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भूमिगत जल में कमी का विकल्प चापाकल, बोरिंग नहीं, जल को करें रिचार्ज

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भूमिगत जल में कमी का विकल्प चापाकल, बोरिंग नहीं, जल को करें रिचार्ज

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दरभंगा, देशज टाइम्स ब्यूरो। पोखरों-तालाबों से भरे शहर में भूमिगत जल का गिरता स्तर कई सवाल खड़े करता है। इससे साफ जाहिर होता है कि यहां जल-प्रबंधन नहीं किया गया। पानी का सवाल मानव जीवन से जुड़ा हुआ है। जल नहीं तो मानव के लिए कल नहीं। पर भविष्य की चिंता किए बगैर इसका अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है। इसके कारण दरभंगा शहर ही नहीं पूरे जिले में जल संकट की समस्या खड़ी हो गई। बड़ी-बड़ी इमारतें तो बन गई हैं पर कहीं वाटर ट्रीटमेंट प्लांट नहीं है। नगर निगम वाटर टैक्स तो लेता है पर किसी घर में वाटर मीटर नहीं है। इसके कारण लोग मनमाने ढ़ंग से पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह बात बतौर मुख्य वक्ता एमआरएम महाविद्यालय के प्रधानाचार्य डॉ. अरविंद कुमार झा ने भूमिगत जल का घटता स्तर चिंता का विषय पर आयोजित सेमिनार को संबोधित करते हुए कही।

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स्वयंसेवी संस्था डॉ. प्रभात दास फाउंडेशन व एमआरएम कॉलेज के आईक्यूएसी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सेमिनार को संबोधित करते हुए प्रधानाचार्य डॉ. झा ने कहा कि भूमिगत जल की अनुपलब्धता राष्ट्रीय समस्या है पर जल की प्रचुरता वाले क्षेत्र में यह समस्या मानवीय लापरवाही को दर्शाता है। प्रकृति से सिर्फ लेना ही नहीं देना भी हमें सीखना होगा। पर यहां तो लोग अपनी सुविधा के लिए जमीन में ड्रीलकर घर की सारी गंदगी भूमिगत जल में मिला रहे हैं।

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भूमिगत जल रिचार्ज होने करने का एकमात्र साधन वर्षा-जल है पर कंक्रीट के महलों में कैम्पस भी कंक्रीट युक्त है और पोखर-तालाब गाद से भरे हुए हैं। नतीजा, जमीन के भीतर वर्षा का पानी नहीं पहुंच रहा है और भूमिगत जल में कमी हो गई है। इसका विकल्प नए-नए चापाकल और बोरिंग गाड़ना नहीं बल्कि भूमिगत जल को रिचार्ज करने की व्यवस्था को पुख्ता करना है।

महाविद्यालय के आईक्यूएसी समन्वयक डॉ. विवेकानंद झा ने कहा कि सेमिनारों-संगोष्ठियों से लोगों में जागरूकता आती है। पर इसके परिणाम तभी सामने आएंगे जब लोग जगेंगे और कारगर पहल होगी। पर भूमिगत जल को लेकर हमारे यहां आमदनी अठ्ठन्नी और खर्चा रूपया वाली स्थिति है। धरती के कई अन्य सजीव तो पानी के बगैर रह सकते हैं पर मनुष्य कुछ घंटों की प्यास भी बर्दाश्त नहीं कर सकता। भूमिगत जल की समस्या मनुष्यों ने ही खड़ी की है। इसलिए इसका निदान भी हमें भी तलाशना होगा। मानव के लिए जल का एकमात्र स्रोत भूमिगत जल ही है। अगर हम नहीं चेतते है तो आने वाले दिनों में यह समस्या विकराल रूप लंे लेगी।

भूमिगत जल में कमी का विकल्प चापाकल, बोरिंग नहीं, जल को करें रिचार्ज

 

सेमिनार में उपस्थित प्रभात दास फाउंडेशन के सचिव मुकेश कुमार झा ने कहा कि जल संकट की गंभीरता को हमें समझना होगा और भूमिगत जल स्तर बढ़े इसके उपाय तलाशने होंगे। पर हमें जल की बूंद-बूंद बचाने पर भी ध्यान देना होगा। पानी की खफत कम करनी होगी। इसमें महिलाएं अहम रोल निभा सकती है क्योंकि घरेलू कार्यो में भी बहुत ज्यादा पानी खर्च होता है।

सेमिनार की अध्यक्षता करते हुए मैथिली विभागाध्यक्ष डॉ. प्रीति झा ने कहा कि शहर की आबादी दिन-ब-दिन बढ़ रही है और हर मनुष्य को लगभग दो सौ लीटर पानी प्रतिदिन चाहिए। इस स्थिति में जल-संकट की स्थिति को समझा जा सकता है। मिथिला जल की समृद्धता के लिए प्रसिद्ध है। पर अब यहां न तो बाढ़ आती है और ना ही वर्षा प्रचूर मात्रा में होती है। अगर होती भी है तो उसका पानी धरती के भीतर समाहित नहीं हो रहा है। और इसके जिम्मेवार हम शहरवासी ही है जिन्होंने मिट्टी के ऊपर कंक्रीट की चादर बिछा दी है।

सेमिनार का संचालन करते हुए डॉ. पुतुल झा ने कहा कि शहर में जल संकट की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस महाविद्यालय के चापाकलों के हलक भी सूख गए है और हमलोगों को भी पानी की किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। सेमिनार में स्वागत व धन्यवाद ज्ञापन अंग्रेजी विभागाध्यक्ष डॉ. चित्रा झा ने किया जबकि प्रतिभागी नीतू सिंह, श्वेता कुमारी, लाली कुमारी एवं प्रियंका कुमारी ने भी अपने विचार रखें। मौके पर प्रो. कन्हैया चौधरी, प्रो. सौम्या चौधरी, डॉ. निशा सक्सेना, डॉ. शीला यादव, डॉ. एसबी शशि, प्रो. एसके विश्वास, डॉ. रूपकला सिंहा, डॉ. शैली मिश्रा, फाउंडेशन के अनिल कुमार सिंह, राजकुमार गणेशन, मनीष आनंद, नवीन कुमार समेत अन्य उपस्थित थे।

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