
अंग्रेज ने पुल को इमारत माना और हमारा सिस्टम पुल को उद्घाटन का फोटो…! दुर्भाग्य देखिये— “अंग्रेज का लोहा आज भी तन कर खड़ा है। और हमारे अधिकारी पच्चीस साल के लायक भी नहीं।” भागलपुर में ये जुमला अब गाली नहीं, गिनती है। हर चाय की दुकान, हर ऑटो, हर घाट पर यही हिसाब खुलता है। बीच में खड़ी है गंगा। और गंगा के दोनों किनारों पर तीन किरदार—केवट, अंग्रेज और हमारा सिस्टम।
केवट: नदी का नक्शा हथेली पर
2001 से पहले भागलपुर का मतलब केवट था।
बरारी लांच घाट पर सुबह छह बजे सीटी बजती, केवट की आवाज उससे ऊंची जाती—
“नवगछिया जाना है? इधर आ जाओ, नाव तैयार है।”
पचास पैसे में वो नाव स्कूली लड़कों को पार उतार देती। दस मिनट देर हुई तो क्लास छूटती, पर केवट का हाथ नहीं छूटता।
उसे कम्पास नहीं चाहिए था। गंगा की “भंवर” और “कांट” उसकी हथेली पर बोला करती थी।
सावन में जब नदी रौद्र होती, केवट तीन दिन नाव बांधकर रखता। शहर कट जाता। लोग सौ किमी घूमकर मुंगेर या कहलगांव जाते। माँ कहती—“सूरज से पहले निकलो, केवट का भरोसा सूरज तक ही है।”
घाट मंडी था। मछली, सब्जी, दूध। बारात नाव पर, दुल्हन की विदाई स्टीमर पर। छठ में घाट पर तिल रखने की जगह नहीं बचती थी।
अंग्रेज का लोहा: सौ साल की सांस
मोकामा का राजेंद्र सेतु 1959 का है। छह दशक बाद भी मालगाड़ी की गड़गड़ाहट उसकी नसों में दौड़ती है।
पटना का पुराना गंगापुल 1870 का। डेढ़ सदी बीत गई, पर अंग्रेज का लोहा आज भी तन कर खड़ा है।
अंग्रेज ने पुल को सौ साल की उम्र देकर बनाया था। स्टील में जान थी, सीमेंट में निष्ठा। ट्रैफिक कम था, रखवाली पक्की थी।
उनके लिए पुल “स्थायी इरादा” था। बनाकर छोड़ नहीं देते थे। हर साल कलई होती, हर मौसम में जांच।
हमारा सिस्टम: पच्चीस साल में थक गया

2001 में विक्रमशिला सेतु खुला। लोहे का पुल, सीमांचल-कोसी के सोलह जिलों की लाइफलाइन।
केवट की नाव किनारे लग गई। लगा, अब नाव की जरूरत नहीं। बीस साल पीछे की जिंदगी आगे सरक आई।
पर 2026 की आधी रात, पिलर नंबर 133 का स्लैब गंगा में समा गया। पच्चीस साल भी नहीं टिके।
एक्सपर्ट कहते हैं—मेंटेनेंस में देरी, गंगा की तेज धारा, ओवरलोडिंग, कंस्ट्रक्शन क्वालिटी।
पर भागलपुर का आदमी सीधा कहता है—“हमारा सिस्टम पच्चीस साल के लायक भी नहीं निकला।”
सीधा फर्क:
अंग्रेज का पुल = कम ट्रैफिक, ज्यादा स्टील, कम करप्शन
आज का पुल = ज्यादा ट्रैफिक, टाइट बजट, मेंटेनेंस में लेटलतीफी
अंग्रेज ने पुल को इमारत माना। हमारा सिस्टम पुल को उद्घाटन का फोटो मानता है।
तीनों का हिसाब
गंगा पर 2026 तक साठ से ज्यादा पुल हैं। बिहार अकेले अठारह पुलों का बोझ ढोता है। राजेंद्र, महात्मा गांधी, जेपी, मुंगेर, औंटा-सिमरिया—सब चालू हैं। विक्रमशिला अब “सावधानी से” लिखा जाता है।
पर सच ये भी है कि कोई पुल अमर नहीं। राजेंद्र सेतु के साथ नया डबल ट्रैक रेल पुल बनाना पड़ा। लोहा थकता है। समय खा जाता है।
फर्क सिर्फ इतना है—अगर रखवाली हो, तो डेढ़ सदी भी कम पड़े। और अगर लापरवाही हो, तो पच्चीस साल भी ज्यादा हो जाएं।
केवट फिर राजा
2026 में जब स्लैब गिरा, केवट फिर बुलाया गया। बाबूपुर-महादेवपुर, बरारी-महादेवपुर घाट पर वही भीड़, वही डोंगी, वही डर।
दुल्हन नाव से ससुराल गई। बारात घाट पर फंसी।
गंगा ने फिर बता दिया—जिसे केवट ने जोड़ा था, वही नदी तोड़ भी सकती है।
अंग्रेज का लोहा आज भी खड़ा है। केवट का भरोसा आज भी चलता है।

बीच में हमारा सिस्टम है—जो पच्चीस साल में थक जाता है।
भागलपुर के बुजुर्ग कहते हैं—“गंगा ने हमें सब्र सिखाया है।”
सवाल ये नहीं कि पुल कब बनेगा।
सवाल ये है कि हम उसे कितना चला पाएंगे।
क्योंकि गंगा तो वही है—कभी काटती, कभी जोड़ती।
और केवट? वो अब भी घाट पर खड़ा है, हथेली पर नदी का नक्शा लिए।








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