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Bihar News: बिहार शराबबंदी में चौंकाने वाला खुलासा! NFHS रिपोर्ट में बढ़ा पुरुषों का शराब सेवन

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) 2024-25 की चौंकाने वाली रिपोर्ट ने बिहार की शराबबंदी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां एक ओर राज्य में पुरुषों का शराब सेवन बढ़ा है, वहीं तंबाकू उपयोग में कमी आई है, जो नीति निर्माताओं के लिए नया विरोधाभास खड़ा करता है।

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बिहार शराबबंदी न्यूज़: नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) 2024-25 की नई रिपोर्ट ने बिहार में हड़कंप मचा दिया है। राज्य में कड़े शराबबंदी कानून के बावजूद पुरुषों में शराब के सेवन का प्रतिशत बढ़ गया है। यह आंकड़ा नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय बन गया है।

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शराबबंदी के बावजूद पुरुषों में क्यों बढ़ी शराब की खपत?

NFHS 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार में 15 वर्ष से अधिक आयु के पुरुषों में अल्कोहल सेवन 15.4 प्रतिशत से बढ़कर 16.5 प्रतिशत हो गया है। यह बदलाव ऐसे समय में सामने आया है जब राज्य में शराबबंदी को सख्ती से लागू करने का दावा किया जाता रहा है। रिपोर्ट यह संकेत देती है कि नशे की आदतों में बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां तंबाकू की तुलना में शराब सेवन की हिस्सेदारी बढ़ी है।

हालांकि, तंबाकू सेवन करने वाले पुरुषों और महिलाओं की संख्या में कमी दर्ज की गई है। 15 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं में तंबाकू सेवन 5 प्रतिशत से घटकर 4 प्रतिशत रह गया है। पुरुषों में भी यह आंकड़ा 48.9 प्रतिशत से घटकर 45.8 प्रतिशत पर पहुंच गया है। महिलाओं में अल्कोहल सेवन का प्रतिशत 0.4 पर स्थिर बना हुआ है।

मातृ-शिशु स्वास्थ्य और अन्य बीमारियों पर क्या कहती है रिपोर्ट?

स्वास्थ्य के मोर्चे पर, मधुमेह से जुड़े आंकड़े भी सामने आए हैं। बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में 15 वर्ष से अधिक उम्र की 6.2 प्रतिशत महिलाएं और 8 प्रतिशत पुरुष मधुमेह से प्रभावित पाए गए हैं। शहरी इलाकों में महिलाओं और पुरुषों दोनों में यह प्रतिशत 7.3 है। राज्य स्तर पर देखें तो 7.9 प्रतिशत पुरुष और 6.3 प्रतिशत महिलाएं मधुमेह से पीड़ित हैं। राहत की बात यह है कि पिछले सर्वेक्षण की तुलना में मधुमेह के मामलों में मामूली कमी दर्ज की गई है।

रिपोर्ट में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य से जुड़े संकेतकों में सुधार की तस्वीर भी सामने आई है। राज्य में संस्थागत प्रसव का प्रतिशत 76.2 से बढ़कर 81.1 हो गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में 80.2 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 89.9 प्रतिशत प्रसव स्वास्थ्य संस्थानों में हो रहे हैं। सरकारी अस्पतालों में 57.5 प्रतिशत प्रसव दर्ज किए गए हैं। वहीं 84 प्रतिशत प्रसव प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों की मौजूदगी में कराए जा रहे हैं।

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सीजेरियन या ऑपरेशन से होने वाले प्रसव में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। राज्य में इसका प्रतिशत 9.7 से बढ़कर 13.2 हो गया है। निजी अस्पतालों में ऑपरेशन से प्रसव की दर 39.6 प्रतिशत से बढ़कर 49.3 प्रतिशत पहुंच गई है। दूसरी ओर सरकारी अस्पतालों में यह प्रतिशत 3.6 से घटकर 2.7 रह गया है।

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शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है। जन्म के पहले एक घंटे के भीतर स्तनपान कराने वाली महिलाओं का प्रतिशत 31.1 से बढ़कर 51.9 हो गया है। इसे नवजात स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

पोषण और बुनियादी सुविधाओं की क्या है स्थिति?

राज्य में बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता भी बढ़ी है। 98 प्रतिशत घरों तक बिजली और 99.8 प्रतिशत घरों तक पेयजल पहुंचने की जानकारी रिपोर्ट में दी गई है।

पोषण से जुड़े आंकड़े बिहार के लिए अब भी चुनौती बने हुए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में 27.1 प्रतिशत महिलाएं कम वजन की श्रेणी में हैं। रिपोर्ट बताती है कि राज्य में लगभग हर चौथा व्यक्ति सामान्य मानक से कम बॉडी मास इंडेक्स का शिकार है। वहीं शहरी क्षेत्रों में मोटापे की समस्या बढ़ती दिखाई दे रही है। शहरों में 30 प्रतिशत महिलाएं और 29.9 प्रतिशत पुरुष मोटापे की श्रेणी में दर्ज किए गए हैं।

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रिपोर्ट में स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों की भूमिका को भी रेखांकित किया गया है। बिहार में संचालित लगभग 12 हजार हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर ग्रामीण आबादी को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करा रहे हैं। इन केंद्रों पर लोगों की पहुंच बढ़ने से स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ अधिक लोगों तक पहुंच रहा है। मुजफ्फरपुर जिले में अकेले 619 वेलनेस सेंटर संचालित हो रहे हैं, जिनकी निगरानी स्वास्थ्य विभाग की सहयोगी संस्था द्वारा की जा रही है।

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NFHS 2024-25 की रिपोर्ट बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की दो अलग तस्वीरें दिखाती है। एक ओर मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, बिजली, पेयजल और संस्थागत प्रसव जैसे क्षेत्रों में सुधार दिखाई देता है। दूसरी ओर शराबबंदी के बावजूद पुरुषों में बढ़ता अल्कोहल सेवन और पोषण संबंधी चुनौतियां नीति निर्माताओं के लिए नए सवाल खड़े कर रही हैं।

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