
PCPNDT Act: जिन कंधों पर समाज को बचाने की जिम्मेदारी है, वही अगर अपनी आंखें मूंद लें, तो सवाल उठना लाजिमी है। स्वास्थ्य विभाग के अपने ही संस्थान नियमों को ताक पर रखकर चल रहे हैं, यह खबर चौंकाने वाली है।
PCPNDT Act: बिहार के स्वास्थ्य संस्थानों में ही कानूनों की धज्जियां, सदर अस्पताल में बड़ा खुलासा
PCPNDT Act: बिहार के कई स्वास्थ्य संस्थानों, विशेषकर मुंगेर के सदर अस्पताल में प्री-कन्सेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक्स (PCPNDT) एक्ट के निर्धारित मानकों का खुला उल्लंघन हो रहा है। यह स्थिति तब है, जब स्वास्थ्य विभाग खुद इन नियमों को लागू करने और उन पर निगरानी रखने के लिए जिम्मेदार है। राज्य के स्वास्थ्य ढांचे में ऐसी लापरवाही न केवल कानूनी अवहेलना है, बल्कि समाज में गहरा संदेश भी देती है, खासकर ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर।
यह जानकर हैरानी होती है कि जहां आम क्लीनिक और निजी अस्पतालों पर सख्ती से कार्रवाई की जाती है, वहीं सरकारी संस्थाओं में नियमों की अनदेखी हो रही है। इस मामले ने पूरे स्वास्थ्य महकमे की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह एक गंभीर विषय है, जो भविष्य में लिंगानुपात की समस्या को और गहरा सकता है।
PCPNDT Act के तहत क्यों हो रही है अनदेखी?
PCPNDT एक्ट का मुख्य उद्देश्य गर्भधारण से पहले या बाद में लिंग निर्धारण पर रोक लगाना है ताकि कन्या भ्रूण हत्या जैसे सामाजिक अपराधों पर अंकुश लगाया जा सके। इस एक्ट के तहत अल्ट्रासाउंड और अन्य डायग्नोस्टिक सेंटर को कड़े नियमों का पालन करना होता है, जिसमें उपकरणों का पंजीकरण, रिकॉर्ड का रखरखाव और निर्धारित प्रोटोकॉल शामिल हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। विडंबना यह है कि स्वास्थ्य विभाग के अपने ही संस्थानों में इन मूलभूत नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है, जिससे अवैध लिंग निर्धारण जैसी गतिविधियों को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा मिल सकता है।
यह केवल एक अस्पताल का मामला नहीं हो सकता, बल्कि यह एक बड़े सिंड्रोम की ओर इशारा करता है, जहाँ जवाबदेही की कमी और प्रशासनिक ढिलाई चरम पर है। संबंधित अधिकारियों को इस गंभीर चूक पर तत्काल ध्यान देने और कठोर कार्रवाई करने की आवश्यकता है।
क्या है PCPNDT एक्ट और इसका महत्व?
प्री-कन्सेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक्स (रेगुलेशन एंड प्रिवेंशन ऑफ मिसयूज) एक्ट, 1994, भारत में कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण कानून है। यह कानून गर्भावस्था से पहले या बाद में किसी भी व्यक्ति द्वारा लिंग निर्धारण तकनीक के उपयोग पर प्रतिबंध लगाता है। इसका उद्देश्य लैंगिक समानता को बढ़ावा देना और समाज में गिरते लिंगानुपात को रोकना है। इसके उल्लंघन पर भारी जुर्माना और कारावास का प्रावधान है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
इस एक्ट के प्रभावी क्रियान्वयन से ही समाज में बेटों और बेटियों के बीच भेदभाव को खत्म किया जा सकता है। जब खुद सरकारी संस्थान इन नियमों की अनदेखी करते हैं, तो इसका सीधा असर इस नेक पहल पर पड़ता है और समाज में गलत संदेश जाता है।
प्रशासनिक लापरवाही या मिलीभगत?
मुंगेर के सदर अस्पताल में PCPNDT एक्ट का पालन न होना केवल लापरवाही का मामला नहीं हो सकता। यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या यह सिर्फ प्रशासनिक ढिलाई है, या इसमें किसी प्रकार की मिलीभगत भी शामिल है? स्वास्थ्य विभाग के शीर्ष अधिकारियों को इस मामले की गहन जांच करनी चाहिए और दोषियों पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। इस तरह की अनदेखी से आम जनता का स्वास्थ्य सेवा प्रणाली से विश्वास उठ सकता है और समाज में लैंगिक असंतुलन की समस्या और भी गंभीर हो सकती है।
राज्य सरकार को इस संवेदनशील मुद्दे पर तुरंत संज्ञान लेना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी सरकारी और निजी स्वास्थ्य संस्थान PCPNDT एक्ट के तहत निर्धारित मानकों का अक्षरशः पालन करें। यह केवल कानून का मामला नहीं, बल्कि एक स्वस्थ और संतुलित समाज के निर्माण की बुनियाद है।




