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मार्च, 5, 2026
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Bhagalpur News: Mid-day Meal Scheme में खुद की थाली खाली, भागलपुर की रसोइयों का हुंकार, 10 हजार मानदेय और सरकारी कर्मचारी का दर्जा दो

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भागलपुर देशज टाइम्स। पेट की आग बुझाने वाले जब खुद की थाली खाली पाएं, तो सड़कों पर उतरना लाजिमी है। बिहार में स्कूल रसोइयों का आक्रोश अब आंदोलन का रूप ले चुका है, जहां वे अपनी दयनीय स्थिति पर सरकार से सवाल पूछ रहे हैं। Mid-day Meal Scheme: बिहार के स्कूलों में बच्चों को पोषण देने वाली रसोइया अब अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं, एक ऐसे मानदेय के लिए जो न्यूनतम मजदूरी से भी कम है, और एक ऐसी पहचान के लिए जो उन्हें सरकारी कर्मचारी का दर्जा दिलाए।

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Mid-day Meal Scheme: रसोइयों ने खोला सरकार के खिलाफ मोर्चा, रखी ये बड़ी मांगें

भागलपुर, 20 जनवरी 2026: बिहार के हजारों स्कूलों में मिड-डे मील बनाने वाली रसोइयों ने राज्यव्यापी प्रतिवाद दिवस मनाकर सरकार के सामने अपनी मांगों का पुलिंदा रख दिया है। बिहार राज्य विद्यालय रसोइया संघ (ऐक्टू) के बैनर तले आयोजित इस प्रदर्शन में रसोइयों ने न्यूनतम 10,000 रुपये मानदेय, एनजीओ को मध्याह्न भोजन योजना से बाहर करने और उन्हें सरकारी कर्मचारी का दर्जा देने जैसी अहम मांगें उठाईं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। भागलपुर में ऐक्टू के राज्य सह जिला सचिव मुकेश मुक्त और जिला उपाध्यक्ष विष्णु कुमार मंडल के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने जिला पदाधिकारी के माध्यम से मध्याह्न भोजन योजना समिति के निदेशक को ज्ञापन सौंपा। इस प्रतिनिधिमंडल में राजेश कुमार, पूनम देवी, कारी देवी, बिंदु भारती, बंदना कुमारी, चांदनी देवी और दिनेश कापरी जैसे कार्यकर्ता शामिल थे। इससे पहले विभिन्न विद्यालयों में रसोइयों ने एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों का जमकर विरोध किया और 12 फरवरी की देशव्यापी आम हड़ताल को सफल बनाने का संकल्प लिया।

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ऐक्टू के राज्य सह जिला सचिव मुकेश मुक्त ने इस अवसर पर रसोइयों की दयनीय स्थिति पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि विद्यालय रसोइयों को न्यूनतम मजदूरी के बराबर भी वेतन नहीं मिलता, जबकि वे पूरे दिन स्कूलों में कड़ी मेहनत करती हैं। लंबे संघर्ष के बाद सरकार ने मानदेय बढ़ाकर महज 3300 रुपये किया, लेकिन अन्य महत्वपूर्ण मांगों पर चुप्पी साध रखी है। मुक्त ने बताया कि रसोइयों को साल में केवल 10 महीने का मानदेय मिलता है, और उसका भी नियमित भुगतान नहीं होता। कई बार तो त्योहारों के समय भी रसोइयों को उनके हक का पैसा नहीं मिलता, जिससे उनके सामने आर्थिक संकट गहरा जाता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। इस बीच योजना में लाखों रुपये के गबन की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनी रहती हैं, लेकिन रसोइयों का रसोइया मानदेय समय पर नहीं मिलता। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से इस मानदेय में एक रुपये की भी वृद्धि नहीं हुई है। यही नहीं, कोरोना काल का लाभ उठाते हुए मध्याह्न भोजन योजना का नाम बदलकर प्रधानमंत्री पोषण योजना कर दिया गया, जिसकी समयावधि भी पांच साल तक सीमित कर दी गई। जबकि यह सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर बच्चों के कुपोषण को दूर करने और उनके स्कूल छोड़ने की दर को कम करने के लिए एक नियमित चलने वाली योजना थी। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

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ऐक्टू के जिला उपाध्यक्ष विष्णु कुमार मंडल ने कहा कि अब इस योजना का तेजी से निजीकरण किया जा रहा है। बिहार के 29 जिलों के लगभग ग्यारह हजार विद्यालयों में एनजीओ के माध्यम से भोजन की आपूर्ति की जा रही है। 2016 में 9 जिलों के शहरी इलाकों में शुरू हुई यह योजना अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी अपने पैर पसार रही है, जिससे रसोइयों का भविष्य और असुरक्षित होता जा रहा है।

रसोइयों की प्रमुख मांगें और भविष्य की रणनीति

रसोइयों द्वारा सौंपे गए मांग पत्र में निम्नलिखित प्रमुख मांगें शामिल हैं:

  • रसोइयों को सरकारी कर्मचारी घोषित किया जाए। न्यूनतम मजदूरी की गारंटी की जाए और हर साल इसमें महंगाई भत्ते की प्रतिशत में वृद्धि की जाए। जब तक यह संभव न हो, वर्तमान 3300 रुपये के मानदेय को तत्काल बढ़ाकर 10,000 रुपये किया जाए।
  • केंद्रीकृत किचन की व्यवस्था को खारिज किया जाए और एनजीओ को मध्याह्न भोजन योजना से बाहर किया जाए।
  • साल में 10 महीने की बजाय सभी 12 महीने मानदेय का भुगतान किया जाए।
  • शिक्षा विभाग की अनिवार्य अंग बन चुकी विद्यालय रसोइयों को शिक्षा विभाग में चतुर्थ वर्ग के कर्मचारी का दर्जा दिया जाए।
  • रसोइयों को साल में दो जोड़ी सूती साड़ी, ब्लाउज और पेटीकोट के साथ ड्रेस दिया जाए।
  • रसोइयों को सामाजिक सुरक्षा स्कीम के तहत 3000 रुपये पेंशन दिया जाए। जब तक पेंशन नहीं मिलती है, रिटायरमेंट बेनिफिट दिया जाए।
  • रसोइयों को दुर्घटना बीमा और स्वास्थ्य बीमा का लाभ दिया जाए।
  • रसोइयों के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाए। बार-बार नौकरी से निकाल देने की धमकी न दी जाए।
  • रसोइयों को मातृत्व अवकाश व अन्य विशेष अवकाश का लाभ दिया जाए।
  • रसोइयों से अतिरिक्त काम नहीं करवाया जाए, जैसे: झाड़ू लगवाना, शौचालय में पानी डलवाना आदि। इन कामों पर तत्काल रोक लगाई जाए।
  • विद्यार्थियों के अनुपात में रिक्त पदों पर रसोइयों की शीघ्र बहाली की जाए। इसमें रिटायर हो चुके और मृत रसोइयों के परिवार को प्राथमिकता दी जाए।

ये मांगें रसोइयों के लंबे समय से लंबित अधिकारों की लड़ाई का हिस्सा हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। इस आंदोलन का लक्ष्य सिर्फ बेहतर रसोइया मानदेय नहीं, बल्कि रसोइयों को एक सुरक्षित और सम्मानजनक कार्यस्थल प्रदान करना है, जहां उनके श्रम का उचित मूल्यांकन हो।

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