
दलित स्त्रीवाद: विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग में आयोजित एक विशेष व्याख्यान में प्रख्यात दलित लेखिका अनीता भारती ने ‘दोहरी चुनौती और दोहरा संघर्ष: दलित स्त्रीवादी साहित्य के विविध आयाम’ विषय पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि कैसे दलित स्त्रियाँ पितृसत्ता के साथ-साथ जाति और धर्म सत्ता से भी जूझती हैं, और इस संघर्ष की जड़ें आधुनिक काल से कहीं पहले, बौद्ध काल तक जाती हैं। यह कार्यक्रम विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग के तत्वावधान में 04.05.2026 को आयोजित किया गया था।
दलित स्त्रीवाद: बौद्ध काल से आधुनिकता तक
अपने व्याख्यान में अनीता भारती ने स्पष्ट किया कि सभी स्त्रियाँ एकसमान नहीं होतीं, बल्कि उनके बीच जातीय स्तरीकरण मौजूद है। उन्होंने रेखांकित किया कि दलित स्त्रीवाद केवल दलित स्त्री लेखन या दलित लेखन भर नहीं है, बल्कि यह अपने केंद्र में दलित स्त्री को रखता है। इसकी ऐतिहासिक जड़ें बौद्ध काल तक जाती हैं, जब गौतम बुद्ध ने जातीय निर्योग्यताओं को ठुकराते हुए संघ में सभी वर्गों की स्त्रियों को प्रवेश दिया था, जिनमें दास वर्ग (दलित) की स्त्रियाँ भी शामिल थीं। इन स्त्रियों के रचनाकर्म को थेरी गाथा कहा गया है, जो दलित स्त्री मन की अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण स्रोत है। थेरियों में पूर्णिमा का नाम विशेष रूप से चर्चित है।
मध्यकाल में भी ललदेह जैसी संत कवयित्रियों ने, जिन्हें कश्मीरी कविता का जनक माना जाता है और जो दलित जाति से थीं, वंचित वर्ग की स्त्रियों की पीड़ा और मुक्ति को आवाज़ दी। आधुनिक भारत में फुले दंपति, डॉ. अंबेडकर–रमाबाई और पेरियार जैसे नायकों की वैचारिकी और आंदोलनों ने दलित स्त्रीवाद की नींव रखी। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1।
मुख्यधारा के स्त्रीवाद से कैसे भिन्न है दलित स्त्रीवाद?
अनीता भारती ने मुख्यधारा के स्त्रीवाद और दलित स्त्रीवाद के बीच के अंतर को स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि जहाँ मुख्यधारा का स्त्रीवाद केवल पितृसत्ता से लड़ता है, वहीं दलित स्त्रीवाद पितृसत्ता के साथ-साथ जाति सत्ता और धर्म सत्ता से भी संघर्ष करता है। नामकरण भले ही अस्सी-नब्बे के दशक में हुआ हो, लेकिन दलित स्त्रीवादी चेतना फुले और डॉ. अंबेडकर के आंदोलनों से ही आकार लेने लगी थी। डॉ. अंबेडकर स्वयं स्त्री अधिकारों के प्रबल पक्षधर थे, जिन्होंने हिंदू कोड बिल जैसे प्रावधानों के जरिए स्त्री अधिकारों की नींव रखी।
उन्होंने आगे कहा कि मुख्यधारा का स्त्रीवाद परिवार संस्था को नहीं मानता, जबकि दलित स्त्रीवाद परिवार संस्था के लोकतंत्रीकरण में विश्वास रखते हुए उसे स्वीकार करता है। इसके आदर्श फुले दंपति और अंबेडकर दंपति हैं। दूसरा प्रमुख अंतर यह है कि दलित स्त्रीवाद दलित स्त्रियों को अमानवीय जीवन स्थितियों से निकालने को अपना प्राथमिक कार्यभार मानता है, जबकि मुख्यधारा का स्त्रीवाद ऐसे प्रश्नों की उपेक्षा करता रहा है।
दलित स्त्रियों के समक्ष चुनौतियां और समाधान
अनीता भारती ने दलित स्त्रीवाद के समक्ष कई चुनौतियों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि दलित स्त्रीवाद का संघर्ष घर के बाहर भी है और घर के अंदर भी। घर के अंदर की समस्याओं पर सवाल उठाने पर भी विरोध का सामना करना पड़ता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1। दलित स्त्रियों की औसत आयु सवर्ण स्त्रियों की तुलना में 14 वर्ष कम होती है, जो उनके संकटग्रस्त जीवन को दर्शाता है। उनके साथ बलात्कार, हिंसा जैसी घटनाएँ सर्वाधिक होती हैं, और पूरा तंत्र इन प्रश्नों पर निष्क्रिय रहता है। ऐसे में दलित स्त्रियों का मुखर होकर बोलना और लिखना अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। दलित साहित्य के भीतर दलित स्त्रीवादी लेखन एक सशक्त आवाज़ बनकर उभरा है। अनीता भारती ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों को भी साझा किया, जिससे व्याख्यान और भी प्रासंगिक हो गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. उमेश कुमार ने की, जिन्होंने स्वागत वक्तव्य में कहा कि दलित साहित्य समतापूर्ण समाज की सुदृढ़ वैचारिक जमीन तैयार करता है और अनीता भारती दलित स्त्रीवादी साहित्य की प्रमुख हस्ताक्षर हैं। संचालन विभागीय शिक्षिका डॉ. मंजरी खरे ने किया, जिन्होंने कार्यक्रम के प्रारंभ में अनीता जी को पाग-चादर से सम्मानित किया।
व्याख्यान के उपरांत शोधार्थियों और स्नातकोत्तर छात्र-छात्राओं के साथ प्रश्नोत्तर सत्र हुआ, जिसमें अनीता भारती ने जाति और मानसिक स्वास्थ्य, पितृसत्ता और दलित स्त्री लेखन आदि से संबंधित कई प्रश्नों का विस्तारपूर्वक उत्तर दिया। इस अवसर पर प्रो. विजय कुमार, डॉ. सुरेंद्र प्रसाद सुमन, डॉ. महेश प्रसाद सिन्हा, डॉ. ज्वालचंद्र चौधरी सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित थे। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें







