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Bhagalpur Special Story : मंदार के बिना अधूरे हैं माधव

कहते हैं जब दुनिया को अमृत की तलाश थी, जब देवताओं और असुरों के बीच कशमकश जारी थी, तब इसी मंदार को 'मथानी' बनाया गया था। लेकिन गौर करने वाली बात ये नहीं कि अमृत किसे मिला। गौर करने वाली बात ये है कि इस पहाड़ ने उस 'मंथन' को सहा। इसने सिखाया कि जब तक भीतर हलचल नहीं होगी, तब तक न तो ज़हर बाहर आएगा और न ही अमृत का सवेरा होगा।

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भारतवर्ष की पावन धरा केवल मिट्टी का विस्तार नहीं, बल्कि समय के अनंत पट पर अंकित सभ्यताओं का वह महाकाव्य है, जिसके पृष्ठ कभी धरातल पर स्वर्ण अक्षरों में चमकते हैं, तो कभी भूगर्भ की गहराइयों में रहस्य बनकर समा जाते हैं। इसी गौरवशाली इतिहास की एक जीवंत कड़ी है—मंदराचल

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बिहार के बांका जिले के बौंसी में खड़ा यह पर्वत केवल पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि आर्य-अनार्य संस्कृति के समन्वय का वह ‘स्तंभ’ है, जिसने कभी समुद्र मंथन के समय कालकूट और अमृत के बीच का सेतु बनकर सृष्टि की रक्षा की थी।

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समन्वय का प्रतीक: मधु और मधुसूदन

पुराणों के पृष्ठों में मंदार की महिमा गंगा के समान पावन बताई गई है। यदि गंगा मानव के तन-मन को धोने वाली देवनदी है, तो मंदार आत्मिक उत्थान की ‘देवगिरि’ है। यहाँ का कण-कण एक अद्भुत सामंजस्य की कथा सुनाता है। एक ओर भगवान विष्णु ‘मधुसूदन’ के रूप में यहाँ प्रतिष्ठित हुए, तो दूसरी ओर उन्होंने अपने हाथों पराजित असुर वीर ‘मधु’ को भी इसी धरा पर अमरत्व प्रदान कर दिया।

“जहाँ विजेता और विजित दोनों को समान गौरव प्राप्त हो, वही स्थल तीर्थ कहलाता है।”

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आज भी मकर संक्रांति के अवसर पर जहाँ पर्वत के शिखर पर मधुसूदन की आरती गूँजती है, वहीं तलहटी में संथाल आदिवासियों की श्रद्धा असुर वीर मधु की स्मृति को जीवंत रखती है। यह मिलन है—आर्यों की दिव्यता और अनार्यों की शक्ति का; यह संगम है—भक्ति और पराक्रम का।

इतिहास के झरोखे और आस्था के दीप

Bhagalpur Special Story: Madhav is incomplete without Mandar
Bhagalpur Special Story: Madhav is incomplete without Mandar

समय की धूल ने इस क्षेत्र पर कई परतें चढ़ाईं। 1573 ई. में कालापहाड़ के आक्रमण ने यहाँ के वैभव को खंडित करने का प्रयास किया, किंतु आस्था के अंकुर कभी नष्ट नहीं होते। मुग़ल सम्राट जहाँगीर के काल में बौंसी में मधुसूदन भगवान का भव्य मंदिर निर्मित हुआ, जो आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।

केवल सनातनी ही नहीं, जैन धर्म के अनुयायियों के लिए भी यह पर्वत निर्वाण की भूमि है। बारहवें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य की तपस्थली और मोक्षस्थली के रूप में यह पर्वत अहिंसा और वैराग्य का संदेश देता है।

प्रकृति का वरदान: पापहरणी और आरोग्य

मंदार की गोद में केवल पत्थर नहीं, बल्कि जीवनदायिनी औषधियाँ और पवित्र जलधाराएँ बहती हैं। गुप्त वंश के राजा आदित्य सेन की महारानी कोण देवी द्वारा निर्मित ‘पुष्करणी’ (पापहरणी सरोवर) के विषय में मान्यता है कि इसके जल में केवल शरीर के रोग ही नहीं, बल्कि आत्मा के विकार भी धुल जाते हैं।

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Bhagalpur Special Story : मंदार के बिना अधूरे हैं माधव

आधुनिक चिकित्सा के पुरोधा डॉ. विधानचंद्र राय ने भी इस जल की रोग-निवारक शक्ति को स्वीकार किया है। यहाँ की स्वच्छ जलवायु और प्राकृतिक सुषमा थके हुए मन को नवजीवन प्रदान करती है।

माधवन का संकल्प: उत्तर और दक्षिण का सेतु

साहित्य और शिक्षा की धारा ने मंदार के इस महात्म्य को पूर्णता प्रदान की। जहाँ 1505 ई. में चैतन्य महाप्रभु के चरणों ने इसे धन्य किया, वहीं आधुनिक काल में दक्षिण भारत के यशस्वी युवा श्री आनंद शंकर माधवन ने इसे अपनी कर्मभूमि बनाया। 1945 ई. में स्थापित ‘मंदार विद्यापीठ’ के माध्यम से उन्होंने शिक्षा की वह ज्योति जलाई, जिसने उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सांस्कृतिक सेतु का निर्माण किया।

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महर्षि श्यामाचरण लाहिरी की स्मृति में बना ‘गुरुधाम आश्रम’ और ‘श्यामाचरण विद्यापीठ’ आज भी यहाँ ज्ञान की रश्मियाँ बिखेर रहे हैं।

Bhagalpur Special Story: Madhav is incomplete without Mandar
Bhagalpur Special Story: Madhav is incomplete without Mandar

आज जब हम मंदार की ओर देखते हैं, तो हमें दिखाई देता है—एक अद्भुत चतुष्कोण। मधुसूदन धार्मिक सहिष्णुता के प्रतीक हैं, मधु लोक-शक्ति के परिचायक हैं, मंदार आर्य-अनार्य एकता की कड़ी है, और माधवन ज्ञान एवं सांस्कृतिक समन्वय के संवाहक हैं।

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मंदार केवल एक पर्वत नहीं, बल्कि भारत की उस ‘नमोन्मेषता’ (नित-नूतन उदय) का प्रतीक है, जो हमें सिखाता है कि मंथन चाहे समुद्र का हो या जीवन का, यदि धैर्य और सामंजस्य हो, तो अंततः ‘अमृत’ की प्राप्ति निश्चित है।

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