
बिहार में सूखा नशा: बिहार के मधेपुरा समेत कई जिलों में एक गंभीर सामाजिक संकट गहराता जा रहा है। युवा पीढ़ी तेजी से स्मैक, गांजा और कोडिन युक्त कफ सिरप जैसी नशीली चीज़ों की चपेट में आ रही है, जो अब शहरों से निकलकर गांवों तक पहुंच चुकी है। ये नया ‘साइलेंट किलर’ हर दिन युवाओं का भविष्य बर्बाद कर रहा है।
सूखे नशे की आसान उपलब्धता और ‘स्मैक की लत’
बिहार के मधेपुरा सहित सीमावर्ती इलाकों में सूखे नशे का कारोबार अब किसी गुप्त गतिविधि तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक खुले ज़ख्म की तरह दिखाई देने लगा है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में महज 300-400 रुपये में स्मैक की पुड़िया आसानी से उपलब्ध हो रही है, जिससे स्मैक की लत तेजी से बढ़ रही है। यह सफेद धुआं युवाओं की सांसों को घोंट रहा है। बड़ी संख्या में युवा इसके आदी हो चुके हैं और सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह धंधा अब शहरों से निकलकर सुदूर देहातों तक पहुंच चुका है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कुछ भ्रष्ट तत्वों की मिलीभगत से यह काला कारोबार लगातार फल-फूल रहा है।
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शराबबंदी के बाद ‘गंधहीन’ नशे का बोलबाला
शराबबंदी के बाद बिहार में एक बड़ा बदलाव यह आया कि शौकीनों ने अब ‘बिना गंध’ वाले नशे की ओर रुख कर लिया है। कोडिन युक्त कफ सिरप का इस्तेमाल अब बीमारी ठीक करने के लिए नहीं, बल्कि नशे के लिए किया जा रहा है। जानकारों के मुताबिक, 200 मिलीलीटर कफ सिरप का सेवन उतनी ही तीव्रता का नशा देता है जितना शराब की एक बोतल, और सबसे बड़ी बात यह है कि इसे पीने के बाद मुंह से दुर्गंध भी नहीं आती। इसके अलावा, व्हाइटनर, पेनकिलर और सॉल्यूशन जैसे केमिकल का इस्तेमाल भी युवा पीढ़ी को मानसिक अंधेरे की ओर धकेल रहा है। मधेपुरा में बिहार में सूखा नशा अब एक गंभीर समस्या का रूप ले चुका है।
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नेपाल से तस्करी, बेरोजगारी और बिगड़ता समाज
इस सूखे नशे के बढ़ते प्रकोप के पीछे एक बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है। पड़ोसी देश नेपाल से गांजा और स्मैक की तस्करी में अधिकांश युवा ही शामिल हैं। अधिक मुनाफे के लालच में ये युवा न केवल अपना भविष्य बर्बाद कर रहे हैं, बल्कि अपने ही साथियों को नशे के दलदल में धकेल रहे हैं। बेरोजगारी और गलत संगति ने आग में घी डालने का काम किया है। मधेपुरा के स्थानीय निवासियों का कहना है कि शराब की ऊंची कीमतों ने युवाओं को इन सस्ते लेकिन बेहद घातक नशीले पदार्थों की ओर आकर्षित किया है, जो समाज के लिए एक गंभीर खतरे की घंटी है।
बर्बादी की कगार पर सेहत और समाज
चिकित्सकों की मानें तो सूखा नशा शरीर को अंदर से खोखला कर देता है। डॉ. संतोष प्रकाश के अनुसार, केमिकल युक्त इन पदार्थों का सेवन करने से न केवल शारीरिक सेहत बिगड़ती है, बल्कि युवाओं का मानसिक संतुलन भी पूरी तरह अस्थिर हो सकता है। यह लत इतनी खतरनाक है कि इसे बिना डॉक्टरी परामर्श के छोड़ना लगभग नामुमकिन हो जाता है। केवल पुलिसिया कार्रवाई से काम नहीं चलेगा। इसके लिए एक बड़े सामाजिक आंदोलन और सरकारी नशामुक्ति केंद्रों को और अधिक प्रभावी बनाने की जरूरत है। अगर समय रहते यह धुआं नहीं थमा, तो बिहार की आने वाली पीढ़ी केवल राख बनकर रह जाएगी। नई पीढ़ी का यह भटकाव समाज के लिए गंभीर चेतावनी है। जरूरत है जागरूकता, सख्त कार्रवाई और सामूहिक प्रयास की, ताकि युवाओं को नशे के इस अंधेरे से बाहर निकाला जा सके। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें







