
Samastipur Fraud: बिहार के समस्तीपुर में एक बड़े ठगी और बंधक बनाने के मामले में नया मोड़ आ गया है। भोला टॉकीज गुमटी स्थित कालिका कॉम्प्लेक्स में विजन ट्रेडिंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड (गेलवे) नामक कंपनी के चंगुल से बचाए गए 105 युवक-युवतियों के रेस्क्यू केस में अब यौन शोषण का भी एंगल सामने आया है। पीड़ित युवतियों के गंभीर आरोपों के बाद पुलिस ने इस दिशा में भी जांच तेज कर दी है। मामले की गंभीरता को देखते हुए अब सीआईडी के कमजोर वर्ग प्रकोष्ठ की टीम ने भी जांच की कमान संभाल ली है, और गृह विभाग ने एसपी से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।
यौन शोषण और प्रताड़ना के सनसनीखेज आरोप
पीड़ित युवतियों ने चौंकाने वाले खुलासे किए हैं, जिसके बाद पुलिस यौन शोषण के एंगल से भी मामले की जांच कर रही है। मेडिकल रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। जांच में सामने आया है कि आरोपी युवक-युवतियों पर कड़ी निगरानी रखते थे। उनके मोबाइल फोन जब्त कर लिए जाते थे और हर गतिविधि पर लगातार नजर रखी जाती थी। कई युवतियों ने आरोप लगाया है कि भागने की कोशिश करने पर उनके साथ मारपीट की गई और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। कुछ युवतियों ने तो टीम लीडर पॉली उरांव और आरडी सुष्मिता कुमारी पर मारपीट और दुर्व्यवहार के सीधे आरोप लगाए हैं।




पुलिस को मिली जानकारी के अनुसार, आरोपी युवक-युवतियों पर कड़ी निगरानी रखते थे। उनके मोबाइल फोन जब्त कर लिए जाते थे और गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जाती थी। कई युवतियों ने आरोप लगाया है कि भागने की कोशिश करने पर उनके साथ मारपीट की गई और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया।
CID की एंट्री और गृह विभाग का सख्त रुख
इस सनसनीखेज मामले की जांच में अब अन्य एजेंसियां भी जुट गई हैं। शुक्रवार को सीआईडी के कमजोर वर्ग प्रकोष्ठ के डीएसपी नरेश पासवान समस्तीपुर पहुंचे। उन्होंने वन स्टॉप सेंटर में पीड़ित युवतियों के बयान दर्ज किए और एसपी अरविंद प्रताप सिंह से मामले की विस्तृत जानकारी ली। उनकी रिपोर्ट पुलिस मुख्यालय को भेजी जाएगी। मुफस्सिल थानाध्यक्ष अजीत प्रसाद सिंह के आवेदन पर आठ लोगों के विरुद्ध नामजद प्राथमिकी दर्ज की गई है। इनमें से पांच आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में जेल भेजा जा चुका है।
105 युवक-युवतियों और नाबालिगों के रेस्क्यू के बाद गृह विभाग ने भी मामले को गंभीरता से लिया है। विभाग ने एसपी से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। इस रिपोर्ट में गिरोह के संचालन के तरीके, अब तक की कार्रवाई, गिरफ्तार एवं फरार आरोपियों, पीड़ितों की स्थिति और संभावित अंतरराज्यीय नेटवर्क की जानकारी मांगी गई है। साथ ही, यह भी पूछा गया है कि दूसरे राज्यों से इतनी बड़ी संख्या में युवाओं को लाकर रखने की जानकारी स्थानीय स्तर पर पहले क्यों नहीं मिल सकी।
फरार मास्टरमाइंड और अंतरराज्यीय नेटवर्क का खुलासा
पुलिस ने मुफस्सिल थाने में दर्ज प्राथमिकी के आधार पर पांच आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया है। जेल जाने वालों में दरभंगा जिले के बाजीपुर निवासी शाखा कुमारी, असम निवासी अंजुलियस ओरंग, गया निवासी प्रमोद ठाकुर, असम निवासी पॉली उरांव और लखीमपुर निवासी पोलो उरांव शामिल हैं। हालांकि, कंपनी के फ्रेंचाइजी होल्डर पुनीत प्रांजल, कंपनी के मैनेजर गुड्डू कुमार (जो सुरेंद्र महतो के पुत्र और शेखपुरा जिले के खेवाड़ा थाना अंतर्गत अंदौली गांव के रहने वाले हैं) और आर्यन कुमार यादव (जो कमल यादव के पुत्र और सुपौल जिले के निर्मली के वार्ड 8 के निवासी हैं) सहित कुल सात मुख्य आरोपी अभी भी फरार हैं। फरार आरोपियों में पप्पू खान, करण, राजा और राहुल जायसवाल भी शामिल हैं। इनकी गिरफ्तारी के लिए लगातार छापेमारी की जा रही है।
पुलिस को आशंका है कि इस गिरोह का नेटवर्क बिहार के अन्य जिलों और दूसरे राज्यों तक फैला हो सकता है। जांच के दौरान दरभंगा के दिल्ली मोड़ क्षेत्र में भी इसी तरह की गतिविधियों से जुड़े नेटवर्क की जानकारी मिली है। पुलिस वित्तीय लेन-देन और नेटवर्क के विस्तार की भी गहन जांच कर रही है।
लखपति बनने का सपना दिखाकर फंसाते थे जाल में
पीड़ित युवक-युवतियों के बयानों से पता चला है कि यह पूरा नेटवर्क मार्केटिंग और ब्रेनवॉशिंग के मॉडल पर संचालित किया जा रहा था। बेरोजगार युवाओं को पहले सरकारी नौकरी और फिर कुछ ही महीनों में लखपति बनने का सपना दिखाकर जाल में फंसाया जाता था। गिरोह के सदस्य सोशल मीडिया और मोबाइल कॉल के माध्यम से बेरोजगार युवक-युवतियों से संपर्क करते थे। उन्हें कृषि विभाग सहित विभिन्न सरकारी विभागों में नौकरी दिलाने का भरोसा दिया जाता था। समस्तीपुर पहुंचने पर उनसे रजिस्ट्रेशन और ट्रेनिंग किट के नाम पर 25,000 रुपये जमा कराए जाते थे। पीड़ितों के अनुसार, इसके बदले उन्हें कॉस्मेटिक और सामान्य उपयोग की वस्तुओं वाली एक किट दी जाती थी, जिसकी वास्तविक कीमत बहुत कम थी। उन्हें बताया जाता था कि यह नौकरी प्रक्रिया का हिस्सा है और प्रशिक्षण पूरा होने के बाद नियुक्ति पत्र मिल जाएगा।
युवक-युवतियों को अलग-अलग हॉस्टलों और किराये के मकानों में रखा जाता था। प्रतिदिन सुबह छह बजे से दस बजे तक चलने वाली क्लासों में नौकरी की तैयारी से अधिक नए लोगों को जोड़ने और नेटवर्क बढ़ाने की ट्रेनिंग दी जाती थी। प्रशिक्षण के दौरान मोबाइल फोन जमा करा लिए जाते थे और सफलता तथा तेजी से अमीर बनने की कहानियां सुनाकर युवाओं को प्रभावित किया जाता था। जांच में सामने आया है कि गिरोह का उद्देश्य नौकरी दिलाना नहीं, बल्कि नए लोगों को जोड़कर ठगी के नेटवर्क का विस्तार करना था। प्रत्येक सदस्य को नए लोगों से रकम जमा कराने पर कमीशन का लालच दिया जाता था।
रेस्क्यू किए गए सभी नाबालिग लड़के-लड़कियों की मेडिकल जांच के बाद उन्हें उनके परिजनों को सौंप दिया गया है। अन्य युवतियों को फिलहाल वन स्टॉप सेंटर में सुरक्षित रखा गया है। परिजनों के पहुंचने पर उन्हें भी सुपुर्द कर दिया जाएगा। पुलिस फरार सदस्यों और उनके बाहरी संपर्कों की जांच जारी रखे हुए है, ताकि इस पूरे अंतरराज्यीय ठगी और शोषण के नेटवर्क का पर्दाफाश किया जा सके।







