
SMA बीमारी: बिहार के बेगूसराय में एक नन्ही जान जिंदगी और मौत के बीच झूल रही है। महज 16 महीने की रूही को एक ऐसी गंभीर और दुर्लभ बीमारी ने घेर लिया है, जिसका इलाज 18 करोड़ रुपये का एक इंजेक्शन है। उसकी मां, अंजली कुमारी, सरकार और समाज से बस एक ही गुहार लगा रही हैं – ‘मेरी बेटी को बचा लो!’
बेगूसराय जिले के पचंबा गांव में अंजलि कुमारी अपनी 16 महीने की बेटी रूही की जिंदगी बचाने की जद्दोजहद में हैं। रूही को स्पाइनल मस्कुलर अट्रॉफी (SMA) नामक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी है। यह एक ऐसी गंभीर न्यूरो-मस्कुलर डिसऑर्डर है जो धीरे-धीरे शरीर की मांसपेशियों को कमजोर कर देती है।
स्पाइनल मस्कुलर अट्रॉफी (SMA) क्या है?
चिकित्सकों के अनुसार, SMA बीमारी एक दुर्लभ आनुवंशिक समस्या है जो लगभग 10,000 बच्चों में से किसी एक को प्रभावित करती है। इस बीमारी के कारण बच्चे के लिए बैठना, खड़ा होना और चलना जैसी सामान्य शारीरिक गतिविधियां भी मुश्किल हो जाती हैं। सदर अस्पताल के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. कृष्ण कुमार बताते हैं कि यह बीमारी समय के साथ और भी गंभीर होती जाती है।
डॉक्टरों ने स्पष्ट किया है कि रूही की जान बचाने का एकमात्र रास्ता जीन थेरेपी इंजेक्शन Zolgensma है। यह एक बार दिया जाने वाला इंजेक्शन है, जिसके सफलता दर 92 से 95 प्रतिशत तक बताई गई है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1।
करोड़ों का इंजेक्शन ही एकमात्र उम्मीद
हालांकि, इस जीवन रक्षक इंजेक्शन की कीमत लगभग 17 से 18 करोड़ रुपये है। यह रकम किसी भी मध्यमवर्गीय परिवार के लिए जुटा पाना असंभव सा है। रूही की मां अंजलि कुमारी ने अपनी बेटी के इलाज के लिए बेगूसराय से लेकर पटना तक कई अस्पतालों के चक्कर लगाए, लेकिन हर जगह निराशा ही हाथ लगी।
अंजलि बताती हैं कि डॉक्टर्स ने उन्हें साफ बता दिया है कि इस इंजेक्शन के बिना रूही को बचाना लगभग नामुमकिन है। परिवार ने कर्ज लेने की भी कोशिश की, लेकिन अब कोई भी आगे आकर मदद करने को तैयार नहीं है। मासूम रूही के इलाज के लिए अब सिर्फ 6 महीने का महत्वपूर्ण समय बचा है, जो उसके जीवन और मृत्यु के बीच की सबसे निर्णायक अवधि है।
समय कम, उम्मीद बाकी: समाज से मदद की अपील
अंजलि कुमारी अब सरकार, जनप्रतिनिधियों और समाज के मददगार हाथों से मदद की उम्मीद लगाए बैठी हैं। अगर समय रहते आर्थिक सहायता मिल जाए, तो उनकी बेटी को एक नया जीवन मिल सकता है। अभी तक किसी बड़े एनजीओ या क्राउडफंडिंग अभियान की ठोस पहल सामने नहीं आई है। डॉक्टर और स्थानीय लोग अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं, लेकिन यह नाकाफी साबित हो रहा है। बेगूसराय समाचार बताता है कि यह परिवार इस समय सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1।
जिस उम्र में रूही को खेलना-कूदना चाहिए, वह अस्पताल के बिस्तर पर जिंदगी की जंग लड़ रही है। मासूम की मुस्कान धीरे-धीरे फीकी पड़ रही है। पूरा गांव और परिवार इस इंतजार में है कि कोई फरिश्ता आएगा और समय रहते मदद करेगा। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें







