो गया। इनकी एक ही इकलौती विवाहिता बेटी है 26 साल की प्रीति गुप्ता। बचाऊ को कोई पुत्र नहीं है। लिहाजा, प्रीति ने अपने पिता के निधन के बाद पिता के भाइयों और भतीजों से अंतिम संस्कार की रस्म थामने की गुहार लगाई। लेकिन, पुरुष समाज के इन परिजनों ने रिश्तों से मुंह मोड़ कर घर से बाहर भी निकलना मुनासिब ना समझा।

बड़ा अजीब सा माहौल था वहां। कौन देगा बचाऊ को मुखाग्नि। कौन करेगा पंचतत्व में समर्पित। एक तरफ समाज दूसरी तरफ एक बेटी। वह बेटी जो लाचार है। विवश है। कमजोर है। अपने पिता की मौत से मर्माहत। बेहद खामोश है। मगर समाज ने उसे खामोश रहने कहां दिया।

ग्रामीण आगे आए। प्रीति का हौसला बढ़ाया। शवयात्रा में शामिल हुए। फिर प्रीति ने भी उसी समाज के साथ प्रीत करने की जिद लिए निकल पड़ी, उसी समाज का बंधन तोड़ परिजनों, खून के रिश्तों को आईना दिखाने।

वह प्रीति थी, जिसने ना सिर्फ अपने पिता को कांधा दिया। अदलपुर घाट पर पिता के पार्थिव शरीर को चिता पर लिटाने के बाद पूरी रीति रिवाज से मुखाग्नि देकर उन्हें साक्षात् देवो के देव महादेव की शरण में उच्च स्थान दिलाया। साबित कर दिया, बेटी भी खून के रिश्तों को निभाने में कमजोर नहीं। आखिर, बेटी तो सेलिब्रेटी है…।
सच मानो तो मनोरंजन ठाकुर के साथ (To be honest, with Manoranjan Thakur)

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