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फ़रवरी, 14, 2026
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ना कोई धर्म,ना कोई जाती, ना ही रहने का कोई स्थायी ठौर-ठिकाना, बिहार के किन्नरों के जीवन की दास्ता भी अजीब है

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ना कोई धर्म,ना कोई जाती, ना ही रहने का कोई स्थायी ठौर -ठिकाना किन्नरों के जीवन की दास्ता भी अजीब है।
क्सर। सामाजिक तिरस्कार के वसीभूत किन्नर समुदाय इन दिनों परोक्ष रूप में कोरोना लॉकडाउन को लेकर दाने दाने को मुहताज है।भूख व अपनी समस्याओं से जूझते किन्नर समुदाय जहां रोजी-रोटी मिली वहीं अपना आशियाना बना लिया।
कोरोना लॉकडाउन  का सीधा असर अब  इनके ऊपर परोक्ष रूप से देखा जा सकता है।कारण है कि कोरोना काल में दर्द का टीस समेटे आज किन्नर समुदाय के लोगो ने डुमरांव थाने पर धरना  दिया।इन किन्नरों का नेतृत्व लाली और मेघा द्वारा किया जा रहा था‌।
अपनी पीड़ा व समस्याओं को लेकर जब सुमुदाय के लोग थाना परिसर पहुंचे तो एक बारगी थाने पर तैनात पुलिसकर्मी भी हतप्रभ रह गये।ना कोई प्राथमिकी ,ना ही पुलिस का बुलावा फिर दर्जनों कि संख्या में किन्नर समुदाय यहा किस लिए।
ड्यूटी पर तैनात अधिकारी अभी सोच ही रहे थे कि किन्नरों कि लीडर लाली और म्रेघा ने बताया कि मूल रूप से कोलकाता निवासी हम समुदाय के लोग वर्षो से शादी विवाह के मौसम में नाच गाना और लोगो का मनोरंजन कर कमाने कि नियत से बक्सर आते ही रहते है।
हमारी आजीविका का मुख्य श्रोत शादी विवाह के मौके पर बैंडपार्टियों से जुड़ कर आजीविका पालन है।हां ट्रेनों में भी लोगों का मनोरंजन कर कुछ रुपये हम कमा लेते  है। पर इन दिनों कोरोना को लेकर बंद पड़ी ट्रेने,शादी विवाह को लेकर सरकार के  कठोर पाबंदिया और स्थानीय ना होने से किसी भी सरकारी योजना का हम लाभ नहीं ले सकते।
राशन कार्ड ना होने से हमे अनाज भी नही मिलता ।गत वर्ष भी लगन मुहूर्त के समय भी लॉकडाउन का हम दंश झेल चुके है।यह दीगर बात है कि तब कुछ पैसे थे जिसके बूते जिन्दगी कट  रही थी।पर इस बार के लाकडाउन में हम पाई-पाई के मुहताज है।
संसाधनों के अभाव में परदेस में जीवन यापन कठिन है।हां कुछ सामाजिक संगठन है जिनके बूते सांसें चल रही है।धरने का मकसद बस ये है कि प्रशासनिक पहल  से पुनः हम अपने घर जा सके।
 जिले में स्थायी किन्नरों कि कुल संख्या लगभग 52 है।शेष किन्नर कोलकाता ,वाराणसी और अन्य प्रान्तों से है।सामाजिक चेतना के अभाव में आज भी ये मूल रूप से तिरस्कृत है।स्थानीय कोई भी एनजीओं और सामाजिक संगठन इनके हितों पर काम नही करता।
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