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मार्च, 10, 2026
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मधुबनी के राम निरंजन जनता इंटर कॉलेज में 90 लाख की अवैध निकासी, बताया CM Nitish Kumar का जनता दरबार है “ठग दरबार”

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मुख्य बातें
सीएम के जनता दरबार पहुंचा वर्तमान व पूर्व प्रभारी प्राचार्य की ओर से 90 लाख रुपए सहित अद्यतन अवैध निकासी में विशेष जांच का मामला
मामला राम निरंजन जनता इंटर महाविद्यालय रामपुर मधवापुर का
निदेशक, उप निदेशक के आदेश मायने नहीं रखा यहां के प्राचार्यद्वय के लिए

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मधवापुर, मधुबनी देशज टाइम्स। रामनिरंजन जनता इंटर महाविद्यालय रामपुर मधवापुर में बिना प्रस्ताव पारित किए मनमानी पूर्वक पूर्व प्रभारी प्राचार्य की ओर से किए गए 90 लाख रुपए एवं वर्तमान प्रभारी प्राचार्य की ओर से अद्यतन की जा रही अवैध निकासी का मामला अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जनता दरबार तक पहुंच गया है। बावजूद, कोई कार्रवाई होती नहीं दिख रही है।

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इसकी शिकायत कॉलेज की प्राध्यापक प्रो. विभा कुमारी ने की है। सीएम नीतीश कुमार को दिए आवेदन में पीड़िता ने कहा है कि आरोपित प्राचार्य सीएम के जनता दरबार को “ठग दरबार” बता रहे हैं। इसीलिए आरडीडीई के विशेष अंकेक्षण दल से अंकेक्षण कराने की अनुशंसा को अमलीजामा पहनाते हुए गबन की गई राशि की जांच कराने की गुहार लगाई है। जिससे, तत्कालीन डीएओ, डीपीओ के मनमानी के सामने सीएम के जनता दरबार की साख बची रह सके।

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क्या है मामला :
दरअसल इस महाविद्यालय के स्वयंभू पूर्व प्रभारी प्राचार्य कृष्ण प्रसाद साह जिनकी नियुक्ति स्नातक रहते व्याख्याता पद पर हुई थी के द्वारा बिना तदर्थ एवं शासी निकाय में प्रस्ताव पारित किए ही कॉलेज के तीन खातों से 2018 से 2021 तक 90 लाख रुपए की अवैध निकासी कर ली गई।

इस कार्यकाल में इनकी ओर से कॉलेज परिसर से करीब डेढ़ सौ हरे, फलदार, औषधीय, छायादार पेड़ कटवा कर औने – पौने भाव में बेच दिए गए। मरम्मत के नाम पर कॉलेज के मूल भवन का छप्पड़ उतरवाकर बेच दिया गया। साथ ही शिक्षक एवं शिक्षकेत्तर कर्मियों के साथ गाली-गलौज, मारपीट, अपमानजनक व्यवहार करते रहे। सभी अभिलेख घर पर रखकर मनमानी पूर्वक संचालित करते रहे।

कॉलेज कर्मियों से मिली शिकायत पर संज्ञान लेते हुए तत्कालीन डीएम एसके अशोक ने पंकज कुमार बेनीपट्टी के पीजीआरओ को मामले की जांच का निर्देश दिया। उन्होंने अपने जांच प्रतिवेदन में प्राचार्य साह पर लगाए गए सभी आरोपों को सही ठहराते हुए उनके द्वारा शैक्षणिक प्रमाण पत्र एवं वित्तीय अभिलेख नहीं प्रस्तुत करने की बात दर्शाते हुए प्रतिवेदन समर्पित कर दिया।

जांच प्रतिवेदन एवं डीएम के अनुशंसा के आलोक में निदेशक, शैक्षणिक, बिहार विद्यालय परीक्षा समिति (उच्चतर माध्यमिक) ने इन्हें प्राचार्य के पद से हटाते हुए तदर्थ समिति का गठन कर डीपीओ माध्यमिक शिक्षा को समिति का संयोजक नामित करते हुए एक सप्ताह के अंदर तदर्थ समिति की बैठक बुलाकर सर्वसम्मति से नियमित रूप से उपस्थित रहने वाले वरीयतम शिक्षक को प्राचार्य सह सचिव एवं एक दानदाता का नाम नामित कर अनुमोदन के लिए भेजने का निर्देश डीएओ को दिया।

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लेकिन, डीएओ एवं डीपीओ निदेशक के आदेश को ठेंगा दिखाते हुए उन्हें सेवानिवृत्त होने तक पद पर बनाए रखा। इस बीच हर तरह के प्रतिकार होते रहे उच्चाधिकारियों के आदेश निर्देश आते रहे । लेकिन, डीएओ, डीपीओ एवं प्राचार्य की मनमानी जारी रही। सेवानिवृत्त होने पर पुनः दोनों अधिकारिद्व्य ने सबसे जूनियर शिक्षक को प्राचार्य का प्रभार दिलवाकर अनुमोदन कर दिया। जिसकी शिकायत मिलने पर क्षेत्रीय शिक्षा उप निदेशक ने 8 जनवरी 22 को पत्र लिखकर 22 जनवरी 22 को प्राचार्य को अभिलेखों के साथ उपस्थित होने का निर्देश दिया।

प्राचार्य के नहीं पहुंचने पर उन्होंने 11 मार्च 22 को स्वयं स्थलीय जांच की। जांच के क्रम में प्राचार्य बिना सूचना एवं आवेदन के कॉलेज से अनुपस्थित पाए गए। एक लिपिक भोगेंद्र प्रसाद एवं चार आदेशपाल निर्मला देवी, जितेंद्र सिंह, ताराकांत मिश्र एवं उमाशंकर गुप्ता उपस्थित थे। लेकिन, लिपिक ने कहा कि उनके पास कोई अभिलेख नहीं है प्राचार्य स्वयं रखते हैं। पठन पाठन ठप रहने एवं अन्य व्याख्याताओं की अनुपस्थिति को अनुदान राशि का दुरुपयोग बतलाया।

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फिर, उन्होंने 14 मार्च 22 को पत्र भेजकर 28 मार्च 22 को प्राचार्य को कॉलेज के रोकड़ पंजी, बैंक पासबुक, व्यय संबंधित अभिश्रव, अनुदान मद में प्राप्त राशि तथा वितरण संबंधी पंजी, शुल्क संचय पंजी, शिक्षक एवं शिक्षकेत्तर कर्मियों के पदस्थापन विवरणी के साथ उपस्थित होने का निर्देश दिया। लेकिन, इस तिथि को भी प्राचार्य ने नकार दिया।

उन्होंने इसे गंभीरता पूर्वक लेते हुए निदेशक शैक्षणिक बीएसईबी उच्चतर माध्यमिक पटना को दोनों प्राचार्य के क्रिया कलाप को उच्चाधिकारी के आदेश की अवहेलना, कर्तव्यहीनता, स्वेच्छाचारिता एवं अनुशासनहीनता का द्योतक बतलाते हुए विशेष अंकेक्षक दल से वित्तीय अनियमितता की जांच कराने एवं विभागीय अनुशासनिक कार्रवाई करने की अनुशंसा की थी। लेकिन, सरकार की गलत शिक्षा नीति के कारण आज भी यह मामला लटका हुआ है।

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