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मार्च, 3, 2026
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EXCLUSIVE: Darbhanga Traffic Safety कौन देखेगा? दिव्यांग चालकों के हाथ में ‘ जिंदगी ‘ की ‘स्टीयरिंग’, यात्रियों की जान दांव पर!

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Darbhanga Traffic Safety: दरभंगा की सड़कों पर इन दिनों अराजकता का ऐसा तांडव मचा है, मानो सिस्टम की आंखों पर पट्टी बंधी हो और मजबूरी की गाड़ी मौत की सड़क पर फर्राटे भर रही हो। ई-रिक्शा और ऑटो का बेलगाम संचालन अब सिर्फ़ ट्रैफिक जाम का सबब नहीं, बल्कि गंभीर सुरक्षा चुनौती बन चुका है।

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Darbhanga Traffic Safety: दरभंगा में दिव्यांग चालकों के हाथ में ज़िंदगी की ‘स्टीयरिंग’, यात्रियों की जान दांव पर!

Darbhanga Traffic Safety: क्या है दरभंगा में यातायात सुरक्षा का हाल?

दरभंगा शहर की सड़कों पर जो दृश्य आजकल आम हो गया है, वह सिर्फ़ यातायात की अव्यवस्था नहीं है। यह प्रशासनिक संवेदनहीनता और सामाजिक विवशता का ऐसा टकराव है, जिसने आमजन की जान को जोखिम में डाल दिया है। ई-रिक्शा और ऑटो बिना किसी प्रभावी निगरानी के दौड़ रहे हैं। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कई वाहन ऐसे दिव्यांग चालकों द्वारा चलाए जा रहे हैं, जिनके लिए यह काम खुद की और सवारियों—दोनों की जान जोखिम में डालने जैसा है। यह सिर्फ़ भावनात्मक मुद्दा नहीं, बल्कि सुरक्षा और जिम्मेदारी का गंभीर प्रश्न है। यह सिर्फ़ ट्रैफिक अराजकता नहीं, आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह प्रशासनिक संवेदनहीनता और सामाजिक मजबूरी का त्रासद संगम है।

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ऑटो या ई-रिक्शा का संचालन केवल स्टीयरिंग थामने तक सीमित नहीं होता। अचानक ब्रेक लगाने की ज़रूरत, तेज़ मोड़ पर नियंत्रण, या घनी ट्रैफिक में फुर्ती से निकलने जैसे कार्यों के लिए शारीरिक रूप से पूरी तरह सक्षम चालक की आवश्यकता होती है। लेकिन दरभंगा की सड़कों पर यात्री अक्सर अनजाने में ऐसे ऑटो या ई-रिक्शा में बैठ जाते हैं और जब तक उन्हें स्थिति की गंभीरता का एहसास होता है, तब तक वाहन से उतरना संभव नहीं होता। ऐसे में उन्हें मजबूरीवश एक जोखिम भरी यात्रा पूरी करनी पड़ती है।

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इस पूरे प्रकरण में परिवहन विभाग और ट्रैफिक पुलिस की भूमिका लगभग नगण्य दिखती है। विभाग के कर्मचारी से लेकर उच्च पदाधिकारी तक इस समस्या से भली-भांति परिचित हैं, लेकिन किसी भी प्रकार की ठोस कार्रवाई से बचते दिखाई देते हैं। परिवहन विभाग और ट्रैफिक पुलिस की उदासीनता सीधे-सीधे यात्री सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है। जब एक दिव्यांग ऑटो चालक को ट्रैफिक पुलिस द्वारा रोका गया, तो उसने अपनी पीड़ा कुछ इस तरह बयां की—

“घर में कमाने वाला अकेला हूं, दो बेटियों की शादी करनी है। ऑटो नहीं चलाऊंगा तो परिवार कैसे चलेगा?”

यह दर्द वास्तविक है और उसकी आर्थिक विवशता को समझा जा सकता है। लेकिन यहाँ एक सीधा और महत्वपूर्ण सवाल उठता है— क्या किसी की आर्थिक मजबूरी, यात्रियों की जान से बढ़कर कैसे हो सकती है? यह सीधे-सीधे यात्री सुरक्षा का मामला है। यदि कल कोई बड़ा हादसा होता है, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? चालक? यात्री? या फिर वही विभाग, जो आज इस गंभीर स्थिति पर आँखें मूंदे बैठा है? देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

प्रशासन की संवेदनहीनता और समाधान की राह

सरकार दिव्यांगजनों के उत्थान के लिए विभिन्न योजनाएं चला रही है, जिनमें स्वरोजगार, अनुदान, प्रशिक्षण और वैकल्पिक व्यवसायों से जोड़ना शामिल है। समस्या योजनाओं की कमी नहीं है, बल्कि उन्हें जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू करने की इच्छाशक्ति का अभाव है। अगर प्रशासन सच में संवेदनशील होता, तो ऐसे लोगों को सुरक्षित वैकल्पिक रोजगार से जोड़ता, न कि उन्हें सड़क पर मौत के जोखिम के साथ छोड़ देता। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करने की होड़ में कई बार ऑटो और ई-रिक्शा तेज़ रफ़्तार से चलाए जाते हैं। ऐसी स्थिति में शारीरिक सीमाओं के साथ वाहन चलाना दुर्घटना के खतरे को और भी बढ़ा देता है। यह समस्या किसी एक व्यक्ति विशेष की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की असफलता का परिचायक है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

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अब समय आ गया है कि प्रशासन केवल भावुक सहानुभूति और निष्क्रियता से बाहर निकले। या तो स्पष्ट और कठोर नियम लागू किए जाएं और उनका सख्ती से पालन करवाया जाए, या फिर ऐसे दिव्यांग चालकों के लिए सुरक्षित पुनर्वास और वैकल्पिक रोजगार की ठोस व्यवस्था की जाए ताकि उनकी आजीविका भी सुरक्षित रहे और आम नागरिकों की जान भी जोखिम में न पड़े।

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