Digital Education: जैसे-जैसे स्क्रीन की रोशनी तेज हो रही है, किताबों के पन्नों की स्याही फीकी पड़ती जा रही है। मोबाइल की लत और किताबों से दूरी के बीच छिड़ी बहस अब सड़क से सेमिनार तक पहुंच गई है, जहां विशेषज्ञ इस गंभीर विषय पर मंथन कर रहे हैं। बोकारो के शिबू सोरेन स्मृति भवन में आयोजित ‘शब्द सरिता महोत्सव’ के दौरान इसी ज्वलंत मुद्दे पर एक पैनल डिस्कशन का आयोजन हुआ। इस चर्चा में शिक्षकों, छात्रों और विद्वानों ने व्यावहारिक ज्ञान, पुस्तकों की उपयोगिता और ऑनलाइन शिक्षा की सीमाओं पर खुलकर अपने विचार रखे।
कार्यक्रम में प्रसिद्ध विद्वान एवं लेखक प्रोफेसर विनय भारत तथा लेखक और साहित्य पुरस्कार प्राप्तकर्ता डॉ. अभय मिंज (सहायक प्रोफेसर) मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए। वक्ताओं ने एक स्वर में माना कि किताबें ज्ञान को गहराई देती हैं और व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं।




Digital Education की सीमाएं और पुस्तकों का महत्व
चर्चा के दौरान वक्ताओं ने श्रीमद् भगवद् गीता के बाल संस्करण और महान व्यक्तित्वों की जीवनियों जैसी पुस्तकों को बच्चों और युवाओं के लिए अत्यंत उपयोगी बताया। उन्होंने कहा कि ऐसी पुस्तकें न केवल जीवन दर्शन को समझने में सहायक होती हैं, बल्कि मनोविज्ञान, आत्मबल और मानसिक पीड़ा से उबरने में भी मदद करती हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। कार्यक्रम में डिजिटल युग में घटती पठन संस्कृति पर गहरी चिंता व्यक्त की गई और इसे समाज के लिए एक चेतावनी माना गया।
‘किताब हाथ में होती है, मोबाइल हमें नियंत्रित करता है’
वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से बच्चों में एकाग्रता की समस्या गंभीर रूप ले रही है। उन्होंने एक महत्वपूर्ण अंतर बताते हुए कहा, ‘जब हम किताब पढ़ते हैं तो किताब हमारे हाथ में होती है, लेकिन मोबाइल का अधिक उपयोग हमें नियंत्रित करने लगता है’। ऑनलाइन शिक्षा को लेकर भी सार्थक चर्चा हुई। यह माना गया कि ऑनलाइन शिक्षा कई मामलों में सटीक और उपयोगी है, लेकिन यह विद्यार्थियों को मानवीय स्पर्श और शिक्षक-छात्र के बीच के भावनात्मक जुड़ाव से दूर रखती है। कई छोटी-छोटी समस्याओं का समाधान आमने-सामने बैठकर ही बेहतर ढंग से हो पाता है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: https://deshajtimes.com/news/national/
अनुशासन और सम्मान ही सफलता की कुंजी
डॉ. अभय मिंज ने अपने स्कूली दिनों को याद करते हुए बोकारो के अनुभव साझा किए। उन्होंने 1997 बैच के एक विद्यार्थी के रूप में अपने समय को याद करते हुए अनुशासन, नियमित अध्ययन, लिखित सारांश तैयार करने और शिक्षकों एवं माता-पिता के प्रति सम्मान को सफलता का मूलमंत्र बताया। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। उन्होंने बोकारो को देश के सबसे समृद्ध शिक्षा केंद्रों में से एक बताते हुए कहा कि किताबें पढ़ने और स्वतंत्र चिंतन से ही एकाग्रता विकसित होती है, क्योंकि हर किताब एक नया रास्ता दिखाती है। उन्होंने बच्चों को नई नोटबुक लेकर कड़ी मेहनत करने की सलाह देते हुए एक यादगार बात कही- ‘किताबें हमें स्वास्थ्य के लिए नींद देती हैं, जबकि मोबाइल हमें जगाए रखता है’। अंत में, वक्ताओं ने विद्यार्थियों से पुस्तकों को जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाने और डिजिटल उपकरणों का संतुलित उपयोग करने का आह्वान किया।







