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दरभंगा के सिंहवाड़ा स्वास्थ्य केंद्र अचानक पहुंचे सिविल सर्जन…फिर तुरंत बंद हो गए दरवाजे…राज हैं बड़े गहरे…, छुपाने की कोशिश भी है

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दरभंगा, देशज टाइम्स अपराध ब्यूरो। रविवार का दिन और सिविल सर्जन का सिंहवाड़ा स्वास्थ्य केंद्र का दौरा चर्चा का विषय बन गया है। हालांकि सिविल सर्जन उक्त स्वास्थ्य केंद्र के निरीक्षण को लेकर भी आ सकते हैं, लेकिन स्वास्थ्यकर्मियों के बीच कुछ अलग ही चर्चा है।

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स्वास्थ्यकर्मियों ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि सिविल सर्जन अचानक केंद्र पर आये और प्रभारी चिकित्सा प्रभारी कक्ष में गये। बहुत देर तक गेट को बंद कर गुप्तगू हुई। बाद में सभी कर्मियों को बुलाकर स्वास्थ्य केंद्र के बाबत जानकारी मांगी।

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लोगों का कहना हैं कि सिंहवाड़ा स्वास्थ्य केंद्र इन दिनों फर्जी दिव्यांगिता प्रमाण पत्र को लेकर चर्चित है। यहां प्रसाद में दिव्यांगिता प्रमाण पत्र बांटा गया हैं। इस कारण थाने में जो प्राथमिकी दर्ज की गई हैं। इसमें कई चिकित्सकों का अभियुक्त बनना तय माना जा रहा हैं।

 

सूत्र कहते हैं कि इसी मामले को लेकर सिविल सर्जन केंद्र पर कोई बहाना लेकर आये थे, लेकिन उनके दिमाग में थाना में दर्ज की गई प्राथमिकी में उन्हें शक हैं कि वे अभियुक्त ना बन जाएं। इस कारण मामले को रफा-दफा करने के जुगाड़ में हैं।

सूत्र का कहना है कि इनकी ओर से कई कागजातों को छेड़छाड़ कर बचने का प्रयास किया जा रहा हैं। सिविल सर्जन और प्रभारी चिकित्सा प्रभारी की कृपा से एएनएम अनीता कुमारी और उनके पति अरुण कुमार ने दिव्यांगिता प्रमाण पत्र के चलते कई लाभ को उठाया गया हैं।

मजेदार पहलू यह हैं कि सिविल सर्जन एक तरफ अरुण कुमार के दिव्यांगिता प्रमाण को रद करने का आदेश देते हैं। वहीं, दूसरी ओर सिविल सर्जन कुछ ही महीने बाद खुद 43% का प्रमाण पत्र निर्गत करते हैं। इस कारण एएनएम अनीता कुमारी 75 हजार रुपये आयकर में छूट लें लेती हैं।

इस मामले में जितना दोषी एएनएम हैं, उतना ही दोषी पांच प्रभारी चिकित्सा प्रभारी और सिविल सर्जन हैं। इस मामले में पुलिस को बारीकी से अनुसंधान करने की जरूरत हैं। शुरुआत के दिनों में डॉ. वाणीश झा ने 30% का विकलांगिता प्रमाण पत्र 27 नवंबर 11 को निर्गत किया था।

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इसके बाद डॉ. गंगा नंद झा ने क्रमश 40% और 60% यानि एक दिन में दो प्रमाण पत्र पांच जुलाई 13 को दे दिया। इसके बाद डॉ. मिथिलेश झा ने 50% का प्रमाण पत्र 15 मार्च 16 को निर्गत कर दिया। इस प्रमाण पत्र के सहारे बताया जाता हैं कि एएनएम के पुत्र ने भी सरकारी नौकरी में फायदा लिया हैं, बल्कि इसी प्रमाण पत्र के कारण उसकी नौकरी हुई। इस बीच शिकायत मिलने पर फर्जी प्रमाण पत्र को लेकर जांच हुई। इसमें चारों प्रमाणपत्र फर्जी पाया गया।

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इस बात के बाबत शोर गुल होने पर सिविल सर्जन ने डॉ. प्रेम चंद्र प्रकाश को 2/2/21 में ही फर्जी विकलांगिता प्रमाण पत्र को लेकर प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया था। लेकिन, यह आदेश रद्दी के टोकरी में चला गया। इतना होने के बाद फिर से प्रभारी चिकित्सा प्रभारी डॉ. प्रेम चंद्र प्रकाश ने 50% का विकलांगिता प्रमाण पत्र दस मार्च 21 को अरुण कुमार के नाम निर्गत कर दिया।

इतना ही नहीं, ठीक एक महीने बाद यानि 16 अप्रैल 21 को सिविल सर्जन अनिल कुमार ने 43% का प्रमाण पत्र निर्गत कर दिया। अब सवाल यहीं से उठता है कि जिस सिविल सर्जन ने सभी प्रमाण पत्र को फर्जी मानते हुये उसे रद करते हुये प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश प्रभारी चिकित्सा प्रभारी को दिया। फिर, वहीं प्रभारी चिकित्सा प्रभारी और सिविल सर्जन ने फिर से प्रमाण पत्र अरुण कुमार को कैसे दे दिया।

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इसी कारण ही दुबारा अरुण कुमार की पत्नी एएनएम अनीता कुमारी ने आयकर में छूट ले लिया। अरुण कुमार का चार नहीं बल्कि छह-छह विकलांगिता प्रमाण पत्र बनाया गया? यही जांच का विषय हैं।

इसके हाय-तौबा मचने पर दो साल बाद सिविल सर्जन के आदेश पर प्रभारी चिकित्सा प्रभारी की ओर से प्राथमिकी दर्ज कराई गई है। इसमें पति-पत्नी आरोपी हैं। इस पूरे प्रकरण को देखा जाय तो एएनएम से लेकर सिविल सर्जन तक उतना ही दोषी हैं जितना कि अरुण कुमार और उसकी पत्नी हैं।

डीएसपी अमित कुमार कहते हैं कि इस मामले को बारीकी से देख रहे हैं। उनका कहना है कि यह तो सही है कि बार बार अरुण कुमार को दिव्यांगिता प्रमाण पत्र चिकित्सकों ने दिया हैं। उन्होंने कहा कि यह बड़ा ही रोचक तथ्य हैं। डीएसपी सदर श्री कुमार ने कहा कि इस मामले में दोषी जो भी होंगे उन्हें जेल की हवा खानी होगी।

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