
Mustard Cultivation: जैसे सोना आग में तपकर कुंदन बनता है, वैसे ही बिहार की मिट्टी अब सरसों से सोना उगलने को तैयार है। जाले कृषि विज्ञान केंद्र में आयोजित एक कार्यक्रम ने किसानों की आंखों में उम्मीद की नई चमक भर दी है, जहां एक ऐसी किस्म पर चर्चा हुई जो कम लागत में बंपर पैदावार देने का दम रखती है।
Mustard Cultivation की नई तकनीक सीखकर गदगद हुए किसान
जाले. कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) में शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण प्रक्षेत्र दिवस का आयोजन किया गया, जिसका नेतृत्व वरीय वैज्ञानिक और अध्यक्ष डॉ. दिव्यांशु शेखर ने किया। इस कार्यक्रम का मुख्य केंद्र बिंदु तिलहन फसल सरसों की उन्नत किस्म ‘राजेंद्र सफलाम-1’ रही। इसका उद्देश्य किसानों को सरसों की वैज्ञानिक खेती और नवीनतम तकनीकों से रूबरू कराना था, ताकि वे परंपरागत खेती से आगे बढ़कर अपनी आय को दोगुना कर सकें।

कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों की देखरेख में फसल की कटाई भी कराई गई, जिससे वहां मौजूद किसानों ने अपनी आंखों से इस किस्म की शानदार उपज का मूल्यांकन किया। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। विशेषज्ञों ने विस्तार से बताया कि राजेंद्र सफलाम-1 न केवल उच्च उत्पादन क्षमता वाली किस्म है, बल्कि यह कम अवधि में पककर तैयार भी हो जाती है। साथ ही, यह कीट-रोगों के प्रति काफी सहनशील है, जिससे किसानों का बड़ा खर्च बचता है।
किसानों ने साझा किए अपने अनुभव
इस मौके पर बेलवारा गांव के प्रगतिशील किसान आयुष कुमार और धीरेंद्र कुमार ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि केवीके के मार्गदर्शन में बीज उपचार, सल्फर और बोरोन का सही इस्तेमाल तथा पंक्तिबद्ध बुआई जैसी वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाने से उनके उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि पहले जहां उत्पादन अनिश्चित रहता था, वहीं अब वे बेहतर मुनाफे को लेकर आश्वस्त हैं। कार्यक्रम की नोडल पदाधिकारी ई. निधि कुमारी ने किसानों को संबोधित करते हुए संतुलित उर्वरक प्रबंधन, समय पर बुआई और खरपतवार नियंत्रण के महत्व पर जोर दिया। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। उन्होंने कहा कि सही समय पर सही कदम उठाने से ही खेती को लाभकारी बनाया जा सकता है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
विशेषज्ञों ने दिए महत्वपूर्ण सुझाव
कार्यक्रम में मौजूद गृह वैज्ञानिक डॉ. पूजा कुमारी ने सरसों की फसल के सबसे बड़े दुश्मन ‘लाही’ (एफिड) के नियंत्रण पर महत्वपूर्ण जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इमोडाक्लोरपिड का छिड़काव लाही को नियंत्रित करने का सबसे प्रभावी तरीका है। वहीं, लैब तकनीशियन शशिमाला कुमारी ने मिट्टी परीक्षण (मृदा परीक्षण) के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अपनी खेत की मिट्टी को समझे बिना खेती करना अंधेरे में तीर चलाने जैसा है। मिट्टी की जांच से ही पता चलता है कि उसे किस पोषक तत्व की जरूरत है, जिससे उर्वरकों का अनावश्यक खर्च बचता है। इस कार्यक्रम में सौ से अधिक किसानों ने भाग लिया, जिन्होंने फसल का बारीकी से अवलोकन किया और इसकी गुणवत्ता की जमकर सराहना की। कई किसानों ने आगामी सीजन में इसी तिलहन फसल की किस्म को अपनाने की इच्छा जताई। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह कार्यक्रम किसानों के लिए ज्ञान और प्रेरणा का एक सफल संगम साबित हुआ।







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