
Darbhanga में खेतों में पसरा सन्नाटा, सुनहरी बालियों पर काली छाया और टूटते अरमानों की गूंज… यह सिर्फ तस्वीरें नहीं, एक दिल दहला देने वाली सच्चाई है जो बिहार के किसानों की रातों की नींद हराम कर रही है। पश्चिमी विक्षोभ की तीसरी चोट ने उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। एक पखवाड़े में तीसरी बार हुई बेमौसम बारिश और तेज हवाओं ने बिहार के अन्नदाताओं के सपनों पर फिर से पानी फेर दिया है। खेतों में दूर-दूर तक गिरी हुई फसलें और नमी से काली पड़ती गेहूं की बालियां, किसानों की साल भर की मेहनत को बर्बाद होता साफ बयां कर रही हैं। मंगलवार तक जिन खेतों में गेहूं की सुनहरी बालियां लहलहा रही थीं, बुधवार को वहीं गिरी हुई फसल का नजारा देखकर किसानों का कलेजा मुंह को आ रहा है।
हताश किसानों का कहना है कि इस बेमौसम बारिश से नुकसान का प्रतिशत काफी बढ़ गया है। कटाई के लिए तैयार खड़ी फसल को जल्द से जल्द काटना है, लेकिन मजदूरों की अनुपलब्धता एक बड़ी समस्या बन गई है। जो मजदूर मिल भी रहे हैं, वे मनमाना मजदूरी मांग रहे हैं।
किसान मशीनों के जरिए कटाई कराने की कोशिश कर रहे हैं, आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। लेकिन हर जगह मशीनों की उपलब्धता भी नहीं है, और उनका किराया भी काफी अधिक है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि गिरी हुई फसल को मशीन से काटना बेहद मुश्किल है, और नमीयुक्त खेतों में तो मशीनें काम करने को भी तैयार नहीं हैं। इस बारिश के कारण कटाई और थ्रेसिंग का काम पूरी तरह से ठप हो गया है।
Darbhanga में मौसम का कहर: गिरी हुई फसल और बढ़ती बेबसी
1 अप्रैल, बुधवार को क्षेत्र के कई चौर (निचले इलाकों) में ऐसे ही हृदय विदारक हालात देखने को मिले। अहियारी के बरकुरवा चौर में कटी हुई गेहूं की फसल के पास बैठे टारा टोल के किसान वकील महतो ने अपनी व्यथा बताते हुए कहा कि उन्होंने सोचा था कि इस बार फसल अच्छी होगी तो मकान बनवाएंगे, लेकिन इस पश्चिमी विक्षोभ और बेमौसम बारिश ने सब कुछ छीन लिया। अब उन्हें समझ नहीं आ रहा कि आगे क्या करें। यह सिर्फ वकील महतो की नहीं, ऐसे कई किसानों की बेबसी है जो इस बार प्राकृतिक आपदा की मार झेल रहे हैं।
वकील महतो की बातों में गहरी हताशा साफ झलकती है। इसी गांव के किसान मोहन महतो ने बताया कि उन्होंने दो बीघा जमीन पर गेहूं की फसल बोई थी। पूरे परिवार ने कड़ी मेहनत की, लेकिन कटाई से ठीक पहले आई इस बारिश ने उनकी सारी मेहनत पर पानी फेर दिया। अब तो उन्हें लागत खर्च निकलने की भी उम्मीद नहीं बची है। उन्होंने सोचा था कि इस बार फसल बेचकर कर्ज निपटा देंगे, लेकिन अब तो उसका ब्याज भी बढ़ता जाएगा। यह एक ज्वलंत उदाहरण है किसानों का संकट।
किसानों की टूटती उम्मीदें: कर्ज और चिंता का बोझ
सुनीता देवी अपनी खेसारी की फसल की निकासी में जुटी थीं। उनका दर्द भी कम नहीं था। उन्होंने कहा, “अब बस यही चिंता सता रही है कि जो फसल तैयार है, उसे बचाएं तो कैसे? खराब मौसम और लगातार हो रही बारिश ने फसलों को बुरी तरह प्रभावित किया है।” आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। किसानों के लिए अपनी लागत पूंजी निकालना भी अब मुश्किल जान पड़ रहा है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें https://deshajtimes.com/news/national/
किसानों ने बताया कि मंगलवार को दिन भर आसमान में बादल आते-जाते रहे और शाम होते-होते मौसम में अचानक ठंडक आ गई। इन दिनों खेतों में लगी दलहन और तेलहन फसलों की निकासी का काम अंतिम चरण में था, और गेहूं की अगेती फसल की कटाई एवं थ्रेसिंग का काम भी शुरू हो चुका था। लेकिन देर शाम तेज हवा के साथ हुई बारिश ने अन्नदाताओं को भारी नुकसान पहुंचाया, जिसने उनकी रही-सही उम्मीदों पर भी पानी फेर दिया। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।





